यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध पच्चीसवां अध्याय आभूषण, सिर एवं पैर को बांधने की मेखलाएं आदि सभी देवताओं को प्रसन्न करने की कृपा करें. ( ३९ ) यत्ते सादे महसा शूकृतस्य पाष्ण्या वा कशया वा तुतोद. स्रुचेव ता हविषो अध्वरेषु सर्वा ता ते ब्रह्मणा सूदयामि.. (४०) हे अश्व! जो आप के पीड़क हैं, जो पीछे और नीचे के भाग के पीड़क हैं, वे त्रुटियां और यज्ञों में हवि संबंधी अन्य त्रुटियां ब्राह्मण स्रुवा की घी की आहुतियों से सुधारते हैं. ( ४० ) चतुस्त्रि ᳵशद्वाजिनो देवबन्धोर्वङ्क्रीरश्वस्य स्वधितिः समेति. अच्छिद्रा गात्रा वयुना कृणोत परुष्परुरनुघुष्या विशस्त.. (४१) हे यजमानो! यह अश्व देवताओं का बंधु है. यह धारण की क्षमता रखता है. सामर्थ्यवान है. चौंतीस शक्तियों से युक्त हो. शरीर छिद्र रहित ( दोष रहित ) हो. देवगण इस की सभी कमियों को दूर करने की कृपा करें. ( ४१ ) एकस्त्वष्टुरश्वस्या विशस्ता द्वा यन्तारा भवतस्तथ ऋतुः. या ते गात्राणामृतुथा कृणोमि ता ता पिण्डानां प्र जुहोम्यग्नौ.. (४२) वर्ष त्वष्टा ( सूर्य ) रूप अश्व को बांटता है. वह उसे दो भागों ( उत्तरायण व दक्षिणायन ) में बांटता है. दोनों भागों को ऋतुओं ( छह ) में बांटता है. शरीर के अंगों के स्वास्थ्य के लिए ऋतु के अनुसार पदार्थों की आहुति अग्नि में भेंट की जाती है. ( ४२ ) मा त्वा तपत्प्रिय ऽ आत्मापियन्तं मा स्वधितिस्तन्व ऽ आ तिष्ठिपत्ते. मा ते गृध्नुरविशस्तातिहाय छिद्रा गात्राण्यसिना मिथू कः... (४३) हे अश्व! अपना प्यारा आत्मतत्त्व सदा आप धारण करते रहें. वह प्यारा आत्मतत्त्व कभी आप को छोड़ कर न जाएं. बांटने वाली शक्तियां कभी आप के शरीर और अंगों पर अधिकार न कर सकें. अनिपुण व्यक्ति भी आप के शरीर तथा किसी अंग पर तलवार न चला सके. उस की तलवार आप के दोषों पर चले. ( ४३ ) न वा उ एतन्म्रियसे न रिष्यसि देवाँ २ इदेषि पथिभिः सुगेभिः. हरी ते युञ्जा पृषती अभूतामुपास्थाद्वाजी धुरि रासभस्य.. (४४) हे अश्व! न आप मारते हैं, न मरते हैं. आप सुगम पथ से देवताओं के पास जाते हैं. घोड़े आप के रथ में जुड़ कर पुष्ट होते हैं. वे शब्द मात्र से ही रथ में जुड़ जाते हैं. घोड़े बहुत वेगवान हैं. ( ४४ ) सुगव्यं नो वाजी स्वश्व्यं पु ᳵश सः पुत्राँ २ उत विश्वापुषं ᳵश रयिम्. अनागास्त्वं नो अदितिः कृणोतु क्षत्रं नो अश्वो वनतां ᳵश हविष्मान्.. (४५) ३२० - यजुर्वेद 632/20