यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय विधृतिरुपरिष्टाद्बृहस्पतेराधिपत्य ऽ ओजो मे दा विश्वाभ्यो मा नाष्ट्राभ्यस्पाहि मनोरश्वासि.. (१२) हे पृथ्वि! शत्रु आप को हिंसा न पहुंचाए. आप पूर्व दिशा में अग्नि का आधिपत्य स्थापित कराने की कृपा करें. आप हमें आयु प्रदान कीजिए. आप पुत्रवती हो कर दक्षिण दिशा में इंद्र देव के आधिपत्य में रहने की कृपा कीजिए. हमें भी संतान प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप सुखदायिनी हैं. हे पृथ्वि! आप पश्चिम दिशा में सविता देव के आधिपत्य में रहने की कृपा करें. आप हमें सम्यक् चक्षु ( दृष्टि ) प्रदान करने की कृपा करें. आप हमारी विनती पूरी तरह सुनने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि! आप उत्तर दिशा में धातु देव के आधिपत्य में रहने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि! आप हमें धन से पोषित करने की कृपा कीजिए. हे पृथ्वि देवी! आप ऊपर की दिशाओं में बहुत पदार्थ धारिए. आप बृहस्पति देव के आधिपत्य में रह कर हमारे लिए बलदायिनी होइए. आप हमारे सभी शत्रुओं को नष्ट कर दीजिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे मन का अश्व हैं. ( १२ ) स्वाहा मरुद्भिः परि श्रीयस्व दिवः स १७ स्पृशस्पाहि. मधु मधु मधु.. (१३) मरुद्गणों के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक को यह हवि चारों ओर से स्पर्श करे. यह हवि हमारी रक्षा करने की कृपा करे. मधुरता की स्थापना हो. ( १३ ) गर्भो देवानां पिता मतीनां पतिः प्रजानाम्. सं देवो देवेन सवित्रा गत स १७ सूर्येण रोचते.. (१४) परमात्मा देवताओं के गर्भ, बुद्धियों के पिता और प्रजाओं के पालक हैं. परमात्मा देवों के देव सविता देव संसार को प्रेरित करते हैं. सूर्य सर्वत्र प्रकाशित करते हैं. ( १४ ) समग्निरग्निना गत सं दैवेन सवित्रा स १७ सूर्येणारोचिष्ट. स्वाहा समग्निस्तपसा गत सं दैव्येन सवित्रा स १७ सूर्येणारुरुचत.. (१५) परमात्मा अग्नि के साथ सविता देव से एकमेक हो कर सूर्यरूप में प्रकाशित होते हैं. अग्नि के साथ सूर्य के लिए स्वाहा. सविता देव सूर्यरूप में शोभित होते हैं. ( १५ ) धर्ता दिवो वि भाति तपसस्पृथिव्यां धर्ता देवो देवानाममर्त्यस्तपोजाः. वाचमस्मे नि यच्छ देवायुवम्.. (१६) परमात्मा स्वर्गलोक के धारक हैं. वे अपने तेज से पृथ्वी पर विभूषित होते हैं. वे पृथ्वी पर देवों के धारक व अपने दिव्य तप और ओज से संपन्न हैं. वे हमें दिव्य वाणी और आयु प्रदान करने की कृपा करें. ( १६ ) ४०६ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध सैंतीसवां अध्याय अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्. स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान ऽ आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (१७) हम सूर्य देव को गोपथ पर आतेजाते हुए देखते हैं. सूर्य देव सर्वरक्षक, सर्वश्रेष्ठ व अविनाशी हैं. सूर्य देव देवताओं के पथ से आनेजाने वाले हैं. वह सूर्य देव सभी लोकों के द्रष्टा हैं. (१७) विश्वासां भुवां पते विश्वस्य मनसस्पते विश्वस्य वचसस्पते सर्वस्य वचसस्पते. देवश्रुत्वं देव घर्म देवो देवान् पाह्यत्र प्रावीरनु वां देववीतये. मधु माध्वीभ्यां मधु माधूचीभ्याम्.. (१८) परमात्मा सभी भुवनों के पति हैं. विश्व के मन के स्वामी हैं. वे विश्व की वाणियों के स्वामी हैं. वे सभी की वाणियों के पालक हैं और देवताओं में विश्रुत (प्रसिद्ध) हैं. देवों के देव हैं. धर्म मार्ग पर चलने वालों के रक्षक हैं. देवत्व चाहने वालों को संरक्षण प्रदान करते हैं. (१८) हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा. ऊर्ध्वो अध्वरं दिवि देवेषु धेहि.. (१९) हे परमात्मा! आप हमारे हृदय व मन में हैं. आप स्वर्गलोक में हैं. हे सूर्य! हम आप के लिए उपासना करते हैं. आप हमारे यज्ञ को ऊंचाइयों तक ले जाइए. आप इसे देवताओं हेतु दिव्यलोक तक पहुंचाइए. (१९) पिता नोसि पिता नो बोधि नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः. त्वष्टमन्तस्त्वा सपेम पुत्रान्नशून्मयि धेहि प्रजामस्मासु धेह्यारिष्टाह ᳵ सह पत्या भूयासम्.. (२०) हे परमात्मा! आप हमारे पिता हैं. आप पिता की तरह हमें बोधित (जाग्रत) करते हैं. हमारा आप को नमस्कार. आप किसी भी प्रकार की हिंसा मत कीजिए. आप किसी भी प्रकार की हिंसा मत कीजिए. आप हमारे लिए पुत्र धारिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. आप हमारे लिए संतान धारण करें. आप हमारी रक्षा कीजिए. हम इष्ट वचनों से आप की स्तुति करते हैं. हम पालक सहित बारबार आप की उपासना करते हैं. (२०) अहः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा. रात्रिः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा.. (२१) आप कर्मयुक्त, इष्ट साधक व सुप्रकाशवान हैं. आप की ज्योति सहित आप के लिए स्वाहा. आप रात में भी कर्मयुक्त हैं. आप इष्ट साधक हैं. आप सुप्रकाशवान हैं. आप की ज्योति सहित आप के लिए स्वाहा. (२१) यजुर्वेद - ४०७
अड़तीसवां अध्याय
अड़तीसवां अध्याय देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददेदित्यै रास्नासि.. ( १ ) हे यज्ञ ऊर्जा! हम सविता देव की जीवनदायी प्रेरणा से आप को ग्रहण करते हैं. हम अश्विनी देवताओं की भुजाओं से पूषा देव के हाथों से आप को ग्रहण करते हैं. आप देवताओं की माता अदिति को आवृत्त करने वाली हैं. ( १ ) इड ऽ एह्य दित ऽ एहि सरस्वत्येहि. असावेह्यासावेह्यासावेहि.. ( २ ) हे इड़ा देवी! आप यहां पधारिए. हे अदिति देवी! आप यहां पधारिए. हे सरस्वती देवी! आप यहां पधारने की कृपा कीजिए. ( २ ) अदित्यै रास्नासीन्द्राण्या ऽ उष्णीषः. पूषासि घर्माय दीष्व.. ( ३ ) हे यज्ञ ऊर्जा! आप अदिति देव की ( मेखला ) आवृत्त करने वाली हैं. आप इंद्राणी के सिर का वस्त्र ( प्रतिष्ठा सूचक ) हैं. आप पोषक हैं. आप यज्ञ जैसे हितकारी कार्यों में अपनी शक्ति को लगाने की कृपा कीजिए. ( ३ ) अश्विभ्यां पिन्वस्व सरस्वत्यै पिन्वस्वेन्द्राय पिन्वस्व. स्वाहेन्द्रवत् स्वाहेन्द्रवत् स्वाहेन्द्रवत्.. ( ४ ) अश्विनी देव के लिए यह आहुति प्रवाहित हो रही है. आप इसे पीजिए. सरस्वती देवी के पीने के लिए यह आहुति झर रही है. इंद्र देव के पान ( पीने ) के लिए यह आहुति बह रही है. इंद्र देव के लिए स्वाहा. स्वाहा. स्वाहा. ( ४ ) यस्ते स्तनः शशयो यो मयोभूर्यो रत्नधा वसुविद्यः सुदत्रः. येन विश्वा पुष्यसि वार्याणि सरस्वति तमिह धातवेकः. उर्वन्तरिक्षमन्वेमि.. ( ५ ) हे सरस्वती देवी! आप का दिव्य ज्ञान सुखदायी, कल्याणदायी व समृद्धिदायी है. आप का दिव्य ज्ञान वैसा ही सुखद और आनंददायी है, जैसे मां का स्तन बच्चे के लिए सुखकारी नींद लाने वाला व आनंद देने वाला होता है. बच्चे में उत्तम बल संचरित करता है और उन में उत्तम गुण पैदा करने वाला होता है. ( ५ ) ४०८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय गायत्रं छन्दोसि त्रैष्टुभं छन्दोसि द्यावापृथिवीभ्यां त्वा परि गृह्णाम्यन्तरिक्षेणोप यच्छामि. इन्द्राश्विना मधुनः सारघस्य घर्मं पात वसवो यजत वाट्. स्वाहा सूर्यस्य रश्मये वृष्टिवनये.. (६) हे इंद्र देव! जो यजमान गायत्री छंद में आप की स्तुति करते हैं. आप उन के संरक्षक हैं. जो त्रिष्टुभू छंद में इंद्र देव की उपासना करते हैं. इंद्र देव उन्हें भी संरक्षण देने वाले हैं. हे अश्विनी देव! हम स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक हेतु आप दोनों का परिग्रहण करते हैं. हम आप से आरोग्य ( स्वास्थ्य) की कामना करते हैं. हम इंद्र देव और दोनों अश्विनीकुमारों को अंतरिक्षलोक से अपने पास लाना चाहते हैं. आप दोनों अमृत व ऊर्जा बरसाने की कृपा करें. वसुगण उपयुक्त रीति से यज्ञ कार्य का निर्वाह करें. वे सूर्य की किरणों से अच्छी बरसात पाने के लिए उपयुक्त रीति से यज्ञ करने की कृपा करें. ( ६ ) समुद्राय त्वा वाताय स्वाहा सरिराय त्वा वाताय स्वाहा. अनाधृष्याय त्वा वाताय स्वाहाप्रतिधृष्याय त्वा वाताय स्वाहा. अवस्यवे त्वा वाताय स्वाहाशिमिदाय त्वा वाताय स्वाहा.. (७) हे वायु! समुद्र के लिए आप को आहुति प्रदान करते हैं. सभी को संरक्षण प्रदान करने के लिए हम आप को आहुति प्रदान करते हैं. हम अपार शक्ति के लिए आप को आहुति प्रदान करते हैं. सभी के वास ( संरक्षण ) प्रदाता के लिए हम आहुति प्रदान करते हैं. शांतिदायी वायु के लिए आहुति प्रदान करते हैं. आप हमारी ये सभी आहुतियां स्वीकार करने की कृपा कीजिए. ( ७ ) इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवते स्वाहेन्द्राय त्वादित्यवते स्वाहेन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने स्वाहा. सवित्रे त्व ऽ ऋभुमते विभुमते वाजवते स्वाहा बृहस्पतये त्वा विश्वदेव्यावते स्वाहा.. (८) हे इंद्र देव! आप धनवान व शक्तिमान हैं. हम आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. आप आदित्यवान ( तेजोमय ) हैं. आप के लिए आहुति समर्पित है. हे इंद्र देव! आप अभिमान को समाप्त करने वाले हैं. आप के लिए आहुति समर्पित है. सविता देव सत्यवान हैं. वे धनवान व बलवान हैं. उन के लिए आहुति समर्पित है. सभी देवताओं के लिए हितकारी बृहस्पति के लिए आहुति समर्पित है. ( ८ ) यमाय त्वाङ्गिरस्वते पितृमते स्वाहा. स्वाहा घर्माय स्वाहाः घर्मः पित्रे.. (९) यम देव पितरगणों एवं अंगिरा से युक्त हैं. यम देव के लिए आहुतियां अर्पित हैं. यज्ञ के विस्तार के लिए आहुति समर्पित है. पितरों को तृप्ति देने के लिए आहुति समर्पित है. ( ९ ) यजुर्वेद - ४०९
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय विश्वा ऽ आशा दक्षिणसद्विश्वान् देवानयाडिह. स्वाहाकृतस्य घर्मस्य मधोः पिबतमश्विना.. (१०) यज्ञ में होता दक्षिण दिशा में विराजमान हैं. उन होताओं ने सभी दिशाओं में निवास करने वाले देवताओं को आमंत्रित किया है. हे अश्विनीकुमारो! यज्ञ के विस्तार के लिए जो रसमयी आहुतियां समर्पित की जा रही हैं, आप उन्हें पीने की कृपा कीजिए. ( १० ) दिवि धा ऽ इमं यज्ञमिमं यज्ञं दिवि धाः. स्वाहाग्नये यज्ञियाय शं यजुर्भ्यः.. (११) हे यजमानो! आप इस यज्ञ व आहुति को स्वर्गलोक तक पहुंचाइए. यजमान अग्नि के लिए आहुति अर्पित करते हैं. यजमान अपनी सुखशांति के लिए मंत्र पढ़ते हुए आहुतियां समर्पित कर रहे हैं. ( ११ ) अश्विना घर्मं पात १४ हार्द्दानमहर्दिवाभिरूतिभिः. तन्त्रायिणे नमो द्यावापृथिवीभ्याम्.. (१२) हे अश्विनीकुमारो! आप अपनी शक्ति से इस यज्ञ की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप अपनी रक्षण शक्तियों के साथ इस हृदय को प्रिय लगने वाले यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. सूर्य, स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक के सभी देवों को नमन है. ( १२ ) अपातामश्विना घर्ममनु द्यावापृथिवी अम १४ साताम्. इहैव रातयः सन्तु.. (१३) हे अश्विनीकुमारो! आप आपाततः ( पूर्ण और हर रूप से ) हमारे यज्ञ की रक्षा करने की कृपा कीजिए. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के देवता भी आप के साथ यज्ञ का विस्तार करने की कृपा करें. आप अपने निवास स्थल से ही हमें धन प्रदान ( भांतिभांति के ) करने की कृपा कीजिए. ( १३ ) इषे पिन्वस्वोजें पिन्वस्व ब्रह्मणे पिन्वस्व क्षत्राय पिन्वस्व द्यावापृथिवीभ्यां पिन्वस्व. धर्मासि सुधर्मामेन्यस्मे नृम्णानि धारय ब्रह्म धारय क्षत्रं धारय विशं धारय.. (१४) हे परब्रह्म! हम आप का अनुसरण करते हैं, ताकि आप हमारी और यजमानों की रक्षा करें. आप ब्राह्मणों तथा क्षत्रियों की रक्षा कीजिए. आप प्रजा को धर्म से संचालित कीजिए. उस धर्म मार्ग का हम सब भी अनुकरण कर सकें. उस धर्म मार्ग पर चल कर हम कर्तव्य पालन करते हुए अपना लक्ष्य प्राप्त कर सकें. ( १४ ) स्वाहा पूष्णे शरसे स्वाहा ग्रावभ्यः स्वाहा प्रतिरवेभ्यः. स्वाहा पितृभ्य ऽ ऊर्ध्वबर्हिभ्यों घर्मपावभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या १४ स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः.. (१५) प्रेम करने वाले पूषा, शब्द करने वाले प्राणियों, सोम रस पीने वाले देवताओं, ४१० – यजुर्वेद
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय विशेष यज्ञ को पवित्र करने वाले पितरों, पृथ्वीलोक, स्वर्गलोक और दूसरे सभी देवताओं के लिए ये आहुतियां समर्पित हैं. ( १५ ) स्वाहा रुद्राय रुद्रहूतये स्वाहा सं ज्योतिषा ज्योतिः. अहः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा. रात्रिः केतुना जुषता ᳵ सुज्योतिर्ज्योतिषा स्वाहा. मधु हुतमिन्द्रतमे अग्नावश्याम ते देव घर्म नमस्ते अस्तु मा मा हि ᳵ सीः.. ( १६) हे दिव्य गुण वाली परम शक्ति! यह आहुति रुद्र देव को समर्पित है. ज्योति से ज्योति प्रज्वलित करने के लिए यह आहुति समर्पित है. दिन में तेज से तेज को संयुक्त करने के लिए यह आहुति हैं. रात में तेज से तेज को संयुक्त करने के लिए यह आहुति समर्पित है. आप इन आहुतियों को स्वीकार करते हुए हमारी रक्षा करें. ( १६ ) अभीमं महिमा दिवं विप्रो बभूव सप्रथाः. उत श्रवसा पृथिवी ᳵ स ᳵ सीदस्व महाँ २ असि रोचस्व देववीतमः. वि धूममग्ने अरुषं मियेध्य सृज प्रशस्त दर्शतम्.. (१७) हे अग्नि! आप का यश पृथ्वी और स्वर्ग में फैला है. आप प्रज्वलित हो कर सभी देवताओं को तृप्त करते हुए लाल रंग वाला आकर्षक धुआं चारों ओर फैलाएं. ( १७ ) या ते घर्म दिव्या शुग्या गायत्र्या ᳵ हविर्धाने. सा त ऽ आप्यायतां निष्प्यायतां तस्यै ते स्वाहा. या ते घर्मान्तरिक्षे शुग्या त्रिष्टुब्भ्याग्नीध्रे. सा त ऽ आ प्यायतां निष्प्यायतां तस्यै ते स्वाहा. या ते घर्म पृथिव्या ᳵ शुग्या जगत्या ᳵ सदस्या. सा त ऽ आ प्यायतां निष्प्यायतां तस्यै ते स्वाहा.. ( १८) हे अग्नि! आप की चमक स्वर्गलोक, विशेष यज्ञ और गायत्री छंद में फैली है. वह चमक अंतरिक्ष तथा त्रिष्टुप् छंद में भी विद्यमान है. आप की वही चमक पृथ्वी, सभास्थल और जगती छंद में भी है. आप की चमक या यश और भी अधिक फैले इसी उद्देश्य से यह आहुति समर्पित है. ( १८ ) क्षत्रस्य त्वा परस्पाय ब्रह्मणस्तन्वं पाहि. विशस्त्वा धर्मणा वयमनु क्रामाम सुविताय नव्यसे.. (१९) हे परम शक्ति! आप शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. क्षत्रियों के बल तथा ब्राह्मणों के ज्ञान की रक्षा करें. प्रजा को धर्म मार्ग पर चलाएं. उत्तम पदार्थ प्रदान करें. श्रेष्ठ मार्ग पर चलने तथा कर्तव्य पालन के लिए हम आप का अनुसरण करते हैं. ( १९ ) यजुर्वेद - ४११
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय चतुःस्रक्तिर्नाभिरृतस्य सप्रथाः स नो विश्वायुः सप्रथाः स नः सर्वायुः सप्रथाः. अप द्वेषो अप ह्वरोऽन्यव्रतस्य सश्चिम.. (२०) हे परम शक्ति! आप चारों दिशाओं में व्याप्त हैं. आप ऋत (सत्य) की नाभि (केंद्र) हैं. आप यज्ञ की प्रथा के संचालक व विख्यात हैं. आप हमें पूर्णायु प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप हमें यशस्वी बनाइए व यश सहित सारी आयु प्रदान कीजिए. आप हमें द्वेषियों (द्वेष करने वालों) से दूर कीजिए. आप हमें जन्ममरण के चक्र से मुक्त कीजिए. आप संकल्पशील व कृपालु हैं. (२०) घर्मैतत्ते पुरीषं तेन वर्धस्व चा च प्यायस्व. वर्धिषीमहि च वयमा च प्यासिषीमहि.. (२१) हे यज्ञ देव! आप क्षमतावान व समृद्धिवान हैं. आप की क्षमता और समृद्धि में और भी बढ़ोतरी हो. हम भी आप की क्षमता और समृद्धि की बढ़ोतरी पाएं और उस से आप्यायित (तृप्त) हो जाएं. (२१) अचिक्रदद्वृषा हरिमर्महान्मित्रो न दर्शतः. स सूर्य्येण द्युदुदधिर्निधिः.. (२२) हे यज्ञ देव! आप निरंतर सुख बरसाने वाले, दुःखहारी, महान् मित्र व सर्वद्रष्टा हैं. आप सूर्य की तरह द्युतिमान (प्रकाशमान) और उदधि (समुद्र) की तरह गहरे (गंभीर) हैं. आप सुखों का खजाना हैं. (२२) सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु योऽस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (२३) हे यज्ञ देव! जल व ओषधियां हमारे लिए मित्र के समान हों. जो हम से द्वेष रखते हैं या जिन से हम द्वेष रखते हैं, उन के लिए जल और ओषधियां दुर्मित्र (बुरे मित्र) की तरह हानिकर हो जाएं. (२३) उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त ऽ उत्तरम्. देवं देवत्रा सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम्.. (२४) हे यज्ञ देव! हम तमसलोक से भी अधिक ऊपर उठें. हम ऊर्ध्वलोक में सूर्य जैसे देवों का भी कल्याण करने वाले देवों को देखें. हम श्रेष्ठ ज्योतिमान के दर्शन करें. (२४) एधोस्येधिषीमहि समिदसि तेजोसि तेजो मयि धेहि.. (२५) हे यज्ञ देव! आप ज्योतिर्मय (प्रकाशमान) हैं. आप की ज्योति और भी फैले. आप समिधा जैसे तेजस्वी हैं. आप की कृपा से हम भी उस तेज को धारण कर सकें. (२५) ४१२ – यजुर्वेद
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय
उत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय यावती द्यावापृथिवी यावच्च सप्त सिन्धवो वितस्थिरे. तावन्तमिन्द्र ते ग्रहमूर्जा गृह्णाम्यक्षितं मयि गृह्णाम्यक्षितम्.. (२६) हे यज्ञ देव! जहां तक स्वर्गलोक का विस्तार है, जहां तक पृथ्वीलोक का विस्तार है, जहां तक सप्त सिंधु (समुद्र) विस्तृत है, वहां तक हम आप से ऊर्जा ग्रहण कर सकें. हम आप की कृपा से इसे ग्रहण करने की सामर्थ्य पा सकें. (२६) मयि त्यदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः. घर्मस्त्रिशुग्वि राजति विराजा ज्योतिषा सह ब्रह्मणा तेजसा सह.. (२७) जो परम शक्ति और परम तेज से सुशोभित हो कर विराजमान है, जो प्रकाश के साथ शोभती है, जो विविध तेज से तेजोमयी है, वह विशाल परम शक्ति मुझे बलवान और निपुण बनाने की कृपा करे. हमें कार्य करने की शक्ति प्रदान करे. (२७) पयसो रेत ऽ आभृतं तस्य दोहमशीमह्युत्तरामुत्तरा १४ समाम्. त्विषः संवृक् क्रत्वे दक्षस्य ते सुषुम्णस्य ते सुषुम्णाग्निहुतः. इन्द्रपीतस्य प्रजापति भक्षितस्य मधुमत ऽ उपहूत ऽ उपहूतस्य भक्षयामि.. (२८) हे यज्ञ देव! आप की कृपा से बरसात से बरसे हुए अमृतजल से प्रकृति पूरी तरह भर गई है. आप की ही कृपा से हम आगे भी निरंतर अपने लाभ के लिए उस का दोहन कर सकने में समर्थ हो सकें. आप संकल्प सिद्ध करने में दक्ष (कुशल) व प्रकाशमान हैं. हम यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. यज्ञ में दी गई सुखदायी आहुतियां हमारे लिए सुखदायक हैं. इंद्र देव द्वारा पी गई मधुर हवि और प्रजापति द्वारा खाई गई (सेवन की गई) मधुर हवि का, हम उन को अपने पास आमंत्रित कर के, सेवन करना चाहते हैं. (२८) यजुर्वेद - ४१३
उनतालीसवां अध्याय
उनतालीसवां अध्याय स्वाहा प्राणेभ्यः साधिपतिकेभ्यः. पृथिव्यै स्वाहाग्नये स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा वायवे स्वाहा दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा.. (१) प्राणों के लिए स्वाहा. प्राणों के अधिपति सहित (प्राणों के लिए) स्वाहा. पृथ्वी के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. अंतरिक्ष देव के लिए स्वाहा. वायु के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. सूर्य के लिए स्वाहा. (१) दिग्भ्यः स्वाहा चन्द्राय स्वाहा नक्षत्रेभ्यः स्वाहाद्भ्यः स्वाहा वरुणाय स्वाहा. नाभ्यै स्वाहा पूताय स्वाहा.. (२) सभी दिशाओं के देवों के लिए स्वाहा. चंद्र देव के लिए स्वाहा. नक्षत्र देवों के लिए स्वाहा. जल देव के लिए स्वाहा. वरुण देव के लिए स्वाहा. यज्ञ देव की नाभि (केंद्र) के लिए स्वाहा. पवित्र करने वाले सभी देवताओं के लिए स्वाहा. (२) वाचे स्वाहा प्राणाय स्वाहा प्राणाय स्वाहा. चक्षुषे स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा.. (३) वाणी देव के लिए स्वाहा. (बाईं) प्राण वायु के लिए स्वाहा. (दाईं) प्राण वायु के लिए स्वाहा. (बाएं) चक्षु (आंख) के लिए स्वाहा. (दाएं) चक्षु के लिए स्वाहा. (बाएं) कान के लिए स्वाहा. (दाएं) कान के लिए स्वाहा. (३) मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीय. पशूना ँ४ रूपमन्नस्य रसो यशः श्रीः श्रयतां मयि स्वाहा.. (४) मन की इच्छा पूरी हो. वाणी सत्य को धारण करे. पशुओं, रूप व अन्न के रस की बढ़ोतरी हो. यश, शोभा व श्रेय बढ़े. हम इन सब की बढ़ोतरी के लिए आहुति अर्पित करते हैं. (४) प्रजापतिः सम्भ्रियमाणः सम्राट् सम्भृतो वैश्वदेवः स ँ४ सन्नो घर्मः प्रवृक्त स्तेज ऽ उद्यत ऽ आश्विनः पयस्यानीयमाने पौष्णो विष्यन्दमाने मारुतः क्लथन् मैत्रः शरसि सन्ताय्यमाने वायव्यो ह्रियमाण ऽ आग्नेयो हूयमानो वाग्घुत:... (५) ४१४ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय
उत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय हे यज्ञ देवता! यज्ञ से परिपुष्ट होने वाले प्रजापति देव के लिए स्वाहा. संभ्रांत राजा के लिए स्वाहा. सभी देवों ( विश्व देव ) के लिए स्वाहा. सन्मार्ग पर चलने वालों के लिए स्वाहा. धर्मपरायणों के लिए स्वाहा. तेजस्वियों के लिए स्वाहा. जल से अभिषिक्त किए जाते हुए अश्विनीकुमारों के लिए स्वाहा. हितकारी पूषा देव के लिए स्वाहा. शत्रुनाशी मरुद्गणों के लिए स्वाहा. खेतीबाड़ी की समृद्धि करने वाले मित्र देव के लिए स्वाहा. चलायमान वायु के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. वाग्देवता के लिए स्वाहा. ( ५ ) सविता प्रथमेऽहन्नग्निर्द्वितीये वायुस्तृतीय ऽ आदित्यश्चतुर्थे चन्द्रमाः पञ्चम ऽ ऋतुः षष्ठे मरुतः सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे. मित्रो नवमे वरुणो दशम ऽ इन्द्र ऽ एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे.. ( ६ ) पहले दिन सविता देव के लिए स्वाहा. दूसरे दिन अग्नि के लिए स्वाहा. तीसरे दिन वायु के लिए स्वाहा. चौथे दिन आदित्य देव के लिए स्वाहा. पांचवें दिन चंद्र देव के लिए स्वाहा. छठे दिन ऋत देव ( सत्य ) के लिए स्वाहा. सातवें दिन मरुद्गणों के लिए स्वाहा. आठवें दिन बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. नौवें दिन मित्र देव के लिए स्वाहा. दसवें दिन वरुण देव के लिए स्वाहा. ग्यारहवें दिन इंद्र देव के लिए स्वाहा. बारहवें दिन विश्वों के लिए स्वाहा. ( ६ ) उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च. सासह्वांश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा.. ( ७ ) वायु उग्र, भीम, घनघोर शब्द करने वाले हैं, कंपकंपा देने वाले सभी को हरा देने वाले व शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले हैं. शत्रुओं को छिन्नभिन्न कर सकने वाले हैं. उन वायु के लिए हम आहुति समर्पित करते हैं. ( ७ ) अग्नि १७ हृदयनाशनि १७ हृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्स्नहृदयेन भवं यक्ना. शर्वं मतस्नाभ्यामीशानं मन्युना महादेवमन्तः पार्श्व्येनोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठहनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम्.. ( ८ ) हम यजमान हृदय से अग्नि को प्रसन्न करते हैं. हृदय के आगे के भाग से प्रकाश देव को प्रसन्न करते हैं. पूरे हृदय से पशुपति देव को प्रसन्न करते हैं. हम यकृत से आकाश देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. गुरदों से जल देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. मन से ईशान देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. हम अंतःकरण से महादेव, अंतड़ियों से उग्र देव व हनु से वसिष्ठ को प्रसन्न करना चाहते हैं. हृदय के कोषों से सिद्धि पाना चाहते हैं. ( ८ ) उग्रँल्लोहितेन मित्र १७ सौब्रत्येन रुद्रं दौर्ब्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साध्यान् प्रमुदा. भवस्य कण्ठ १७ रुद्रस्यान्तः पार्श्व्यं महादेवस्य यकृच्छर्वस्य वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत्.. ( ९ ) यजुर्वेद - ४१५
उत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय लहू से उग्र देव को संतुष्ट करना चाहते हैं. श्रेष्ठ व्रतों से मित्र देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. दुराचार दूर कर के उस संकल्प से रुद्र देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. हम सदाचार से इंद्र देव को रिझाना चाहते हैं. बल से मरुद्गणों को प्रसन्न करना चाहते हैं. श्रेष्ठ कर्मों से साध्य देवों को प्रसन्न करना चाहते हैं. कंठ से भव देव को खुश रखना चाहते हैं. पार्श्व ( पीछे ) से रुद्र देव, उत्तम आचरण से महा देव, यकृत से शर्व देव व हम नाड़ी से पशुपति को प्रसन्न करना चाहते हैं. ( ९ ) लोमभ्यः स्वाहा लोमभ्यः स्वाहा त्वचे स्वाहा त्वचे स्वाहा लोहिताय स्वाहा लोहिताय स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा मेदोभ्यः स्वाहा. मा ꣳ सेभ्यः स्वाहा मा ꣳ सेभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहा स्नावभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहास्थभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा मज्जभ्यः स्वाहा रेतसे स्वाहा. पायवे स्वाहा.. (१०) रोम के लिए स्वाहा. त्वचा के लिए स्वाहा. लहू के लिए स्वाहा. चरबी के लिए स्वाहा. मांस के लिए स्वाहा. नाड़ियों के लिए स्वाहा. हड्डियों के लिए स्वाहा. मज्जा के लिए स्वाहा. वीर्य के लिए स्वाहा. गुदा के लिए स्वाहा. ( १० ) आयासाय स्वाहा प्रायासाय स्वाहा संयासाय स्वाहा वियासाय स्वाहोद्यासाय स्वाहा. शुचे स्वाहा शोचते स्वाहा शोचमानाय स्वाहा शोकाय स्वाहा.. (११) आयास देव के लिए स्वाहा. प्रयास देव के लिए स्वाहा. संन्यास देव के लिए स्वाहा. वियास देव के लिए स्वाहा. उद्यास देव के लिए स्वाहा. शुच देव के लिए स्वाहा. शोच देव के लिए स्वाहा. शोचमान और शोक देव के लिए स्वाहा. ( ११ ) तपसे स्वाहा तप्यते स्वाहा तप्यमानाय स्वाहा तप्ताय स्वाहा घर्माय स्वाहा. निष्कृत्यै स्वाहा प्रायश्चित्यै स्वाहा भेषजाय स्वाहा.. (१२) तप के लिए स्वाहा. तप्यमान के लिए स्वाहा. तृप्त के लिए स्वाहा. धर्म के लिए स्वाहा. निष्कृति और प्रायश्चित्त के लिए स्वाहा. भेषज के लिए स्वाहा. ( १२ ) यमाय स्वाहान्तकाय स्वाहा मृत्यवे स्वाहा. ब्रह्मणे स्वाहा ब्रह्महत्यायै स्वाहा विश्वेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा द्यावापृथिवीभ्या ꣳ स्वाहा.. (१३) यम देव के लिए स्वाहा. अंतक के लिए स्वाहा. मृत्यु के लिए स्वाहा. ब्राह्मण के लिए स्वाहा. ब्रह्महत्या की शांति के लिए स्वाहा. विश्वों के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. पृथ्वीलोक के लिए स्वाहा. ( १३ ) ४१६ - यजुर्वेद
चालीसवां अध्याय
चालीसवां अध्याय ईशा वास्यमिद १७ सर्वं यत्किं च जगत्यां जगत्. तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्य स्विद्धनम्.. (१) इस जड़चेतन जगत् में जो कुछ भी है, वह ईश्वर की कृपा से है. उस ईश्वर के द्वारा त्यागे गए का भोग कीजिए. बहुत ज्यादा लालच मत करो. यह धनादि सब किस का है ? ( अर्थात् ईश्वर के अलावा किसी का नहीं ). ( १ ) कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत १४ समाः. एवं त्वयि नान्यथेतोस्ति न कर्म लिप्यते नरे.. (२) हे ईश्वर! हम कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करें. इस के अलावा कल्याण का कोई अन्य मार्ग नहीं है. कर्म मनुष्य को लिप्त नहीं करते. ( २ ) असुर्या नाम ते लोका ऽ अन्धेन तमसावृताः. ताँस्ते प्रेत्यापि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः.. (३) जो गहन अंधकार से घिरे रहते हैं, वे लोग असुर्य कहलाते हैं. जो आत्मा का हनन करने वाले हैं, वे लोग प्रेत रूप में वैसे ही लोकों को प्राप्त होते हैं. ( ३ ) अनेजदेकं मनसो जवीयो नैनद्देवा ऽ आप्नुवन् पूर्वमर्षत्. तद्धावतोन्यानत्येति तिष्ठत्तस्मिन्नपो मातरिश्वा दधाति.. (४) अजन्मा ईश्वर एक है. वह मन से भी ज्यादा गतिवान और फुरतीला है. देवगण भी इसे प्राप्त नहीं कर पाते हैं. स्थिर रह कर भी वह दौड़ता हुआ गतिशीलों को पछाड़ देता है. वह जल में रहता है. वायु को धारण करता है. ( ४ ) तदेजति तन्नैजति तद्दूरे तद्वन्तिके. तदन्तरस्य सर्वस्य तदु सर्वस्यास्य बाह्यतः.. (५) वह ( परम तत्त्व ) गतिशील है और स्थिर भी है. वह दूर भी है और निकट भी है वह जड़ और चेतन दोनों के भीतर भी है और बाहर भी है. ( ५ ) यस्तु सर्वाणि भूतान्यात्मन्नेवानुपश्यति. सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न वि चिकित्सति.. (६) यजुर्वेद - ४१७
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय जो सभी प्राणियों ( जड़चेतन ) में अपने को ( आत्मतत्त्व को ) देखता है तथा उस का अनुभव करता है, उसे कभी भी कोई भ्रम नहीं होता. ( ६ ) यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः. तत्र को मोहः कः शोक ऽ एकत्वमनुपश्यतः.. (७) जिस ( स्थिति ) में मनुष्य यह जान लेता है कि सभी भूतों में एक ही आत्मतत्त्व है, तब क्या मोह ? क्या शोक ? उसे सर्वत्र एक जैसी स्थिति दिखाई देती है. ( ७ ) स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर १७ शुद्घमपापविद्धम्. कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८) वह परमपिता सर्वव्यापक, चमकीला, ( दीप्तिमान ), काया रहित, नाड़ियों से रहित है. वह घावों से रहित, पवित्र, पाप रहित, विद्वान्, मननशील, सर्वव्यापक व स्वयंभू ( स्वयं उत्पन्न होने वाला ) है. उस ने सृष्टि के आरंभ से ही सब के लिए यथायोग्य साधन सुविधाओं की व्यवस्था की है. ( ८ ) अन्धं तमः प्र विशन्ति ये संभूतिमुपासते. ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ सम्भूत्या १७ रताः.. (९) जो व्यक्ति विनाश की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं. जो संभूति ( सृजन ) के उपासक हैं, वे भी वैसे ही अंधकार में प्रवेश करते हैं. ( ९ ) अन्य देवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे.. (१०) अन्य देवों ने संभव से असंभव के बारे में विशेष रूप से कहा है. हम ने उन धीर पुरुषों से जाना है कि संभव से असंभव का प्रभाव उस से अलग है. ( १० ) सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय १७ सह. विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते.. (११) सृजन और विनाश इन दोनों को साथसाथ ही समझिए. विनाश से मृत्यु को तैरकर और सृजन से अमृत की प्राप्ति की जाती है. ( ११ ) अन्धं तमः प्र विशन्ति येविद्यामुपासते. ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ विद्याया १७ रताः.. (१२) जो अज्ञान की उपासना करते हैं, वे गहरे अंधकार में प्रवेश करते हैं. जो ज्ञान की उपासना करते हैं, वे भी फिर वैसे ही गहरे अंधकार में प्रवेश करते हैं. ( १२ ) अन्य देवाहुर्विद्याया ऽ अन्यदाहुरविद्यायाः. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे.. (१३) ४१८ - यजुर्वेद
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय
उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय हम ने धीर पुरुषों से विशेष रूप से जाना है कि विद्या का प्रभाव कुछ और होता है. अविद्या का प्रभाव कुछ और होता है. ( १३ ) विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभय ᳪ सह. अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते.. (१४) विद्या और अविद्या दोनों को ही साथसाथ समझिए. अविद्या से मृत्यु को पार किया जाता है. विद्या से अमृत तत्त्व को पाया जाता है. ( १४ ) वायुरनिलममृतमथेदं भस्मान्त ᳪ शरीरम्. ओ३म् क्रतो स्मर. क्लिबे स्मर. कृत ᳪ स्मर.. (१५) यह शरीर वायु, अमृत आदि से बना हुआ है. शरीर नाशवान है. हे यजमान! आप ओम् तथा अपनी क्षमता और किए गए कर्मों का स्मरण करो. ( १५ ) अग्ने नय सुपथा राये अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम ऽ उक्तिं विधेम.. (१६) हे अग्नि! आप हमें श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाइए. आप हमें ऐसे ही मार्ग से धन दिलाइए. हे विश्व! आप विद्वान् हैं. हम बारबार आप को नमन करते हैं. हम बारबार आप से अनुरोध करते हैं. आप हमें पापों से बचाने की कृपा करें. ( १६ ) हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्. योसावादित्ये पुरुषः सोसावहम्. ॐ खं बह्म.. (१७) सत्य का मुंह स्वर्णमय पात्र से ढका हुआ है. वह जो आदित्य पुरुष है, वह मैं हूं. आकाश में ओम् रूप में ब्रह्म ही व्याप्त है. ( १७ ) ( यजुर्वेद संपूर्ण ) यजुर्वेद - ४१९
विश्व बुक्स द्वारा प्रकाशित अन्य वेद भारतीय साहित्य एवं संस्कृति में वेदों की मान्यता चिरकाल से चली आ रही है. ऋग्वेद जहां विश्व की सब से प्राचीन पुस्तक है, वहीं यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद को इस का पूरक माना जाता है. ऋग्वेद आर्यों एवं भारतीयों की ही नहीं, विश्व की सब से प्राचीन पुस्तक है. इस का अनुवाद सायण भाष्य पर आधारित है. सामवेद को वेदत्रयी ( ऋक्, यजु और सामवेद ) में गिना जाता है. गीता में उपदेशक कृष्ण ने ‘वेदानां सामवेदोऽस्मि’ कह कर सामवेद की विशिष्टता की ओर संकेत किया है. अथर्ववेद में लौकिक जीवन से संबंधित औषधियों, जादू, टोनोटोटकों आदि का विस्तृत वर्णन किया गया है. अतः सभी वर्गों के पाठकों के लिए मंत्रों सहित चारों वेदों का सायण भाष्य पर आधारित सरल, सरस एवं सुबोध हिंदी अनुवाद पाठकों के समक्ष प्रस्तुत है. www.vishvbook.com 632/27
सामवेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ वेद ॥ अथर्ववेद ॥ द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुवे वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे गवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ र्णवेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद २॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे गवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ऋग्वेद ॥ सामवे वेद ॥ अथर्ववेद ॥ डा. रेखा व्यास एम.ए. (संस्कृत), पी-एच.डी.