भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 421 में से

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पृष्ठ 35

पूर्वार्ध पहला अध्याय अग्ने ब्रह्म गृभीष्व धरुणमस्यन्तरिक्षं दृ ᳪ ह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय. धर्त्रमसि दिवं दृ ᳪ ह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय. विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य ऽ उपदधामि चितः स्थोर्ध्वचितो भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम्.. (१८) हे अग्नि! आप ब्राह्मणों को धारण करते हैं. आप अंतरिक्ष को दृढ़ बनाते हैं. आप ब्राह्मणों, क्षत्रियों व श्रेष्ठ जाति वालों को धारण करते हैं. हम शत्रुओं का वध करने के लिए आप को धारण करते हैं. आप सभी को चेतना देते हैं. आप हमें ऊर्ध्वगामी, स्थिरचित्त तथा भृगु और अंगिरस ऋषि के तप की तरह तेजस्वी बनाने की कृपा कीजिए. ( १८ ) शर्मास्यवधूत ᳪ रक्षोवधूता अरातयो दित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु. धिषणासि पर्वती प्रति त्वादित्यास्त्वग्वेत्तु दिवः स्कम्भनीरसि धिषणासि पार्वतेयी प्रति त्वा पर्वती वेत्तु.. (१९) यज्ञ का आसन सुखदायी है. इस आसन से राक्षसों व दुष्टों को हटाया गया है. यह पृथ्वी का आवरण है. इसलिए पृथ्वी इसे अपना जाने. हे सिल ( पत्थर )! आप पर्वत से उत्पन्न कर्मशक्ति हैं. इसलिए पृथ्वी आप को अपना जाने. हे शय्ये! आप स्वर्गलोक की रोक हैं. हे लोढ़े! आप घर्षण ( रगड़ ) करने वाले हैं. आप सिल की पुत्री के समान हैं. इसलिए सिल आप को अपना जाने ( १९ ). धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा. दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृह्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोसि.. (२०) हे हविधान्य! आप देवताओं को तृप्त कीजिए. आप प्राण, उदान ( प्राणवायु ) व्यान ( शरीर में रहने वाली एक वायु ) को धारण करते हैं. आप दीर्घायु देते हैं. पृथ्वी आप को धारण करती है. आप दूध रूप में अमृत हैं. सविता देव छिद्र रहित सोने के हाथों से आप को धारण करने की कृपा करें. ( २० ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. सं वपामि समाप ऽ ओषधीभिः समोषधयो रसेन. सं ᳪ रेवतीर्जगतीभिः पृच्यन्ता ᳪ सं मधुमतीर्मधुमतीभिः पृच्यन्ताम्.. (२१) सविता देव! आप प्रकाश पैदा करते हैं. उस प्रकाश में अश्विनी देव ओषधियों को अपने बाहुओं से बढ़ाते हैं. पूषा देव अपने हाथों से ओषधियों को बढ़ाते हैं. ओषधियां ओषधियों के रस से सिंच जाएं. वे संसार को अपने रस से सींचें और मधुरता प्राप्त करें. वे मधुरतायुक्त जल प्रवाहों से सिंच जाएं. ( २१ ) यजुर्वेद - ३५

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