यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 370, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय हे अग्नि! आप हमें अपनी महत्ता प्रदान कीजिए. आप हमारे सौभाग्य में बढ़ोतरी कीजिए. स्वर्गलोक से आप और अधिक यशस्वी हों. आप यजमान जोड़े को प्रेम भाव से जोड़िए. यजमान से शत्रुभाव रखने वालों की साख ( प्रतिष्ठा ) गिराइए. ( १२ ) त्वा हि मन्द्रतममर्कशोकैर्ववृमहे महि नः श्रोष्यग्ने. इन्द्रं न त्वा शवसा देवता वायुं पृणन्ति राधसा नृतमाः.. (१३) हे अग्नि! आप के लिए महिमामय स्तोत्र गा रहे हैं. आप उन्हें सुनने की कृपा कीजिए. आप विचारक हैं. हम सूर्य की तरह आप का वरण करते हैं. आप इंद्र देव की तरह बलवान और वायु की भांति बलशाली हैं. हम आप को धनधान्य भरी आहुतियों से परिपूर्ण करते हैं. ( १३ ) त्वे अग्ने स्वाहुत प्रियासः सन्तु सूरयः. यन्तारो ये मघवानो जनानामूर्वान् दयन्त गोनाम्.. (१४) हे अग्नि! हम आप के लिए श्रेष्ठ आहुति भेंट करते हैं. शूरवीर आप के प्रिय हो जाते हैं. जो धनवान और ऊर्जावान हैं, उन के प्रति आप दयावान हैं. उन पर गोधन आदि की कृपा करते हैं. ( १४ ) श्रुधि श्रुत्कर्ण वह्निभिर्देवैरग्ने सयावभिः. आ सीदन्तु बर्हिषि मित्रो अर्यमा प्रातर्यावाणो अध्वरम्.. (१५) हे अग्नि! आप श्रेष्ठ कानों वाले हैं. आप हमारे द्वारा की गई स्तुतियों को सुनते हैं. हम देवताओं के लिए अग्नि में जो आहुति अर्पित करते हैं. आप उस हवि को वहन करते हैं. आप हमारे प्रातःकालीन यज्ञों में मित्र देव व अर्यमा देव के साथ आइए. आप उन के साथ कुश के आसन पर विराजने की कृपा कीजिए. ( १५ ) विश्वेषामदितिर्यज्ञियानां विश्वेषामतिथिर्मानुषाणाम्. अग्निर्देवानामव आवृणानः सुमृडीको भवतु जातवेदाः.. (१६) अग्नि! आप सर्वज्ञाता, देवों में अदिति देव जैसे ( वर्चस्वी ), यज्ञ करने योग्य, मनुष्यों के लिए अतिथि जैसे आदरणीय व प्रकाशमान हैं. आप देवताओं तक हमारी हवि पहुंचाने व हमें भरपूर सुख प्रदान करने की कीजिए. ( १६ ) महो अग्नेः समिधानस्य शर्मण्यनागा मित्रे वरुणे स्वस्तये. श्रेष्ठे स्याम सवितुः सवीमनि तद्देवानामवो अद्या वृणीमहे.. (१७) हे अग्नि! आप महिमाशाली व समिधावान हैं. हम आप का संरक्षण पाना चाहते हैं. हम अपने कल्याण के लिए मित्र और वरुण देव की उपासना करते हैं. हम सविता देव की कृपा से श्रेष्ठता प्राप्त करें. अर्थात् श्रेष्ठ हो जाएं. हम देवताओं को हवि प्रदान करने के लिए आप का वरण करते हैं. ( १७ ) ३७० - यजुर्वेद