भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 401, कुल 421 में से

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पृष्ठ 401

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय दिव्य जल हमारा कल्याण करे. वह हमारे अभीष्टपूरक हो. जल हमारे पीने के लिए हो. वह हमारे लिए सुखदायी हो व हमारे लिए प्रवाहित होने की कृपा करे. ( १२ ) स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरा निवेशनी. यच्छा नः शर्म सप्रथा:.. (१३) हे पृथ्वी देवी! आप वासयोग्य होने की कृपा करें. आप उत्तम वास प्रदान करने की कृपा करें. आप हमें इच्छित सुख प्रदान कीजिए. आप बहुत अधिक विस्तृत होने की कृपा कीजिए. ( १३ ) आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऽ ऊर्जे दधातन. महे रणाय चक्षसे.. (१४) जल हमारे लिए कल्याणदायी हो. वह हमारे लिए ऊर्जा धारण करने की कृपा करें. वह हमें ऊर्जस्वी बनाने की कृपा करें. परमात्मा हमें देखने हेतु महती दृष्टि प्रदान करने की कृपा करें. ( १४ ) यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः. उशतीरिव मातरः.. (१५) जैसे माताएं सर्वाधिक कल्याणदायी रस से बच्चों को पोसती हैं, वैसे ही आप हम सब को सर्वाधिक कल्याणदायी रस ( पोषण हेतु ) सेवन कराने की कृपा करें. ( १५ ) तस्मा ऽ अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ. आपो जनयथा च नः.. (१६) हे जल देव! हम ने क्षय को जीतने के लिए आप तक गमन किया है. आप हम सब जनों का कल्याण करने की कृपा करें. ( १६ ) द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष १७् शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः. वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्व १७् शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि.. (१७) स्वर्गलोक हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. अंतरिक्षलोक हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. पृथ्वीलोक हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. जल देव हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. ओषधि देव हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. वनस्पति देव हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. सब देवगण हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. परब्रह्म हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. शांति भी हमारे लिए शांतिदायी होने की कृपा करें. ( १७ ) दृते दृ १७् ह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम्. मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे. मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे.. (१८) हे परमात्मा! आप दृढ़ हैं. आप हमें दृढ़ बनाने की कृपा कीजिए. हम मित्रभाव की यजुर्वेद - ४०१

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