यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 384, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंचौंतीसवां अध्याय यज्जाग्रतो दूरमुदैति दैवं तदु सुप्तस्य तथैवैति. दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (१) मन जैसा दूर विचरता है वैसे जाग्रत अवस्था में ही सोते में भी दूर विचरता है. मन दूरगामी, प्रकाशमान, प्रकाश का प्रवर्तक व अकेला प्रकाशमान है. हमारा मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो. ( १ ) येन कर्माण्यपसो मनीषिणो यज्ञे कृण्वन्ति विदथेषु धीराः. यदपूर्वं यक्षमन्तः प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (२) मनीषीगण इसी मन से यज्ञ आदि कार्य संपन्न करते हैं. इसी मन से धीर लोग श्रेष्ठ कार्य में लगते हैं. मन अपूर्व व यजमानों में आदरणीय है. हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( २ ) यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृतिश्च यज्ज्योतिरन्तरमृतं प्रजासु. यस्मान्न ऽ ऋते किं चन कर्म क्रियते तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (३) जो सभी प्राणियों में ज्ञानमय, चैतन्य, धैर्यमय व अमृतस्वरूप है, जिस के बिना कोई कार्य नहीं किया जाता है, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ३ ) येनेदं भूतं भुवनं भविष्यत् परिगृहीतममृतेन सर्वम्. येन यज्ञस्तायते सप्तहोता तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (४) जिस अमर मन से सब कुछ जाना जाता है, जिस से भूतकाल, वर्तमानकाल और भविष्यकाल को ग्रहण किया जाता है, जिस से सात पुरोहित ( होता ) यज्ञ का विस्तार करते हैं, हमारा वह मन कल्याणकारी संकल्पों से युक्त हो जाए. ( ४ ) यस्मिन्नृचः साम यजूं ४ षि यस्मिन् प्रतिष्ठिता रथनाभाविवाराः. यस्मिंश्चित्त ४ सर्वमोतं प्रजानां तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु.. (५) जैसे रथ के पहिए में अरे होते हैं, वैसे ही जिस मन में ऋग्वेद, सामवेद और ३८४ - यजुर्वेद 632/24