भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय पूषन् तव व्रते वयं न रिष्येम कदा चन. स्तोतारस्त ऽ इह स्मसि.. (४१) हे पूषा देव! हम स्तोता आप के व्रत में लगें. हम कभी नष्ट न हों. हम यज्ञ में आप की स्तुति करते हैं तथा आप की चाह रखते हैं. ( ४१ ) पथस्पथः परिपतिं वचस्या कामेन कृतो अभ्यानडर्कम्. स नो रासच्छुरुधश्चन्द्राग्रा धियंधिय १॑४ सीषधाति प्र पूषा.. (४२) पूषा देव हमारे पथ दर्शक हैं. मंत्र से कामना किए जाने पर वे राक्षसों का नाश करते हैं और शत्रुनाशक साधन प्रदान करते हैं. वे हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों में साधने की कृपा करें. ( ४२ ) त्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णोर्गोपा ऽ अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (४३) विष्णु ने अपने तीन पैरों में ही संपूर्ण विश्व को धारण कर लिया. वे उस सामर्थ्य से लोकों को धारते हुए विराजमान हैं. ( ४३ ) तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवा १॑४ सः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (४४) जो ब्राह्मण जाग्रत हो कर यज्ञ विधान करते हुए जीवन यापन करते हैं, वे ब्राह्मण विष्णु देव के परम धाम को प्राप्त करते हैं. ( ४४ ) घृतवती भुवनानामभिश्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघे सुपेशसा. द्यावापृथिवी वरुणस्य धर्मणा विष्कभिते अजरे भूरिरेतसा.. (४५) स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक वरुण देव की शक्ति से सुदृढ़ हुए हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक श्रेष्ठ रूप वाले हैं और वृद्धावस्था रहित हैं. प्रभूत ( अत्यंत ) सामर्थ्य का मूल स्रोत हैं. पृथ्वी घीमयी, लोकों का आश्रय स्थली, व्यापक व विशेष मधुर रसों के दोहन की सामर्थ्य रखती है. ( ४५ ) ये नः सपत्ना ऽ अप ते भवन्त्विन्द्राग्निभ्यामव बाधामहे तान्. वसवो रुद्रा ऽ आदित्या ऽ उपरिस्पृशं मोग्रं चेत्तारमधिराजमक्रन्.. (४६) जो हमारे शत्रु हैं, वे हार जाएं. हम उन शत्रुओं को इंद्र देव और अग्नि की क्षमता से बाधित करें. वसुगण हमारे चित्त को उग्र, पराक्रमी व अधिपति बनाने की कृपा करें. रुद्रगण और आदित्यगण हमारे चित्त को उग्र व पराक्रमी और अधिपति बनाने की कृपा करें. ( ४६ ) आ नासत्या त्रिभिरेकादशैर्रिह देवेभिर्यातं मधुपेयमश्विना. प्रायुस्तारिष्टं नी रपा १॑४ सि मृक्षत १॑४ सेधतं द्वेषो भवत १॑४ सचाभुवा.. (४७) अश्विनीकुमार नाशरहित ( अविनाशी ) हैं. आप दोनों ग्यारह से तिगुने ( ११ × ३ = ३३ ) देवताओं सहित पधारिए. आप दोनों ग्यारह से तिगुने देवताओं यजुर्वेद - ३९१