यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय उस परम पुरुष ने स्वर्ग को उग्र बनाया. उस ने पृथ्वी को दृढ़ बनाया. उस ने स्वर्ग को स्थिर बनाया. उस ने अंतरिक्ष में शोभा रची. हम ( उन के अलावा ) अब किस देव के लिए हवि का विधान करें ? ( ६ ) यं क्रन्दसी अवसा तस्तभाने अभ्यैक्षेतां मनसा रेजमाने. यत्राधि सूर ऽ उदितो विभाति कस्मै देवाय हविषा विधेम. आपो ह यद्बृहतीर्यश्चिदापः... (७) जिस को परम पुरुष की शक्ति से ज्ञानी जन मन के द्वारा सब ओर देखते हैं, जहां प्रकाशवान सूर्य उदय हो कर चमकता है, ( अब हम उन के अलावा ) किस देव के लिए हवि का विधान करें. 'आपो ह यद् बृहतीः' और 'यश्चिदापः' में उसी परम शक्ति का गुणगान किया गया है. ( ७ ) वेनस्तत्पश्यन्निहितं गुहा सद्यत्र विश्वं भवत्येकनीडम्. तस्मिन्निद ६० सं च वि चैति सर्व ६० स ओतः प्रोतश्च विभूः प्रजासु.. (८) वह परम पुरुष सभी में गुप्त रूप से मौजूद है, जो सब का आश्रयदाता है, जो सब पर दृष्टि रखता है. सभी प्राणी प्रलय में उस में लीन हो जाते हैं. सभी में वही ओतप्रोत है. प्रजाओं में वही प्रकाशवान है. ( ८ ) प्र तद्वोचेदमृतं नु विद्वान् गन्धर्वो धाम विभृतं गुहा सत्. त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुः पितासत्.. (९) परम पुरुष अमर है. विद्वान् पुरुष उस के बारे में कुछ कह सकते हैं. उस का धाम दिव्य है जो गुप्त रूप से सब में विद्यमान है, जिस में तीन पद गुप्त रूप से निहित हैं, जो ज्ञाता और जो पिता का भी पिता है. ( ९ ) स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामानि वेद भुवनानि विश्वा. यत्र देवा ऽ अमृतमानशानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त.. (१०) वह परम पुरुष सब का बंधु है. वह सब को उपजाने वाला, विधाता, आश्रय दाता और सारे लोकों और लोगों का ज्ञाता है. उस के वहां तीसरे धाम में अमर देवता आनंदपूर्वक विचरण करते हैं. ( १० ) परीत्य भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च. उपस्थाय प्रथमजामृतस्यात्मनात्मानमभि सं विवेश.. (११) वह परम पुरुष सभी प्राणियों व समस्त लोकों को घेरे हुए है. वह सभी दिशाओं में व्याप्त है. वह सभी उपदिशाओं को घेरे हुए है. वह अजन्मा व अमर है. सभी ज्ञानी आत्मरूप को जान कर अपने आत्मरूप का इस में समावेश कर देते हैं. ( ११ ) ३६६ - यजुर्वेद