भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 393, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 393

उत्तरार्ध चौंतीसवां अध्याय उत नोहिर्बुध्न्यः शृणोत्वज ऽ एकपात्पृथिवी समुद्रः. विश्वे देवा ऽ ऋतावृधो हुवानाः स्तुता मन्त्राः कविशस्ता ऽ अवन्तु.. (५३) अहिर्बुध्न्य, अज, एकपात, पृथ्वी, समुद्र व सभी देवता हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. ये सभी देव सच की बढ़ोतरी करने की कृपा करें. हम सभी देव का आह्वान करते हैं. हम सभी देव की स्तुति करते हैं. कवि यजमान के ये सभी देवगण रक्षक हों. ( ५३ ) इमा गिर ऽ आदित्येभ्यो घृतस्नूः सनाद्राजभ्यो जुह्वा जुहोमि. शृणोतु मित्रो अर्यमा भगो नस्तुविजातो वरुणो दक्षो अ ᳵ शः... (५४) हम यह वाणीमय व घीमय आहुति आदित्य गणों के लिए अर्पित करते हैं. हम बुद्धि के जुहू ( पलाश की लकड़ी से बना हुआ एक यज्ञपात्र ) से आहुति आदित्य गणों के लिए अर्पित करते हैं. आदित्य देव चिर प्रकाशक हैं. मित्र देव, अर्यमा देव, भग देव, वरुण देव, दक्ष देव हमारी विशिष्ट स्तुति सुनने की कृपा करें. ( ५४ ) सप्त ऋषयः प्रतिहिताः शरीरे सप्त रक्षन्ति सदमप्रमादम्. सप्तापः स्वपतो लोकमीयुरस्तत्र जागृतो अस्वप्नजौ सत्रसदौ च देवौ.. (५५) शरीर में विद्यमान सात प्राण सात ऋषि हैं. ये सातों ऋषि आलस्यरहित हो कर शरीर की रक्षा करते हैं. सोते हुए भी ये सातों लोक में जाग्रत आत्मा को प्राप्त होते हैं. इस स्थिति में भी ये निरंतर प्राणियों की रक्षा में लगे रहते हैं. ( ५५ ) उत्तिष्ठ ब्रह्मणस्पते देवयन्तस्त्वेमहे. उप प्र यन्तु मरुतः सुदानव ऽ इन्द्र प्राशूर्भवा सचा.. (५६) हे ब्रह्मणस्पति! आप उठिए. हम देवत्व धारण करना व आप का आगमन चाहते हैं. हे मरुद्गण! आप अच्छे दानकर्ता हैं. आप हमारे समीप पधारने की कृपा कीजिए. हे इंद्र देव! आप भी शीघ्र ही इन के साथ पधारने व हमारे साथ निवास करने की कृपा कीजिए. ( ५६ ) प्र नूनं ब्रह्मणस्पतिर्मन्त्रं वदत्युक्थ्यम्. यस्मिन्निन्द्रो वरुणो मित्रो अर्यमा देवा ऽ ओका ᳵ सि चक्रिरे.. (५७) निश्चित रूप से ब्रह्मणस्पति विधिविधान के साथ उक्थों को ( वैदिक मंत्रों को ) उच्चारते हैं. इन मंत्रों में इंद्र देव, वरुण देव, मित्र देव, अर्यमा देव व अन्य देव वास करते हैं. ( ५७ ) ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य बोधि तनयं च जिन्व. विश्वं तद्भद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेम विदथे सुवीराः. य ऽ इमा विश्वा विश्वकर्मा यो नः पितान्नपतेन्नस्य नो देहि.. (५८) यजुर्वेद - ३९३