यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 40, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध दूसरा अध्याय वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्त १८ समिधीमहि. अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (४) हे अग्नि! आप यज्ञ में प्रमुख हैं. आप विशाल, तेजस्वी, कवि व भूत और भविष्य को जानने वाले हैं. हम समिधा से आप को प्रज्वलित करते हैं. (४) समिदसि सूर्यस्त्वा पुरस्तात् पातु कस्याश्चिदभिशस्त्यै. सवितुर्बाहू स्थ ऽ ऊर्णम्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थं देवेभ्य ऽ आत्वा वसवो रुद्रा ऽ आदित्याः सदन्तु.. (५) हे समिधा! सूर्य आप की रक्षा करने की कृपा करे. हे कुश! सूर्य आप की रक्षा करने की कृपा करे. समिधा और कुश दोनों ही सविता देव की दोनों भुजाएं हो जाएं. हम यजमान भेड़ के बालों से बने आसन को बिछा रहे हैं. ये आसन हम देवताओं के लिए बिछाते हैं ताकि देवता सुखपूर्वक विराज सकें. वसु, रुद्र व आदित्य पधार कर आसन पर विराजने की कृपा करें. (५) घृताच्यसि जुहूर्नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् घृताच्यस्युपभृन्नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् घृताच्यसि ध्रुवा नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद्. ध्रुवा असदन्नृतस्य योनौ ता विष्णो पाहि पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिं पाहि मां यज्ञन्यम्.. (६) जुहू नामक यज्ञ साधन को घी प्रिय है. (घी) घृत-सिंचन के बाद वह प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. वह यजमानों को घृत देने की कृपा करें. उपभृत नामक यज्ञ साधन को (घी) घृत-सिंचन के बाद वह प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. ध्रुव नामक यज्ञ साधन को घी प्रिय है. घृत-सिंचन के बाद वह अपने प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. हे विष्णु! आप यज्ञस्थान पर पधारने व विराजने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ, साधनों, उसे करने वालों और उस के सहायकों की रक्षा कीजिए. (६) अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा सरिष्यन्तं वाजजित १८ सम्मार्ज्मि. नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः सुयमे मे भूयास्तम्.. (७) हे अग्नि! आप अन्नदाता हैं. शक्तिमान लोग अन्न की प्राप्ति हेतु आप को सम्मार्जित (शुद्ध) करते हैं. हम आहुति के साथ देवताओं व पितरों को नमस्कार करते हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. (७) अस्कन्नमद्य देवेभ्य ऽ आज्य १८ संभ्रियासमङ्घ्रिणा विष्णो मा त्वावक्रमिषं वसुमतीमग्ने ते च्छायामुपस्थेषं विष्णोः स्थानमसीत ऽ इन्द्रो वीर्यमकृणोदूर्ध्वोध्वर ऽ आस्थात्.. (८) हे अग्नि! हम देवताओं को अर्पित करने के लिए पवित्र (शुद्ध) घी ले कर आए हैं. हे अग्नि! इंद्र ने अपने बल से यज्ञ की प्रतिष्ठा बढ़ाई. विष्णु ने अपने बल ४० - यजुर्वेद