भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 421 में से

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पृष्ठ 336

उत्तरार्ध अट्ठाईसवां अध्याय होता यक्षद्वनस्पति ᳵ शमितार ᳵ शतक्रतुं धियो जोष्टारमिन्द्रियम्. मध्वा समजन्पथिभिः सुगेभिः स्वदाति यज्ञं मधुना घृतेन वेत्वाज्यस्य होतर्यज.. (१०) वनस्पति देव शांतिदाता, सैकड़ों यज्ञ करने वाले, बुद्धि योजक (जोड़ने वाले) और इंद्र देव से संबंधित हैं. वे पथ को सुगम बनाने वाले हैं. यज्ञ को मधुर हवियों से पूरते हैं. वे वनस्पति मधुर हवि को ग्रहण करने की कृपा करें. होता उन वनस्पति देव के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (१०) होता यक्षदिन्द्र ᳵ स्वाहाज्यस्य स्वाहा मेदसः स्वाहा स्तोकाना ᳵ स्वाहा स्वाहाकृतीना ᳵ स्वाहा हव्यसूक्तीनाम्. स्वाहा देवा ऽ आज्यपा जुषाणा ऽ इन्द्र ऽ आज्यस्य व्यन्तु होतर्यज.. (११) इंद्र देव के लिए स्वाहा. आज्य के लिए स्वाहा. मेद के लिए स्वाहा. स्तोत्र के लिए स्वाहा. स्वाहा करने वाले के लिए स्वाहा. हवि के लिए सूक्त गाने वालों के लिए स्वाहा. देवों के लिए स्वाहा. हवि का पान करने वालों के लिए स्वाहा. इंद्र देव हवि का पान करने की कृपा करें. यजमान इंद्र देव के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. (११) देवं बर्हिरिन्द्र ᳵ सुदेवं देवैर्वीरवत्स्तीर्णं वेद्यामवर्धयत्. वस्तोर्वृतं प्राक्तोर्भृत ᳵ राया बर्हिष्मतोत्यगाद्वसुवने वसुधेयस्य वेतु यज.. (१२) हे इंद्र देव! देवता अच्छी वेदी पर बढ़ोतरी पाते हैं. देवताओं की भी बढ़ोतरी करते हैं. देवगण कुश के आसन पर विराजने व हवि का भोग लगाने की कृपा करें. यजमान कुश के आसन से युक्त हैं. यजमान ऐश्वर्य पाने व धन धारण करने के लिए यज्ञ करते हैं. (१२) देवीर्द्वार ऽ इन्द्र ᳵ सङ्घाते वीड्वीर्यामन्नवर्धयन्. आ वत्सेन तरुणेन कुमारेण च मीवतापावार्ण ᳵ रेणुककाटं नुदन्तां वसुवने वसुधेयस्य व्यन्तु यज.. (१३) इंद्र देव देवों के द्वार हैं. सब ने मिल कर उन के पराक्रम व बल की बढ़ोतरी की. इंद्र देव बाल्य, युवा और कुमारावस्था में होने वाले हानिकारी तत्त्वों व धूल भरे बादलों को भी रोकते हैं. वे यजमान को वैभव प्रदान करने व वैभव धारण करने की कृपा करें. वे यजमान के घर में सुखशांति के लिए यज्ञ करने की कृपा करें. हे यजमानो! आप इंद्र देव के लिए यज्ञ कीजिए. (१३) देवी उषासानक्तेन्द्रं यज्ञे प्रत्यह्वेताम्. दैवीर्विशः प्रायासिष्टा ᳵ सुप्रीते सुधिते वसुवने वसुधेयस्य वीतां यज.. (१४) उषा देवी और रात्रि देवी प्रेमिल हैं. यज्ञ में उन का आह्वान कीजिए. वे यजमानों को अच्छी प्रीति और अच्छी बुद्धि के लिए प्रेरित करती हैं. हे यजमानो! आप ३३६ - यजुर्वेद 632/21