यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 369, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः. यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विभवं विशे विशे.. (६) यह अग्नि अग्रगण्य हैं. यज्ञ में सर्वप्रथम इन्हीं का ध्यान किया जाता है. यह यजमानों के होता व यज्ञ में उपासनीय हैं. यज्ञों में विशेष रूप से इन्हें प्रतिष्ठित किया जाता है. इन अग्नि को अप्नवान, भृगु, विरुरुचु आदि ऋषियों ने वनों में बारबार प्रतिष्ठित किया है. (६) त्रीणि शता त्री सहस्राण्यग्निं त्रि ᳪ शच्च देवा नव चासपर्यन. औक्षन् घृतैरस्तृणन् बर्हिरस्मा आदिद्धोतारं न्यसादयन्त.. (७) हे यजमानो! तीन हजार, तीन सौ तीस और नौ अर्थात् तैंतीस सौ उनतालीस देवता अग्नि की उपासना करते हैं. देवगण घी की आहुतियों से अग्नि को सींचते हैं. अग्नि के विराजने के लिए कुश का आसन बिछाते हैं. उन्हें होता के रूप में प्रतिष्ठित कर के यज्ञ करते हैं. (७) मूर्धानं दिवो अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽ आ जातमग्निम्. कवि ᳪ साम्राज्यमतिथिं जनानामासन्ना पात्रं जनयन्त देवाः.. (८) अग्नि मूर्धन्य, स्वर्गलोक में भी श्रेष्ठ, पृथ्वीलोक को सूर्य के रूप में जगमगाने वाले व वैश्वानर हैं. वे यज्ञ में उत्पन्न होने वाले, कवि, सम्राट्, यजमान के अतिथि हैं. देवताओं के आह्वाहक हैं. यजमानों ने अपनी रक्षा हेतु पात्र में अग्नि को उपजाया. (८) अग्निर्वृत्राणि जङ्घनद्द्रविणस्युर्विपन्यया. समिद्धः शुक्र ऽ आहुतः.. (९) अग्नि वृत्र को मारते हैं ( नष्ट करते हैं). अग्नि धनवान व प्रकाशमान हैं. समिधा से उन्हें प्रदीप्त किया जाता है. उन को आहुति समर्पित करते हैं. (९) विश्वेभिः सोम्यं मध्वग्न ऽ इन्द्रेण वायुना. पिबा मित्रस्य धामभिः.. (१०) हे अग्नि! आप इंद्र देव, वायु, मित्र देव व सभी देवताओं के साथ आइए. आप इन सब के साथ मधुर सोमरस का पान करने की कृपा कीजिए. (१०) आ यदिषे नृपतिं तेज ऽ आनट् शुचि रेतो निषिक्तं द्यौरभीके. अग्निः शर्धमनवद्यं युवान ᳪ स्वाध्यं जनयत् सूदयच्च.. (११) जब अग्नि में अन्न और पवित्र जल से शुद्ध हवि से यजन किया जाता है, तब अग्नि जल से सींचते हैं. यह जल बलशाली बनाता है. यह सुखवर्द्धक, निरंतर प्रवाहित होने वाला, युवा बनाने वाला व जग के लिए उपजाऊ है. (११) अग्ने शर्ध महते सौभगाय तव द्युम्नान्युत्तमानि सन्तु. सं जास्पत्य ᳪ सुयममा कृणुष्व शत्रूयतामभि तिष्ठा महा ᳪ सि.. (१२) यजुर्वेद - ३६९