भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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पृष्ठ 402

उत्तरार्ध छत्तीसवां अध्याय दृष्टि से सभी प्राणियों को देख सकें. सभी प्राणी हमें मित्र भाव से देख सकें. ( १८ ) दृते दृ ꣪ह मा. ज्योक्ते सन्दृशि जीव्यासं ज्योक्ते सन्दृशि जीव्यासम्.. (१९) हे परमात्मा! आप सामर्थ्यवान हैं. आप हमें भी सामर्थ्यशाली बनाइए. आप की ज्योति से हम चिरायु हों. आप की ज्योति से हम चिरकाल तक देखें. ( १९ ) नमस्ते हरसे शोचिषे नमस्ते अस्त्वर्चिषे. अन्याँस्ते अस्मत्तपन्तु हेतयः पावको अस्मभ्य ꣪ह शिवो भव.. (२०) हे अग्नि! आप को नमस्कार. हम आप की अर्चना करते हैं. आप को नमस्कार है. हम आप की अर्चना करते हैं. आप की ज्वालाएं हमें पवित्र बनाएं. हमारे दुःख हरें. आप हमें पवित्र बनाएं व हमारे लिए कल्याणदायी होने की कृपा करें. ( २० ) नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे. नमस्ते भगवन्नस्तु यतः स्वः समीहसे.. (२१) हे परमात्मा! आप को नमस्कार. बिजली की तरह चमकने वाले व गड़गड़ाने वाले परमात्मा आप को नमस्कार. हे भगवन! आप को नमस्कार. हे भगवन! आप को बारबार नमस्कार. ( २१ ) यतो यतः समीहसे ततो नो अभयं कुरु. शं नः कुरु प्रजाभ्योभयं नः पशुभ्यः.. (२२) हे भगवन! जिसजिस से आप चाहते हैं, उसउस से हमें निर्भय बनाने की कृपा करें. आप हमारी प्रजा व पशुओं का कल्याण करने की कृपा करें. ( २२ ) सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु. योस्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (२३) जल हमारे अच्छे मित्र हो जाएं. हमारे शत्रु के लिए शत्रु हो जाएं. ओषधियां हमारी अच्छी मित्र हो जाएं. हमारे शत्रु के लिए शत्रु हो जाए. जो हम से द्वेष करते हैं, उन के लिए शत्रु हो जाए. जिन से हम द्वेष करते हैं, उन के लिए शत्रु हो जाए. ( २३ ) तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक्रमुच्चरत्. पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदः शत ꣪ह शृणुयाम शरदः शतं प्र ब्रवाम शरदः शतमदीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात्.. (२४) सूर्य जगत् के नेत्र हैं. वे हितकारक हैं. वे जगत् में सर्वत्र विचरते हैं. वे हमारे सामने प्रकट होते हैं. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से देखें. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से सुनें. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से बोलें. हम सौ शरदों तक उन की कृपा से अदीन ( दीनता रहित ) हों. हम सौ से भी अधिक समय तक सुखी हों. ( २४ ) ४०२ – यजुर्वेद