भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 406

उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय विधृतिरुपरिष्टाद्बृहस्पतेराधिपत्य ऽ ओजो मे दा विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्पाहि मनोरश्वासि.. (१२) हे पृथ्वि! शत्रु आप को हिंसा न पहुंचाए. आप पूर्व दिशा में अग्नि का आधिपत्य स्थापित कराने की कृपा करें. आप हमें आयु प्रदान कीजिए. आप पुत्रवती हो कर दक्षिण दिशा में इंद्र देव के आधिपत्य में रहने की कृपा कीजिए. हमें भी संतान प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप सुखदायिनी हैं. हे पृथ्वि! आप पश्चिम दिशा में सविता देव के आधिपत्य में रहने की कृपा करें. आप हमें सम्यक् चक्षु ( दृष्टि ) प्रदान करने की कृपा करें. आप हमारी विनती पूरी तरह सुनने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि! आप उत्तर दिशा में धातु देव के आधिपत्य में रहने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि! आप हमें धन से पोषित करने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि देवी! आप ऊपर की दिशाओं में बहुत पदार्थ धारिए. आप बृहस्पति देव के आधिपत्य में रह कर हमारे लिए बलदायिनी होइए. आप हमारे सभी शत्रुओं को नष्ट कर दीजिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे मन का अश्व हैं. ( १२ ) स्वाहा मरुद्भिः परि श्रीयस्व दिवः स १७ स्पृशस्पाहि. मधु मधु मधु.. (१३) मरुद्गणों के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक को यह हवि चारों ओर से स्पर्श करे. यह हवि हमारी रक्षा करने की कृपा करे. मधुरता की स्थापना हो. ( १३ ) गर्भो देवानां पिता मतीनां पतिः प्रजानाम्. सं देवो देवेन सवित्रा गत स १७ सूर्येण रोचते.. (१४) परमात्मा देवताओं के गर्भ, बुद्धियों के पिता और प्रजाओं के पालक हैं. परमात्मा देवों के देव सविता देव संसार को प्रेरित करते हैं. सूर्य सर्वत्र प्रकाशित करते हैं. ( १४ ) समग्निरग्निना गत सं दैवेन सवित्रा स १७ सूर्येणारोचिष्ट. स्वाहा समग्निस्तपसा गत सं दैव्येन सवित्रा स १७ सूर्येणारुरुचत.. (१५) परमात्मा अग्नि के साथ सविता देव से एकमेक हो कर सूर्यरूप में प्रकाशित होते हैं. अग्नि के साथ सूर्य के लिए स्वाहा. सविता देव सूर्यरूप में शोभित होते हैं. ( १५ ) धर्ता दिवो वि भाति तपसस्पृथिव्यां धर्ता देवो देवानाममर्त्यस्तपोजाः. वाचमस्मे नि यच्छ देवायुवम्.. (१६) परमात्मा स्वर्गलोक के धारक हैं. वे अपने तेज से पृथ्वी पर विभूषित होते हैं. वे पृथ्वी पर देवों के धारक व अपने दिव्य तप और ओज से संपन्न हैं. वे हमें दिव्य वाणी और आयु प्रदान करने की कृपा करें. ( १६ ) ४०६ - यजुर्वेद