यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 357, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तीसवां अध्याय शत्रुओं के नाश हेतु तलवार वाले को, मनोरंजन हेतु बौने को, द्वार हेतु मेहनती को नियुक्त किया जाना चाहिए. सपने के लिए चक्षुहीन का, अधर्म के लिए बहरे का अनुकरण करना चाहिए. पवित्रता के लिए वैद्य, अच्छे ज्ञान के लिए नक्षत्र विज्ञानी, अशिक्षा हेतु प्रश्नकर्ता, उपशिक्षा हेतु अभिप्रश्न कर्ता और मर्यादा के लिए प्रश्न कर्त्ता को नियुक्त करना चाहिए. (१०) अर्मेभ्यो हस्तिपं जयायाश्वपं पुष्ट्यै गोपालं वीर्यायाविपालं तेजसेजपालमिरायै कीनाशं कीलालाय सुराकारं भद्राय गृहप ᳪ श्रेयसे वित्तधमाध्यक्षायानुक्षत्तारम्.. (११) भारी वाहन हेतु हाथी पालक को, तेज गति हेतु अश्व पालक को, पुष्टि हेतु ग्वाले को, वीर्य हेतु भेड़ पालक को, तेज हेतु बकरी पालक को, अन्नवृद्धि हेतु किसान को, अमृत जैसे पेय हेतु अमृत विशेषज्ञ को, सुख कल्याण हेतु गृहपति, श्रेय हेतु धनवान को, अध्यक्षता हेतु निरीक्षक को नियुक्त किया जाना चाहिए. (११) भायै दार्व्वाहारे प्रभाया ऽ अग्न्येधं ब्रध्नस्य विष्टपायाभिषेक्तारं वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारं देवलोकाय पेशितारं मनुष्यलोकाय प्रकरितार ᳪ सर्वेभ्यो लोकेभ्य ऽ उपसेक्तारमव ऋत्यै वधायोपमन्थितारं मेधाय वास: पल्पूलीं प्रकामाय रजयित्रीम्.. (१२) अग्नि हेतु लकड़हारे, प्रकाश हेतु अग्नि जलाने वाले, गरमी के लिए जल बरसाने वाले को, स्वर्ग जैसे सुख हेतु चारों ओर से घेरने वाले को, देवलोक हेतु सुंदर आकार बनाने वाले को, मनुष्यलोक हेतु प्रसार करने वाले को, सभी लोकों के लिए संतोष देने वाले को, वध के लिए हल्ला मचाने वाले को नियुक्त किया जाना चाहिए. बुद्धि पाने के लिए वस्त्र क्षालन, शोभा हेतु चित्रकारी के ज्ञाता का अनुकरण करना चाहिए. (१२) ऋतये स्तेनहृदयं वैरहत्याय पिशुनं विविक्तयै क्षत्तार मौपद्रष्ट्र्यायानुक्षत्तारं बलायानुचरं भूम्ने परिष्कन्दं प्रियाय प्रियवादिन मरिष्ट्या ऽ अश्वसाद ᳪ स्वर्गाय लोकाय भागदुघं वर्षिष्ठाय नाकाय परिवेष्टारम्.. (१३) शत्रु के लिए गुप्त हृदय वाला, वैरी की हत्या हेतु चुगलखोर, भेद के लिए भेद करने वाले को, निरीक्षण के लिए निरीक्षक को, बल हेतु आज्ञा पालक को, क्षेत्र विशेष हेतु भ्रमणशील को, प्रिय के लिए प्रिय बोलने वाले को, अरिष्ट निवारण हेतु घुड़सवार को, स्वर्ग के लिए भाग्यदोहक को अच्छे सुख के लिए सब ओर से वेष्टित (घेरने) वाले को नियुक्त करना चाहिए. (१३) मन्यवेयस्तापं क्रोधाय निसरं योगाय योक्तार ᳪ शोकायाभिसर्त्तारं क्षेमाय विमोक्तार मुत्कूलनिकूलेभ्यस्त्रिष्ठिनं वपुषे मानस्कृत ᳪ शीलायाञ्जनीकारीं निर्ऋत्यै कोशकारीं यमायासूम्.. (१४) क्रोध लोहे को भी ताप देने वाला होता है. क्रोध की शांति हेतु जग को निस्सार यजुर्वेद - ३५७