भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 421 में से

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पृष्ठ 302

उत्तरार्ध तेईसवां अध्याय कौन रूपों को निगल जाती है ? कौन शब्द सहित सारे रूपों को निगल जाती है ? कौन उछलउछल कर चलता है ? कौन सरकसरक कर चलता है ? ( ५५ ) अजारे पिशङ्गिला श्वावित्कुरुपिशङ्गिला. शश ऽ आस्कन्दमर्षत्यहिः पन्थां वि सर्पति.. (५६) हे अध्वर्युओ! माया सब को निगलती है. वही विचित्र रूपों में शब्द को निगल जाती है. खरगोश उछलता है. विशेषतया सांप मार्ग पर सरकसरक कर चलता है. ( ५६ ) कत्यस्य विष्ठाः कत्यक्षराणि कति होमासः कतिधा समिद्धः. यज्ञस्य त्वा विदथा पृच्छमत्र कति होतार ऽ ऋतुशो यजन्ति.. (५७) इस यज्ञ में कितने अन्न हैं ? इस यज्ञ में कितने अक्षर हैं ? होम कितने ( प्रकार के ) होते हैं ? समिधाएं कितने ( प्रकार की ) होती हैं ? आप यज्ञ ( विद्या ) को विशेष प्रकार से जानते हैं. हम आप से यह जानना चाहते हैं कि प्रत्येक ऋतु में कितने होता यज्ञ करते हैं. ( ५७ ) षडस्य विष्ठाः शतमक्षराण्यूशीतिर्होमाः समिधो ह तिस्रः. यज्ञस्य ते विदथा प्र ब्रवीमि सप्त होतार ऽ ऋतुशो यजन्ति.. (५८) इस यज्ञ में छह प्रकार के अन्न हैं. इस यज्ञ में सौ अक्षर हैं. अस्सी प्रकार के होम होते हैं. समिधाएं तीन प्रकार की होती हैं. प्रत्येक ऋतु में सात होता यज्ञ करते हैं. ( ५८ ) को अस्य वेद भुवनस्य नाभिं को द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्. कः सूर्यस्य वेद बृहतो जनित्रं को वेद चन्द्रमसं यतोजाः.. (५९) कौन है, जो इस लोक की नाभि को जानता है ? कौन है, जो स्वर्गलोक को जानता है ? कौन है जो अंतरिक्षलोक को जानता है ? कौन है, जो सूर्य की उत्पत्ति को जानता है ? कौन है, जो चंद्रमा की उत्पत्ति को जानता है ? ( ५९ ) वेदाहमस्य भुवनस्य नाभिं वेद द्यावापृथिवी अन्तरिक्षम्. वेद सूर्यस्य बृहतो जनित्रमथो वेद चन्द्रमसं यतोजाः.. (६०) मैं ( परमात्मा ) इस लोक की नाभि को जानता हूं. मैं स्वर्गलोक को जानता हूं. मैं अंतरिक्षलोक को जानता हूं. मैं सूर्य व चंद्र देव की उत्पत्ति को जानता हूं. ( ६० ) पृच्छामि त्वा परमन्तं पृथिव्याः पृच्छामि यत्र भुवनस्य नाभिः. पृच्छामि त्वा वृष्णो अश्वस्य रेतः पृच्छामि वाचः परमं व्योम.. (६१) हम यजमान पृथ्वी के परम अंत से पूछते हैं. हम यजमान लोक की नाभि से ३०२ - यजुर्वेद