भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 345, कुल 421 में से

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पृष्ठ 345

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय अन्तरा मित्रावरुणा चरन्ती मुखं यज्ञानामभि संविदाने. उषासा वा १७ सुहिरण्ये सुशिल्पे ऋतस्य योनाविह सादयामि.. (६) हे रात्रि और उषा देवी! आप स्वर्णमयी, श्रेष्ठ शिल्पी व ऋत की योनि हैं. हम यहां आप को स्थापित करते हैं. आप मित्र देव और वरुण देव के बीच भ्रमण करती हैं. आप यज्ञ का मुख हैं. आप यज्ञ को ज्योतित ( प्रकाशित ) करने वाली हैं. ( ६ ) प्रथमा वा १७ सरथिना सुवर्णा देवौ पश्यन्तौ भुवनानि विश्वा. अपिप्रयं चोदना वां मिमाना होतारा ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (७) दोनों देव प्रथम वंदनीय, सारथी युक्त रथ वाले और श्रेष्ठ वर्ण वाले हैं. आप सभी भुवनों को देखते हुए जाते हैं. आप यजमानों को उन के प्रिय कामों के लिए प्रेरित करते हैं. आप दिशाओं और प्रदिशाओं को प्रकाशित करते हैं. ( ७ ) आदित्यैर्नो भारती वष्टु यज्ञ १७ सरस्वती सह रुद्रैर्न ऽ आवीत्. इडोपहूता वसुभिः सजोषा यज्ञं नो देवीरमृतेषु धत्त.. (८) आदित्य गणों के साथ भारती देवी व रुद्रगणों के साथ सरस्वती देवी हमारे यज्ञ की रक्षा करने की कृपा करें. वसुओं के साथ आमंत्रित इड़ा देवी यज्ञ की रक्षा करने व हमारे लिए अमृत धारने की कृपा करें. ( ८ ) त्वष्टा वीरं देवकामं जजान त्वष्टुरर्वा जायत आशुरश्वः. त्वष्टेदं विश्वं भुवनं जजान बहोः कर्तारमिह यक्षि होतः.. (९) त्वष्टा देव ने देवों को चाहने वाली वीर संतान पैदा की. त्वष्टा देव ने शीघ्र जाने वाले अश्व पैदा किए. त्वष्टा देव ने सारा विश्व पैदा किया. त्वष्टा देव बहुरूपी जगत् के कर्ता हैं. होता यज्ञ करने की कृपा करें. ( ९ ) अश्वो घृतेन त्मन्या समक्त उप देवाँ २ ऋतुशः पाथ ऽ एतु. वनस्पतिर्देवलोकं प्रजानन्नग्निना हव्या स्वदितानि वक्षत्.. (१०) हे वनस्पति देव! आप अग्नि की कृपा से घी से घोड़े को भलीभांति सींचिए. अन्नमय हवि को देवों और उपदेवों के पास पहुंचाने की कृपा कीजिए. आप हवि को अन्य देवों के पास पहुंचाने की कृपा कीजिए. ( १० ) प्रजापतेस्तपसा वावृधानः सद्यो जातो दधिषे यज्ञमग्ने. स्वाहाकृतेन हविषा पुरोगा याहि साध्या हविरदन्तु देवाः.. (११) हे अग्नि! आप तुरंत उत्पन्न होते ही बढ़ोतरी को प्राप्त हो जाते हैं. आप यज्ञ को धारण कर लेते हैं. आप अग्रगामी हैं. स्वाहा कर के हवि समर्पित किए जाने पर आप उसे स्वीकार करते हैं. आप आगे चलिए. आप हमारा कार्य साधिए. आप की कृपा से देवगण शीघ्र हमारी हवि को स्वीकारने की कृपा करें. ( ११ ) यजुर्वेद - ३४५