यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 386, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय हे अग्नि! आप प्रथम पूजनीय हैं. अंगिरा ऋषि ने आप को प्रकट किया है. आप देवों के देव हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी हों. आप के व्रत से मरुद्गण कवि और विद्वान् हुए हैं. आप हमारे लिए मित्र हों. आप के व्रत से मरुद्गण ज्ञाता हुए हैं. आप के व्रत से मरुद्गण सर्वद्रष्टा हुए हैं. आप के व्रत से मरुद्गण उत्तम आयुधों से युक्त हुए हैं. (१२) त्वं नो अग्ने तव देव पायुभिर्मघोनों रक्ष तन्वश्च वन्द्य. त्राता तोकस्य तनये गवामस्यनिमेष ऽ रक्षमाणस्तव व्रते.. (१३) हे अग्नि! आप हमारे हैं. आप हमारी रक्षा करने व हमें धनवान बनाने की कृपा कीजिए. आप हमारे शरीर को पुष्ट बनाने की कृपा कीजिए. आप वंदनीय व रक्षक हैं. आप हमारी संतान की रक्षा करने की कृपा कीजिए. हमारी गायों की व लगातार हमारी रक्षा करने की कृपा कीजिए. (१३) उत्तानायामव भरा चिकित्वात्सद्यः प्रवीता वृषणं जजान. अरुषस्तूपो रुशदस्य पाज ऽ इडायास्पुत्रो वयुनेजनिष्ट.. (१४) हे अग्नि! आप पृथ्वी से उत्पन्न हैं. ज्ञान पूर्ण कर्म से अग्नि का प्रादुर्भाव हुआ है. वे शीघ्र ही अरणि मंथन से प्रज्वलित होते हैं. वे तेजोमय व अद्भुत हैं. वे वायु से और अधिक प्रसार पाते हैं. (१४) इडायास्त्वा पदे वयं नाभा पृथिव्या ऽ अधि. जातवेदो निधीमह्याग्ने हव्याय वोढवे.. (१५) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. हम पृथ्वी के मध्य नाभि में आप की स्थापना करते हैं. हम हवि रूप निधि आप को समर्पित करते हैं. आप उसे वहन करने की कृपा कीजिए. (१५) प्र मन्महे शवसानाय शूषमाङ्गूषं गिर्वणसे अङ्गिरस्वत्. सुवृक्तिभिः स्तुवत ऽ ऋग्मियायार्चा्मार्कं नरे विश्रुताय.. (१६) इंद्र देव शक्ति की चाह रखते हैं. वे श्रेष्ठ वाणी वाले हैं. वे विद्वान् हैं. हम अंगिरा ऋषि की ही तरह उन की स्तुति करते हैं. अच्छी स्तुतियों से हम उन की स्तुति करते हैं. मनुष्यों के नेतृत्व के लिए प्रख्यात उन की ऋग्वेद के मंत्रों से अर्चना करते हैं. (१६) प्र वो महे महि नमो भरध्वमाङ्गूष्य ऽ शवसानाय साम. येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञा ऽ अर्चन्तो अङ्गिरसो गा ऽ अविन्दन्.. (१७) हे यजमानो! आप महा महिमाशली इंद्र देव को नमस्कार कीजिए. यजमानो! आप महा महिमाशाली इंद्र देव की प्रसन्नता के लिए हवि भेंट कीजिए, जिस से ३८६ - यजुर्वेद