यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वाध दूसरा अध्याय से यज्ञ को उन्नति दी. आप अन्नदाता हैं. आप यज्ञ स्थल पर विराजमान हैं. हम आप की छत्रच्छाया में रहना चाहते हैं. हम सदैव यज्ञस्थल की पवित्रता को बनाए रखेंगे.( ८ ) अग्ने वेर्होत्रं वेर्दूत्यमवतां त्वां द्यावापृथिवी अव त्वं द्यावापृथिवी स्विष्टकृद्देवेभ्य ऽ इन्द्र ऽ आज्येन हविषा भूत्स्वाहा सं ज्योतिषा ज्योतिः.. ( ९ ) हे अग्नि! आप यज्ञ की व्यवस्था और विधान को अच्छी तरह जानते हैं. आप देवताओं के दूत हैं. आप पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक तक आहुति पहुंचाने की कृपा करते हैं. आप पृथ्वीलोक व स्वर्गलोक की रक्षा करने की कृपा कीजिए. इंद्र अन्य देवताओं सहित घी की हवि से तृप्त व ज्योति से ज्योति में एकाकार होने की कृपा करें. ( ९ ) मयीदमिन्द्र ऽ इन्द्रियं दधात्वस्मान् रायो मघवानः सचन्ताम्. अस्माक १७ सन्तवाशिषः सत्या नः सन्तवाशिष ऽ उपहूता पृथिवी मातोपमां पृथिवी माता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहा.. ( १० ) हे इंद्र! आप हमें इंद्रमय बनाने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए धन धारण करने, हमें धनवान बनाने, आशीर्वाद प्रदान करने व हमारी आशाएं फलीभूत करने की कृपा कीजिए. आप हमें आशीर्वाद दीजिए. पृथ्वी माता के समान है. हम ने पृथ्वी माता की उपासना की है. हम यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करते हैं. आप हमें अपने जैसा तेजोमय बनाएं. हम आप को लोकहित के लिए आहुति समर्पित करते हैं. ( १० ) उपहूतो द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहा. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. प्रतिगृह्णाम्यग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि.. ( ११ ) हे यजमानो! हम ने स्वर्गलोक के पिता को अपने समीप ( पास ) आमंत्रित किया है. हम ने उस के पिता की उपासना की है. हम अग्नि का आह्वान करते हैं. आहुति हमारा कल्याण करने की कृपा करे. सविता देव ने आहुति उपजाई है. अश्विनीकुमार अपनी भुजाओं से इस हवि को ग्रहण करते हैं. पूषा देव दोनों हाथों से यज्ञ के इस अन्न को ग्रहण करते हैं. सभी देव अग्नि के मुख से अन्न ग्रहण करने ( खाने ) की कृपा करें. ( ११ ) एतन्ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे. तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव.. (१२) हे सविता! हम आप के लिए इस विशाल यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं. आप यज्ञपति हैं. आप इस यज्ञ की व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( १२ ) यजुर्वेद - ४१