यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 403, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंसैंतीसवां अध्याय देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे नारिरसि.. (१) सविता देव सभी देवताओं को पैदा करने वाले हैं. हम अश्विनी देव व पूषा देव को उन के हाथों से ग्रहण करते हैं. ( १ ) युञ्जते मन ऽ उत युञ्जते धियो विप्रा विप्रस्य बृहतो विपश्चितः. वि होत्रा दधे वयुनाविदेक ऽ इन्मही देवस्य सवितुः परिष्टुतिः.. (२) हम परमात्मा से मन और बुद्धि जोड़ते हैं. ब्राह्मण विशाल सर्वव्यापक परमात्मा से अपना मन जोड़ते हैं. परमात्मा सर्वविद हैं. होता उन्हें धारण करते हैं. सविता देव अभिनंदनीय हैं. उन की आराधना करते हैं. ( २ ) देवी द्यावापृथिवी मखस्य वामद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः. मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (३) हम स्वर्गलोक की दिव्य शक्तियों को यज्ञ में आमंत्रित कर के वेदी पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम पृथ्वी की दिव्य शक्तियों को यज्ञ में आमंत्रित कर के वेदी पर प्रतिष्ठित करते हैं. हम स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक की दिव्य शक्तियों को पृथ्वी के इस देवयज्ञ में आराधनापूर्वक यज्ञवेदी पर स्थापित करते हैं. हम मिट्टी देवी को यज्ञ के शीर्षस्थ ( उच्च ) स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. ( ३ ) देव्यो वम्रयो भूतस्य प्रथमजा मखस्य वोद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः. मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (४) अग्नि की लपटें सब से पहले उत्पन्न हुई हैं. वे प्राणियों से भी पहले उत्पन्न हुई हैं. पृथ्वी के इस दिव्य यज्ञ में हम आप को शिरोधार्य करते हैं. हम यज्ञ के लिए आप को यज्ञ के शीर्षस्थ स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं. ( ४ ) इयत्यग्र ऽ आसीन्मखस्य तेद्य शिरो राध्यासं देवयजने पृथिव्याः. मखाय त्वा मखस्य त्वा शीर्ष्र्णे.. (५) यजुर्वेद – ४०३