यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 385, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय यजुर्वेद के मंत्र प्रतिष्ठित हैं, जिस मन में प्रजाओं के चित्त का ज्ञान ओतप्रोत है, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ५ ) सुषारथिरश्वानिव यन्मनुष्यान्नेनीयतेभीशुभिर्वाजिन ऽ इव. हृत्प्रतिष्ठं यदजिरं जविष्ठं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. ( ६ ) अच्छा सारथी घोड़ों को नियंत्रण में रखता है. निर्धारित स्थान पर ले जाता है. वैसे ही जो मनुष्यों को नियंत्रण में रखता है, उन्हें निर्धारित स्थान पर ले जाता है. जो हृदय में प्रतिष्ठित है, जो अजर है, जो गतिमान है, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ६ ) पितुं नु स्तोषं महो धर्माणं तविषीम्. यस्य त्रितो व्योजसा वृत्रं विपर्वमर्दयत्.. (७) हम अपने पिता इंद्र देव की स्तुति करते हैं. वे महान् और बलवान हैं. उन्होंने वृत्रासुर को मर्दित कर दिया. उन्होंने तीनों लोकों में अपनी शक्ति को प्रतिष्ठित किया. ( ७ ) अन्विदनुमते त्वं मन्यासै शं च नस्कृधि. क्रत्वे दक्षाय नो हिनु प्र ण ऽ आयूं ष्षि ष तारिषः... ( ८ ) हे अनुमते! आप हमारी इच्छाओं का अनुमोदन व हमारा कल्याण करने की कृपा कीजिए. आप हमारे यज्ञ व हमारी आयु की बढ़ोतरी कीजिए. आप हमें तारिए. ( ८ ) अनु नोद्यानुमतिर्यज्ञं देवेषु मन्यताम्. अग्निश्च हव्यवाहनो भवतं दाशुषे मयः... (९) हे अनुमते! आज आप हमारे यज्ञ को देवताओं में मान्यता प्राप्त कराइए. हवि वहन करने वाले अग्नि हमारे प्रति दानशील होने की कृपा करें. ( ९ ) सिनीवालि पृथुष्टुके या देवानामति स्वसा. जुषस्व हव्यमाहुतं प्रजां देवि दिदिद्धि नः... (१०) हे सिनीवाली देवी! आप देवताओं की बहन, बहुत केशों वाली व प्रजा का पालन करने वाली हैं. हम ने हवि ग्रहण करने के लिए आप को आमंत्रित किया है. आप हवि ग्रहण करने व हमें संतान प्रदान करने की कृपा करें. ( १० ) पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः. सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेभवत्सरित्.. (११) पांच नदियां एक जैसी स्रोत वाली सहित सरस्वती नदी में मिल जाती हैं. वही सरस्वती देश में पांच प्रकार से प्रसिद्ध हुई. ( ११ ) त्वमग्ने प्रथमो अङ्गिरा ऽ ऋषिर्देवो देवानामभवः शिवः सखा. तव व्रते कवयो विद्मनापसोजायन्त मरुतो भ्राजदृष्टयः... (१२) यजुर्वेद – ३८५