भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 367

उत्तरार्ध बत्तीसवां अध्याय परि द्यावापृथिवी सद्य ऽ इत्वा परि लोकान् परि दिशः परि स्वः. ऋतस्य तन्तुं विततं विचृत्य तदपश्यत्तदभवत्तदासीत्.. (१२) परम पुरुष स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक में परिव्याप्त है. वह लोकों व दिशाओं में व्याप्त है. वह अपनेआप में परिव्याप्त है. फैले हुए सत्य के तंतु को जान कर ज्ञानी वैसे ही हो जाते हैं और देखते हैं, जैसे पहले थे. ( १२ ) सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्. सनिं मेधामयासिष ष्ठ स्वाहा.. (१३) परम पुरुष को सभी पाना चाहते हैं. वह अद्भुत, इंद्र देव का प्रिय व काम्य है. हम उस से ( श्रेष्ठ ) बुद्धि व ( श्रेष्ठ ) धन चाहते हैं. परम पुरुष के लिए स्वाहा. ( १३ ) यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते. तया मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा.. (१४) हे अग्नि! जिस श्रेष्ठ बुद्धि की देवतागण और पितरगण उपासना करते हैं, उस बुद्धि से आप हमें बुद्धिमान बनाने की कृपा कीजिए. अग्नि के लिए स्वाहा. ( १४ ) मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः. मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा.. (१५) वरुण, अग्नि व प्रजापति हमें बुद्धि प्रदान करें. इंद्र देव बुद्धि धारण करते हैं. वे हमें बुद्धि प्रदान करें. इन सभी देवों के लिए स्वाहा. ( १५ ) इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे श्रियमश्नुताम्. मयि देवा दधतु श्रियमुत्तमां तस्यै ते स्वाहा.. (१६) परम पुरुष हमें यह ब्रह्मज्ञान और क्षात्र तेज इन दोनों से युक्त करें ( शोभित करने की कृपा करें ). हमें देवता श्रेष्ठ शोभा धारण कराने की कृपा करें. इसी के लिए उन्हें यह आहुति प्रदान करते हैं. ( १६ ) यजुर्वेद - ३६७