भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 387, कुल 421 में से

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पृष्ठ 387

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय हमारे पूर्वजों और पितरों ने अर्चना की. पद जान कर अंगिरस ऋषि की तरह मंत्र गाए और मार्ग दर्शन प्राप्त किया. ( १७ ) इच्छन्ति त्वा सोम्यासः सखायः सुन्वन्ति सोमं दधति प्रया ऽ४ सि. तितिक्षन्ते अभिशस्तिं जनानामिन्द्र त्वदा कश्चन हि प्रकेतः.. (१८) हे इंद्र देव! आप सोम जैसा सखाभाव चाहते हैं. आप सोमरस निचोड़ते हैं. आप सोमरस धारण करते हैं. सोम मनुष्यों का कठोर व्यवहार सहते हुए भी सोमरस प्रदान करते हैं. अन्न बल को धारते हैं. ( १८ ) न ते दूरे परमा चिद्रजा ऽ४ स्या तु प्र याहि हरिवो हरिभ्याम्. स्थिराय वृष्णे सवना कृतेमा युक्ता ग्रावाणः समिधाने अग्नौ.. (१९) हे इंद्र देव! आप के लिए परम ( अतीव ) दूर स्थान भी दूर नहीं है. आप हरि नामक घोड़ों को जोतिए और हरि की ( घोड़े की ) तरह आने की कृपा कीजिए. हम आप से अपनी स्थिरता व बल की कामना करते हैं. प्रातः संध्या सवन में यज्ञ किया जा रहा है. यह पत्थर सोम निचोड़ने के लिए है. यह समिधा अग्नि प्रज्वलित करने के लिए है. ( १९ ) अषाढं युत्सु पृतनासु पप्रि ऽ४ स्वर्षांमप्सां वृजनस्य गोपाम्. भरेषुजा ऽ४ सुक्षिति ऽ४ सुश्रवसं जयन्तं त्वामनु मदेम सोम.. (२०) हे सोम! आप युद्धों में बहुत अधिक पराक्रम प्रदर्शित करते हैं. आप शत्रुजयी, सेना, गोपालक, बल रक्षक व उत्तम वास स्थान वाले हैं. आप विजेता, यशस्वी हैं. हे सोम! आप हमें आनंदित करते हैं. हम आप का अनुकरण करते हैं. ( २० ) सोमो धेन ऽ४ सोमो अर्वन्तमाशु ऽ४ सोमो वीरं कर्मण्यं ददाति. सादन्यं विदथ्य ऽ४ सभेयं पितृश्रवणं यो ददाशदस्मै.. (२१) सोम उन यजमानों को दुधारू गाएं प्रदान करते हैं, जो उन्हें आहुति प्रदान करते हैं. ऐसे यजमानों को वेगवान घोड़े प्रदान करते हैं. वे यजमानों को वीर पुत्र प्रदान करते हैं. सोम घरेलू पुत्र प्रदान करते हैं. वे कर्मशील पुत्र प्रदान करते हैं. वे पितृकर्म में दक्ष व आज्ञापालक पुत्र प्रदान करते हैं. ( २१ ) त्वमिमा ओषधीः सोम विश्वास्त्वमपो अजनयस्त्वं गाः. त्वमा ततन्थोर्वन्तरिक्षं त्वं ज्योतिषा वि तमो ववर्थ.. (२२) हे सोम! आप इन सभी ओषधियों को उपजाते हैं. आप ने जल को उपजाया. आप ने गायों को उपजाया. आप ने अंतरिक्ष का विस्तार किया. आप ने संसार को ज्योतिष्मान बनाया. आप ने अंधकार दूर करने की कृपा की. ( २२ ) यजुर्वेद - ३८७