यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 34, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध पहला अध्याय वनस्पति से निर्मित हैं. पृथ्वी माता आप को धारण करने की कृपा करें. ( १४ ) अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीतये त्वा गृह्णामि बृहद्ग्रावासि वानस्पत्यः स ऽ इदं देवेभ्यो हविः शमीष्व सुशमि शमीष्व. हविष्कृदेहि हविष्कृदेहि.. (१५) हे मनुष्यो! हवि को मंत्रों के साथ ( अग्नि में ) देवताओं के लिए विसर्जित किया जाता है. हे हवि! आप अग्नि देव का शरीर हो. हवि को तैयार करने वाला ओखल और मूसल विशाल ( बड़े ) पत्थर और वनस्पति से तैयार किया जाता है. इन से देवताओं के लिए हवि तैयार की जाती है. देवताओं को हवि भेंट करने के लिए मूसल ग्रहण किया जाता है. मूसल श्रेष्ठ हवि तैयार कर के देवताओं को सुख प्रदान करें. हे मूसल! आप हवि तैयार करने के लिए आइए ( पधारिए ). ( १५ ) कुक्कुटोसि मधुजिह्व ऽ २४ इषमूर्जमावद त्वया वय २४ संघात २४ संघातं जेष्म वर्षवृद्धमसि प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्तु परापूत २४ रक्षः परापूता ऽ अरातयोपहत २४ रक्षो वायूर्वो विविनक्तु देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृह्णात्वच्छिद्रेण पाणिना.. ( १६) हे शम्य ( यज्ञ में काम आने वाला साधन ) ! आप कुक्कुट हैं यानी मुरगे की तरह जागरूक रहने वाले हैं. आप मधुर जीभ वाले ( मीठा बोलने वाले ) हैं. आप हमें ऊर्जस्वी बनाने और बल प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से हम संघातों ( संघर्षों ) में दृढ़ता व संघातों में विजय प्राप्त करें. हे सूप ! हे हवि! आप प्रतिवर्ष बरसात से बढ़ोतरी पाते हैं. यज्ञ बरसात की बढ़ोतरी करते हैं. यज्ञ देव आप को स्वीकार करने की कृपा करें. आप को पूरी तरह पवित्र बना लिया गया है. अशुद्धियों से आप की रक्षा कर ली गई है. शत्रुओं को दूर कर दिया गया है. वायु आप की रक्षा करें. वे आप के माध्यम से हवि को शुद्ध ( फटकने ) करने की कृपा करें. सविता देव अपने सोने के बिना छेद वाले हाथों से आप को ग्रहण करने की कृपा करें. ( १६ ) धृष्टिरस्यपाग्ने अग्निममादं जहि निष्क्रव्याद २४ सेधा देवयजं वह. ध्रुवमसि पृथिवीं दृ २४ ह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय.. ( १७) हे उपवेष देव ( यज्ञ में काठ का पात्र जो अग्नि धारण करता है ) ! आप धैर्यवान हैं. आप देवताओं के लिए किए जाने वाले यज्ञ ( अग्नि ) को वहन करने की कृपा कीजिए. आप कच्ची चीजों और मांस को पकाने वाली अग्नि छोड़ दीजिए अर्थात् आप इन दोनों अग्नियों को धारण मत कीजिए. आप यज्ञ-अग्नि ( गार्हपत्य ) को धारण करने की कृपा कीजिए. आप ध्रुव ( स्थिर ) हैं. आप पृथ्वी पर दृढ़ता से बने रहने की कृपा कीजिए. आप ब्राह्मणों, क्षत्रियों व श्रेष्ठ जाति वालों को धारण करते हैं. हम शत्रुओं के वध के लिए आप को धारण करते हैं. ( १७ ) ३४ - यजुर्वेद