यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 407, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्. स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान ऽ आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (१७) हम सूर्य देव को गोपथ पर आतेजाते हुए देखते हैं. सूर्य देव सर्वरक्षक, सर्वश्रेष्ठ व अविनाशी हैं. सूर्य देव देवताओं के पथ से आनेजाने वाले हैं. वह सूर्य देव सभी लोकों के द्रष्टा हैं. (१७) विश्वासां भुवां पते विश्वस्य मनसस्पते विश्वस्य वचसस्पते सर्वस्य वचसस्पते. देवश्रुत्वं देव घर्म देवो देवान् पाह्यत्र प्रावीरनु वां देववीतये. मधु माध्वीभ्यां मधु माधूचीभ्याम्.. (१८) परमात्मा सभी भुवनों के पति हैं. विश्व के मन के स्वामी हैं. वे विश्व की वाणियों के स्वामी हैं. वे सभी की वाणियों के पालक हैं और देवताओं में विश्रुत (प्रसिद्ध) हैं. देवों के देव हैं. धर्म मार्ग पर चलने वालों के रक्षक हैं. देवत्व चाहने वालों को संरक्षण प्रदान करते हैं. (१८) हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा. ऊर्ध्वो अध्वरं दिवि देवेषु धेहि.. (१९) हे परमात्मा! आप हमारे हृदय व मन में हैं. आप स्वर्गलोक में हैं. हे सूर्य! हम आप के लिए उपासना करते हैं. आप हमारे यज्ञ को ऊंचाइयों तक ले जाइए. आप इसे देवताओं हेतु दिव्यलोक तक पहुंचाइए. (१९) पिता नोसि पिता नो बोधि नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः. त्वष्टमन्तस्त्वा सपेम पुत्रान्नशून्मयि धेहि प्रजामस्मासु धेह्यारिष्टाह ᳵ सह पत्या भूयासम्.. (२०) हे परमात्मा! आप हमारे पिता हैं. आप पिता की तरह हमें बोधित (जाग्रत) करते हैं. हमारा आप को नमस्कार. आप किसी भी प्रकार की हिंसा मत कीजिए. आप किसी भी प्रकार की हिंसा मत कीजिए. आप हमारे लिए पुत्र धारिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे लिए संतान धारण करें. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम इष्ट वचनों से आप की स्तुति करते हैं. हम पालक सहित बारबार आप की उपासना करते हैं. (२०) अहः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा. रात्रिः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा.. (२१) आप कर्मयुक्त, इष्ट साधक व सुप्रकाशवान हैं. आप की ज्योति सहित आप के लिए स्वाहा. आप रात में भी कर्मयुक्त हैं. आप इष्ट साधक हैं. आप सुप्रकाशवान हैं. आप की ज्योति सहित आप के लिए स्वाहा. (२१) यजुर्वेद - ४०७