भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 349, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 349

उत्तरार्ध उनतीसवां अध्याय व्यचस्वतीरुर्विया वि श्रयन्तां पतिभ्यो न जनयः शुम्भमानाः. देवीर्द्वारो बृहतीर्विश्वमिन्वा देवेभ्यो भवत सुप्रायणाः.. (३०) जैसे स्त्रियां श्रृंगार कर के पति को थकान रहित करती हैं, वैसे ही दिव्य द्वार वाली विशाल देवियां देवताओं के लिए सुगमता से प्रयास करने वाली हों. (३०) आ सुष्वयन्ती यजते उपा के उषासानक्ता सदतां नि योनौ. दिव्ये योषणे बृहती सुरुक्मे अधि श्रिय छँ शुक्रपिशं दधाने.. (३१) यज्ञ में उषा और रात्रि देवी भलीभांति सुशोभित होने की कृपा करें. दोनों देवियां दिव्य कार्य करने वाली, विशाल, आभूषणों से युक्त व कपिश रंग की हैं, वे भलीभांति अधिष्ठित होने की कृपा करें. (३१) दैव्या होतारा प्रथमा सुवाचा मिमाना यज्ञं मनुषो यजध्यै. प्रचोदयन्ता विदथेषु कारू प्राचीनं ज्योतिः प्रदिशा दिशन्ता.. (३२) विराट् यज्ञ के दो दिव्य होता हैं. वे श्रेष्ठ वाणी बोलने वाले हैं. वे पूर्व दिशा से निकलने वाले सूर्य की किरणों से यज्ञ करते हैं. वे मनुष्यों को यज्ञ आदि श्रेष्ठ कर्म करने की प्रेरणा देते हैं. (३२) आ नो यज्ञं भारती तूयमेत्विडा मनुष्यदिह चेतयन्ती. तिस्रो देवीर्बर्हिरिद छँ स्योन छँ सरस्वती स्वपसः सदन्तु.. (३३) हमारे यज्ञ में भारती देवी, इड़ा देवी और सरस्वती देवी पधारने की कृपा करें. तीनों देवियां मनुष्यों को चेताने और कुश के आसन पर विराजने की कृपा करें. (३३) य ऽ इमे द्यावापृथिवी जनित्री रूपैरपि छँ शद्भुवनानि विश्वा. तमद्य होतरिषितो यजीयान् देवं त्वष्टारमिह यक्षि विद्वान्.. (३४) हे यज्ञकर्ता विद्वान्! आज आप त्वष्टा देव की पूजा करें, जो स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक आदि सभी लोकों की रचना करते हैं. (३४) उपावसृज त्मन्या समञ्जन् देवानां पाथ ऽ ऋतुथा हवीछंषि. वनस्पतिः शमिता देवो अग्निः स्वदन्तु हव्यं मधुना घृतेन.. (३५) हे यजमानो! आप देवताओं को पाथेय प्रदान कीजिए. आप देवताओं की आहुतियों को मधुर घी से सींचिए. वनस्पति देव, शमिता देव और अग्नि इन हवियों को ग्रहण करने की कृपा करें. (३५) सद्यो जातो व्यमिमीत यज्ञमग्निर्देवानांमभवत् पुरोगाः. अस्य होतुः प्रदिश्यृतस्य वाचि स्वाहाकृत छँ हविरदन्तु देवाः.. (३६) यजुर्वेद - ३४९