यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 382, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध तैंतीसवां अध्याय आ यातमुप भूषतं मध्वः पिबतमश्विना. दुग्धं पयो वृषणा जेन्यावसू मा नो मर्धिष्टमा गतम्.. (८८) हे अश्विनीकुमारो! आप यज्ञ में आने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ की शोभा बढ़ाइए. आप यज्ञ में दूध और रसों को पीने व धन बरसाने की कृपा कीजिए. (८८) प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र देव्येतु सूनृता. अच्छा वीरं नर्यं पङ्क्तिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः.. (८९) हे अश्विनीकुमारो! आप यज्ञ में पधारने, दिव्य तथा सत्यवाणी प्रदान करने की कृपा कीजिए. देवगण मनुष्यों के हितैषी हैं. वे यज्ञ में पंक्ति में पधारें और शत्रुनाश की कृपा करें. (८९) चन्द्रमा ऽ अप्स्वन्तरा सुपर्णो धावते दिवि. रयिं पिशङ्गं बहुलं पुरुस्पृहं ६४ हरिरेति कनिक्रदत्.. (९०) सोम देव चंद्रमा के भीतर से निकले हैं. सोम देव दीप्तिमान ( चमकदार ) व रंगबिरंगे हैं. वे घन गर्जना के साथ स्वर्गलोक की ओर दौड़ते हैं. वे हम पर धन की वर्षा करने की कृपा करें. (९०) देवं देवं वोवसे देवं देवमभिष्टये. देवं देव ६४ हुवेम वाजसातये गृणन्तो देव्या धिया.. (९१) हम अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए देव का आह्वान करते हैं. हम अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिए देव को हवि समर्पित करते हैं. हम बुद्धिपूर्वक देवता का आह्वान करते हैं. (९१) दिवि पृष्ठो अरोचताग्निर्वैश्वानरो बृहन्. क्ष्मया वृधान ऽ ओजसा चनोहितो ज्योतिषा बाधते तमः.. (९२) वैश्वानर देव स्वर्गलोक के पृष्ठ देश में दीप्त हैं. वैश्वानर देव हवि से बढ़ोतरी पाते हैं. वैश्वानर देव दीप्ति से अंधकार नष्ट करते हैं. (९२) इन्द्राग्नी अपादियं पूर्वागात् पद्धतीभ्यः. हित्वी शिरो जिह्वया वावदच्चरत्त्रि ६४ शतपदा न्यक्रमीत्.. (९३) हे इंद्र देव! उषा देवी पैर रहित हो कर भी पैर वालों से पूर्व आती हैं. हे अग्नि! सिर रहित होने पर भी प्राणियों के सिर प्रेरित करती हैं. हे अग्नि! मनुष्यों की जिह्वा से बोलती हुई आगे बढ़ती हैं. दिन में सैकड़ों पैरों से बढ़ती हैं. (९३) देवासो हि ष्मा मनवे समन्यवो विश्वे साकं ६४ सरातयः. ते नो अद्य ते अपरं तुचे तु नो भवन्तु वरिवोविदः.. (९४) ३८२ – यजुर्वेद