यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 371, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय आपश्चित्पिप्यु स्तर्यो न गावो नक्षन्नृतं जरितारस्त ऽ इन्द्र. याहि वायुर्न नियुतो नो अच्छा त्व ँहि हि धीभिर्दायसे वि वाजान्.. (१८) हे इंद्र देव! यजमान यज्ञ में आप का ध्यान करते हैं. आप के लिए मंत्र गाते हैं. आप के लिए जल व शक्ति की बढ़ोतरी करते हैं. आप हमारे पास आइए. आप आने के लिए वायु जैसे वेगशाली घोड़े जोतिए. आप हमें अन्न व बल दीजिए. ( १८ ) गाव ऽ उपावतावतं मही यज्ञस्य रप्सुदा. उभा कर्णा हिरण्यया.. (१९) सूर्य की किरणें यज्ञ व पृथ्वी की रक्षा करती हैं. किरणों के दोनों कान स्वर्णमय हैं. ( १९ ) यदद्य सूर ऽ उदितेनागा मित्रो अर्यमा. सुवाति सविता भगः.. (२०) आज सूर्य के उदित होने पर निष्छल यजमानों को मित्र और अर्यमा देव श्रेष्ठ कामों में लगाने की कृपा करें. सविता देव सौभाग्यशाली बनाएं. वे श्रेष्ठ कामों में लगाएं. ( २० ) आ सुते सिञ्चत श्रिय ँ रोदस्योरभिश्रियम्. रसा दधीत वृषभम्. तं प्रत्नथायं वेनः.. (२१) यजमानगण प्रवहमान सोमरस को सिंचित करते हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के संरक्षण में सोम का प्रवाह बहुत तेज होता है. वह शोभायमान होता है. ( २१ ) आतिष्ठन्तंपरि विश्वे अभूषञ्छ्रियो वसानश्चरति स्वरोचिः. महत्तद्वृष्णो असुरस्य नामा विश्वरूपो अमृतानि तस्थौ.. (२२) इंद्र देव प्रकाशमान और वैभववान हैं. सभी देवताओं ने मिल कर उन की प्रतिष्ठा की है. सभी देव चारों ओर से घेर कर उन की उपासना करते हैं. वे महान् व विश्वरूप हैं. कई असुरों को मार कर उन्होंने ख्याति पाई है. वे अमर हैं. ( २२ ) प्र वो महे मन्दमानायान्धसोर्चा विश्वानराय विश्वाभुवे. इन्द्रस्य यस्य सुमख ँ सहो महि श्रवो नृम्णं च रोदसी सपर्यतः.. (२३) हे यजमानो! इंद्र देव महिमाशाली, सब लोकों के पालक, संपूर्ण जग को उपजाने वाले व मदमस्त बनाने वाले हैं. हम उन की अर्चना करते हैं. इंद्र देव के लिए श्रेष्ठ यज्ञ किए जाते हैं. उन की महिमा सुनी जाती है, जो पृथ्वी और स्वर्ग दोनों लोकों को महान् वैभव प्रदान करते हैं. ( २३ ) बृहन्निदिध्म ऽ एषां भूरि शस्तं पृथुः स्वरुः. येषामिन्द्रो युवा सखा.. (२४) यजुर्वेद - ३७१