यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
चौबीसवां अध्याय
चौबीसवां अध्याय विभिन्न देवी देवताओं के लिए अलगअलग जीव जंतु १-४० ३०४-३११ पच्चीसवां अध्याय विभिन्न अंगों से देवी की प्रसन्नता १ ३१२ विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण २-३ ३१२-३१३ अस्थि और देव ४-६ ३१३-३१४ शारीरिक अंगों से देवों का संबंध ७-९ ३१४ देवों के लिए हवि का विधान १०-१३ ३१५ कल्याण व रक्षा की कामना १४-२२ ३१५-३१७ सृष्टि की अनश्वरता २३ ३१७ देवों का पराक्रम २४ ३१७ यज्ञ का प्रिय पदार्थ पुरोडाश २५-२६ ३१७ यज्ञ से इच्छित उद्देश्यों की प्राप्ति २७-२८ ३१७-३१८ यज्ञ के हित साधक कार्य २९ ३१८ यज्ञ पशु पर नियंत्रण ३० ३१८ यज्ञ पशु के अंग देवों को समर्पित ३१-३४ ३१८-३१९ पुरोडाश की परिपक्वता ३५-३७ ३१९ यज्ञ के अश्व का व्यवहार एवं श्रृंगार ३८-४१ ३१९-३२० कालगत विभाजन ४२ ३२० अश्व की स्तुति ४३-४५ ३२०-३२१ इंद्र तथा अन्य देवों की उपासना ४६-४७ ३२१ छब्बीसवां अध्याय अग्नि आदि देवों से अनुकूलता के लिए प्रार्थना १-२ ३२२ बृहस्पति देव की उपासना ३ ३२२-३२३ इंद्र देव की स्तुति ४-५ ३२३ अग्नि देव की स्तुति ६-९ ३२३-३२४ इंद्र की स्तुति १०-११ ३२४ अग्नि से अन्न व बल की याचना १२-१३ ३२४ यज्ञ विस्तार की कामना १४ ३२४-३२५ ब्राह्मणों में बुद्धि १५ ३२५ सोम की स्तुति १६-१९ ३२५
सत्ताईसवां अध्याय
अग्नि की स्तुति २०-२२ ३२५-३२६ सोमरस की रक्षा करना २३ ३२६ देव पत्नियों से हवि ग्रहण की प्रार्थना २४ ३२६ मददायी व रक्षक सोम २५-२६ ३२६ सत्ताईसवां अध्याय अग्नि की उपासना १-७ ३२७-३२८ बृहस्पति देव तथा सविता देव की स्तुति ८-९ ३२८ सूर्य की आराधना १० ३२८ अग्नि और उन की दिव्य देवियों का आह्वान ११-२४ ३२९-३३० जल की अपारता २५-२६ ३३०-३३१ वायु की स्तुति २७-३४ ३३१-३३२ इंद्र देव की स्तुति ३५-४१ ३३२-३३३ अग्नि से रक्षा की कामना ४२-४५ ३३३ अट्ठाईसवां अध्याय इंद्र की उपासना १-६ ३३४-३३५ अश्विनीकुमारों के लिए यज्ञ ७ ३३५ तीन देवियों के लिए यज्ञ ८ ३३५ त्वष्टा देव की महिमा का गान ९ ३३५ शांतिदाता वनस्पति देव १० ३३६ विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण ११ ३३६ इंद्र के लिए यज्ञ कामना १२-१३ ३३६ उषा देवी और रात्रि देवी के लिए यज्ञ की कामना १४-१८ ३३६-३३७ इंद्र के लिए यज्ञ कामना १९ ३३८ वनस्पति देव के लिए यज्ञ की कामना २० ३३८ वैभव के लिए यज्ञ कामना २१ ३३८ अग्नि के लिए यज्ञ कामना २२ ३३८ अग्नि द्वारा होता का वरण २३ ३३८-३३९ अग्नि और इंद्र आदि के लिए यज्ञ २४-४६ ३३९-३४३ उनतीसवां अध्याय अग्नि की स्तुति १-३ ३४४
अदिति की विशालता ४-५ ३४४ रात्रि और उषा देवी का वर्णन ६ ३४५ अग्नि और वायु की वंदना ७ ३४५ भारती देवी से यज्ञ की रक्षा की कामना ८ ३४५ त्वष्टा देव के लिए यज्ञ कामना ९ ३४५ वनस्पति देव से प्रार्थना १० ३४५ अग्रगामी अग्नि ११ ३४५ मेघ देव की महिमा १२ ३४६ इंद्र देव का रथ १३ ३४६ मेघ देव के तीन बंधन १४-१७ ३४६ वायु की स्तुति १८ ३४७ अर्वन् देव की स्तुति १९-२४ ३४७-३४८ अग्नि की स्तुति २५-२८ ३४८ कुशों का सुखासन २९ ३४८ दिव्य द्वार वाली देवियां ३० ३४९ दिव्य कार्य करने वाली देवियां ३१ ३४९ विराट् यज्ञ के दो दिव्य होता ३२ ३४९ तीन देवियों का आह्वान ३३ ३४९ त्वष्टा देव का पूजन ३४ ३४९ यजमानों से निवेदन ३५ ३४९ अग्नि की स्तुति ३६-३७ ३४९-३५० वीरों के लिए विजय कामना ३८-४६ ३५०-३५१ रक्षा के लिए देवों से प्रार्थना ४७ ३५१ बाणों से कल्याण कामना ४८ ३५१ चाबुक, रथ व दुंदुभि आदि युद्ध साधनों का वर्णन ४९-५७ ३५१-३५३ विभिन्न देवताओं से संबंध ५८-६० ३५३-३५४ तीसवां अध्याय सविता देव की स्तुति १-४ ३५५ चारों वर्णों के कर्तव्य ५ ३५५ उपयुक्त संबंधों की विवेचना ६-२२ ३५५-३६० इकतीसवां अध्याय परम पुरुष का वर्णन १-३ ३६१
बत्तीसवां अध्याय
परम पुरुष के तीन पैर ४ ३६१ विराट् की उत्पत्ति ५-७ ३६१-३६२ पृथ्वी तथा अन्य जीवों की उत्पत्ति ८-१८ ३६२-३६३ प्रजापति की महिमा १९ ३६३-३६४ परम पुरुष से इच्छा पूर्ति करने का अनुरोध २०-२२ ३६४ बत्तीसवां अध्याय परम पुरुष का वर्णन १-६ ३६५-३६६ परम पुरुष की शक्ति ७ ३६६ परम पुरुष की व्यापकता एवं अमरता ८-१४ ३६६-३६७ बुद्धि की कामना १५ ३६७ ब्रह्मज्ञान की कामना १६ ३६७ तैंतीसवां अध्याय अग्नि की स्तुति और महिमा का गान १-१७ ३६८-३७० इंद्र देव का ध्यान १८ ३७१ यज्ञ रक्षक सूर्य की किरणें १९ ३७१ श्रेष्ठ कार्य हेतु देवों से अनुरोध २० ३७१ स्वर्ग और पृथ्वीलोकों के संरक्षक सोम २१ ३७१ इंद्र का गुणगान २२-३० ३७१-३७३ सर्व प्रकाशक सूर्य ३१ ३७३ भरणपोषण कर्ता वरुण ३२ ३७३ दिव्य अश्विनीकुमार ३३ ३७३ कल्याणकारी सविता ३४ ३७३ शत्रुनाशी इंद्र ३५ ३७३ सूर्य की महानता ३६-४४ ३७३-३७५ इंद्र, वायु, अग्नि व बृहस्पति आदि देवों का आह्वान ४५-५४ ३७५-३७६ वैभवशाली पुरोहित ५५ ३७६-३७७ इंद्र से सोमरस पीने का आग्रह ५६ ३७७ मित्र और वरुण का ध्यान ५७ ३७७ अश्विनीकुमारों से सोमपान का आग्रह ५८ ३७७ श्रेष्ठ वर्णीय मंत्रों से देवस्तुति ५९ ३७७ अग्नि का गुणगान ६०-६१ ३७७
सोम के लिए यजमानों से संबोधन ६२ ३७८ इंद्र की स्तुति ६३-६७ ३७८ सुमति के लिए आदित्य से प्रार्थना ६८ ३७८-३७९ सविता देव से घरों की रक्षा की कामना ६९ ३७९ सोमरस के लिए पुरोहित से प्रार्थना ७०-७१ ३७९ यज्ञ की पूर्णता के लिए देवों से प्रार्थना ७२ ३७९ यज्ञ के लिए पुरोहितों का आह्वान ७३ ३७९ सोम की पवित्रता ७४ ३७९ यज्ञ के लिए अग्नि का वरण ७५ ३७९-३८० इंद्र की महिमा ७६-८३ ३८०-३८१ सविता देव की आराधना ८४ ३८१ वायु देव की आराधना ८५ ३८१ इंद्र का आह्वान ८६-८७ ३८१ अश्विनीकुमारों से आगमन का अनुरोध ८८-८९ ३८२ चमकदार सोम देव ९० ३८२ बुद्धि के देवता को हवि देना ९१ ३८२ वैश्वानर की वंदना ९२ ३८२ पैर रहित उषा देवी की गति ९३ ३८२ वैभव पाने के लिए देव वंदना ९४ ३८२-३८३ इंद्र आदि देवों की महिमा ९५-९७ ३८३ चौंतीसवां अध्याय कल्याणकारी संकल्पों की आधारशिला मन १-६ ३८४-३८५ इंद्र की स्तुति ७ ३८५ अनुमति देवी से प्रार्थना ८-९ ३८५ सिनीवाली देवी १० ३८५ पांच रूपों वाली सरस्वती ११ ३८५ प्रथम पूजनीय अग्नि की स्तुति १२-१५ ३८५-३८६ इंद्र की स्तुति १६-१९ ३८६-३८७ शत्रुजयी सोम का वर्णन २०-२३ ३८७-३८८ सविता देव की स्तुति २४-२५ ३८८ सूर्य देव की महिमा २६ ३८८ सविता देव के अनुकरण की कामना २७ ३८८ अश्विनीकुमारों से यज्ञस्थलों में पधारने की कामना २८-३० ३८८-३८९ सविता देव की प्रशंसा ३१ ३८९
रात्रि देवी की प्रशंसा ३२ ३८९ उषा देवी की प्रशंसा ३३ ३८९ प्रातःकाल विभिन्न देवों का आह्वान ३४-३५ ३८९-३९० भग देव की स्तुति ३६ ३९० सूर्य देव की कृपा से धनवान होने की कामना ३७ ३९० भग देव का आह्वान ३८-३९ ३९० प्रभात वेला से कल्याण कामना ४० ३९० पूषा देव से बुद्धि को श्रेष्ठ कार्यों में लगाने की कामना ४१-४२ ३९१ विष्णु द्वारा विश्व धारण ४३-४४ ३९१ स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक ४५ ३९१ देवों से शत्रु पराजय की कामना ४६ ३९१ देवताओं सहित अश्विनीकुमारों से आने का अनुरोध ४७ ३९१-३९२ मरुद्गणों की स्तुति ४८ ३९२ दिव्य सृष्टि ४९ ३९२ स्वर्णमय धन ५०-५१ ३९२ चिरायु कामना से रक्षा बंधन ५२ ३९२ सभी देवों की स्तुति ५३-५४ ३९३ शरीर में विद्यमान सात प्राण व सात ऋषि ५५ ३९३ देवत्व धारण के लिए ब्रह्मणस्पति का आह्वान ५६ ३९३ मंत्रों में देवों का वास ५७ ३९३ संसार के नियंत्रक देवगण ५८ ३९४ पैंतीसवां अध्याय देवपुत्रों का लोक १-३ ३९५ पीपल और पलाश वृक्षों पर वास करने वाली ओषधियां ४ ३९५ सुखदायी पृथ्वी का आह्वान ५ ३९५ प्रजापति से जलधारा के लिए प्रार्थना ६ ३९५-३९६ मृत्यु का पथ ७ ३९६ सर्वकल्याणकारी कामना ८-१० ३९६ पापकर्मों को दूर हटाने का आग्रह ११ ३९६ जल एवं ओषधियों से मैत्री १२ ३९६-३९७ बछड़े का आह्वान १३ ३९७ प्रकाशमय स्वर्गलोक १४ ३९७ मर्यादा रूपी परिधि १५ ३९७
छत्तीसवां अध्याय
अग्नि की स्तुति १६-२० ३९७-३९८ पृथ्वी देवी से सुख प्रदान करने की प्रार्थना २१ ३९८ अग्नि के लिए आहुति अर्पण २२ ३९८ छत्तीसवां अध्याय नेत्रों और कानों की सामर्थ्य प्राप्त करने की कामना १ ३९९ बृहस्पति देव से विभिन्न दोष दूर करने का आग्रह २ ३९९ स्वयंभू शक्तिमान परमात्मा ३-४ ३९९ इंद्र से धन की कामना ५-७ ३९९-४०० विश्व की शोभा इंद्र ८ ४०० इंद्र, वरुण, अग्नि व मित्र आदि देवों की स्तुति ९-११ ४०० जल और पृथ्वी से कल्याण कामना १२-१६ ४०१ स्वर्गलोक और अंतरिक्षलोक १७ ४०१ परमात्मा की स्तुति १८-१९ ४०१-४०२ अग्नि की स्तुति २० ४०२ परमात्मा की स्तुति २१-२२ ४०२ जल व ओषधियों आदि से मैत्री कामना २३ ४०२ हितकारी सूर्य २४ ४०२ सैंतीसवां अध्याय सविता देव की स्तुति १ ४०३ सर्वविद परमात्मा २ ४०३ दिव्य शक्तियों को यज्ञ में आने के लिए आमंत्रण ३ ४०३ दिव्य यज्ञ में अग्नि शिरोधार्य ४-६ ४०३-४०४ यज्ञ में विभिन्न देवी देवताओं का आह्वान ७ ४०४ अग्नि की स्तुति ८ ४०४ परमात्मा की स्तुति ९ ४०५ सुरक्षा के लिए सामर्थ्यशाली देव की अर्चना १०-११ ४०५ पृथ्वी देवी की स्तुति १२ ४०६ मरुद्गणों के लिए आहुति अर्पण १३ ४०६ परमात्मा बुद्धि के पिता हैं १४-१७ ४०६-४०७ सर्वरक्षक सूर्य देव १८ ४०७ परमात्मा की स्तुति १९-२१ ४०७
अड़तीसवां अध्याय
अड़तीसवां अध्याय यज्ञ ऊर्जा को ग्रहण करना १ ४०८ इड़ा एवं सरस्वती देवी का आह्वान २ ४०८ पोषक यज्ञ ऊर्जा ३ ४०८ अश्विनी व इंद्र आदि देवों के लिए आहुति ४ ४०८ सरस्वती देवी का दिव्य ज्ञान ५ ४०८ इंद्र देव की गायत्री छंद से स्तुति ६ ४०९ वायु के लिए आहुति अर्पण ७ ४०९ इंद्र देव के लिए आहुति ८ ४०९ यम देव के लिए आहुति ९ ४०९ यज्ञ विस्तार के लिए रसमयी आहुतियां १० ४१० सुखशांति के लिए आहुति अर्पण ११ ४१० अश्विनीकुमारों से यज्ञ की रक्षा करने की प्रार्थना १२-१३ ४१० परब्रह्म से प्रजा की रक्षा के लिए आग्रह १४ ४१० विभिन्न देवों के लिए आहुति अर्पण १५ ४१०-४११ दिव्य गुण वाली परम शक्ति १६ ४११ अग्नि की स्तुति १७-१८ ४११ परम शक्ति की स्तुति १९-२० ४११-४१२ यज्ञ देव का आह्वान एवं उन की स्तुति २१-२८ ४१२-४१३ उनतालीसवां अध्याय समृद्धि एवं कल्याण के लिए देवों को आहुतियां १-७ ४१४-४१५ विभिन्न शारीरिक अंगों से देवों की प्रसन्नता ८-९ ४१५-४१६ विभिन्न देवों के लिए आहुतियां १०-१३ ४१६ चालीसवां अध्याय ईश्वर की आराधना १ ४१७ कर्म करते हुए सौ वर्षों तक जीने की इच्छा २ ४१७ अजन्मा ईश्वर एक है ३-४ ४१७ परम शक्ति की व्यापकता ५-८ ४१७-४१८ सृजन और विनाश ९-१२ ४१८
विद्या से अमृत तत्त्व की प्राप्ति १३-१४ ४१८-४१९ ओम् का स्मरण १५ ४१९ अग्नि से श्रेष्ठ मार्ग पर ले जाने का अनुरोध १६ ४१९ आकाश में ओम् रूप में ब्रह्म १७ ४१९
पहला अध्याय
पूर्वार्ध पहला अध्याय इषे त्वोर्जे त्वा वायव स्थ देवो वः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कर्मण ऽ आप्यायध्वमघ्न्या ऽ इन्द्राय भागं प्रजावतीरनमीवा ऽ अयक्ष्मा मा व स्तेन ऽ ईशत माघश ँसो ध्रुवा ऽ अस्मिन् गोपतौ स्यात बह्वीर्यजमानस्य पशून्पाहि.. (१) हे मनुष्यो! सविता देव आप को ऊर्जस्वी बनाने की कृपा करें. वायु आप को स्वस्थ बनाने की कृपा करें. आप सभी श्रेष्ठता को प्राप्त कीजिए. आप सभी कर्म की ओर प्रेरित होइए. आप अपना यज्ञ भाग इंद्र देव को भेंट कीजिए. ईश्वर आप को श्रेष्ठ संतान प्रदान करें. आप ईश्वर की कृपा से निरोगी हों. आप यक्ष्मा ( क्षय ) जैसे घातक रोगों से दूर हों. दुष्ट और चोर लोग आप के भाग्य विधाता ( निर्णायक ) न बन जाएं. आप को श्रेष्ठ संरक्षण मिले. आप दुष्टों से दूर रहें. आप परमेश्वर की छत्रच्छाया में रहें. आप गोपति हों. सज्जन यजमानों की बढ़ोतरी हो. आप के पशु धन की रक्षा हो. ( १ ) वसोः पवित्रमसि द्यौरसि पृथिव्यसि मातरिश्वनो घर्मो ऽ सि विश्वधा ऽ असि. परमेण धाम्ना दृ ँहस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्.. (२) हे मनुष्यो! आप वस्तुओं को पवित्र करने के माध्यम ( बनाने वाले ) हों. आप स्वर्गलोक, पृथ्वी, पालक, ऊष्मा व विश्वधारक हैं. आप अपने परम तेज से दृढ़ बनिए. आप के यज्ञपति ( यज्ञ में मददगार ) भी कठोर न हों. ( २ ) वसोः पवित्रमसि शतधारं वसोः पवित्रमसि सहस्रधारम्. देवस्त्वा सविता पुनातु वसोः पवित्रेण शतधारेण सुप्वा कामधुक्षः.. (३) आप पवित्र वसु, सैकड़ों, हजार धाराओं वाले व पवित्र करने वाले हैं. हे मनुष्यो! सविता देव पवित्र करने वाले हैं. वे अपनी सैकड़ों धाराओं से आप को पवित्र बनाने की कृपा करें. आप इस के बाद और किस कामधेनु को दुहना चाहते हैं ? अर्थात् उन की इतनी कृपा हो जाने के बाद और किस कामना की पूर्ति बाकी रह जाती है. ( ३ ) यजुर्वेद - ३१
पूर्वार्ध पहला अध्याय
पूर्वार्ध पहला अध्याय सा विश्वायुः सा विश्वकर्मा सा विश्वधायाः. इन्द्रस्य त्वां भाग ꣳ सोमेनातनच्मि विष्णो हव्य ꣳ रक्ष.. (४) हे मनुष्यो! वह (सविता देव की कृपा) पूर्ण आयु देने वाली है. सभी कर्म करने में समर्थ है. सभी को धारण करने की शक्ति रखती है. इंद्र के भाग में सोमरस मिला कर हवि तैयार करते हैं. विष्णु हवि की रक्षा करने की कृपा करें. (४) अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं तन्मे राध्यताम्. इदमहमनृतात्सत्यमुपैमि.. (५) हे अग्नि! आप संकल्पशील हैं. आप हमें भी व्रतशील बनाने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से हम यह धन (व्रत रूपी) और असत्य से सत्य को पा सकें. (५) कस्त्वा युनक्ति स त्वा युनक्ति कस्मै त्वा युनक्ति तस्मै त्वा युनक्ति. कर्मणे वां वेषाय वाम्.. (६) हे मनुष्यो! किस ने आप को नियुक्त किया है? किसलिए आप को नियुक्त किया गया है ? परमेश्वर ने आप को नियुक्त किया है. श्रेष्ठ कर्म में नियुक्त किया है. (६) प्रत्युष्ट ꣳ रक्षः प्रत्युष्टा ऽ अरातयो निष्टप्त ꣳ रक्षो निष्टप्ता ऽ अरातयः. उर्वन्तरिक्षमन्वेमि.. (७) हे मनुष्यो! आप यज्ञ और उस के साधनों की रक्षा कीजिए. निकृष्ट राक्षस नष्ट हो गए हैं. अन्य विकार भी समाप्त हो गए हैं. अब हवि आदि अंतरिक्ष में पहुंचने वाली वस्तुएं (बिना बाधा के) अंतरिक्ष में जाने की कृपा करें. (७) धूरसि धूर्व धूर्वन्तं धूर्व तं योस्मान्धूर्वति तं धूर्व यं वयं धूर्वामः. देवानामसि वह्नितम ꣳ सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमं देवहूतमम्.. (८) हे परमेश्वर! आप सामर्थ्यवान हैं. आप अपनी सामर्थ्य से धूर्तों का नाश कीजिए. जो हम सभी को दुःख पहुंचाते हैं. आप उन पापियों और दुष्टात्माओं का नाश कीजिए जिन का सभी नाश करना चाहते हैं. आप देवों में सर्वाधिक तेजस्वी, शक्तिदाता, पूर्णतादायी और देवताओं को आमंत्रित करने वाले हैं. (८) अहुतमसि हविर्धानं दृ ꣳ हस्व मा ह्वार्मा ते यज्ञपतिर्ह्वार्षीत्. विष्णुस्त्वा क्रमतामुरु वातायापहत ꣳ रक्षो यच्छन्तां पञ्च.. (९) हे मनुष्यो! आप देव शक्ति धारण कर सकते हैं. आप हवि धारण करते हैं. आप दृढ़ हैं. आप और आप के यज्ञ के सहयोगी किसी के प्रति कठोर न बनें. विष्णु व विशाल वायुमंडल (पर्यावरण) आप पर कृपा करें. आप की पंचेंद्रियां श्रेष्ठ कार्यों में लगें. (९) ३२ - यजुर्वेद 632/2
पूर्वार्ध पहला अध्याय देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्चिनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. अग्नये जुष्टं गृह्णाम्यग्नीषोमाभ्यां जुष्टं गृह्णामि.. (१०) हे परमेश्वर! आप ने सविता देव और अन्य देवों को जना है. अश्विनी देव बाहु से हवि ग्रहण करते हैं. पूषा देव हाथों से हवि ग्रहण करते हैं. अध्वर्यु ( पुरोहित ) अग्नि की ( को भेंट करने के लिए ) प्रिय हवि ग्रहण करते हैं. पुरोहित अग्नि और सोम को भेंट करने के लिए उन्हें प्रिय लगने वाले पदार्थ ही ग्रहण करते हैं. ( १० ) भूताय त्वा नारातये स्वरभिविख्येषं दृ ઽ हथं हन्तां दुर्याः पृथिव्यामुर्वन्तरिक्षमन्वेमि. पृथिव्यास्त्वा नाभौ सादयाम्यदित्या ऽ उपस्थेग्ने हव्य ઽ हथं रक्ष.. (११) हे अग्नि! आप अदिति के पुत्र हैं. यज्ञकुंड पृथ्वी ( माता ) की नाभि है. उस में हम ने हवि स्थापित की है. आप उस हवि की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप को मनुष्य के कल्याण के लिए स्थापित किया गया है. हमें अपने में व्याख्यायित ( मौजूद ) परम शक्ति का अनुभव हो. दुष्टों का विनाश हो. हम अंतरिक्ष और पृथ्वी पर बिना किसी बाधा के घूमफिर ( विचर ) सकें. ( ११ ) पवित्रे स्थो वैष्णव्यौ सवितुर्वः प्रसव उत्पूनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः. देवीरापो अग्रेगुवो अग्रेपुवो ग्र ऽ इममद्य यज्ञं नयताग्रे यज्ञपति ઽ हथं सुधातुं यज्ञपतिं देवयुवम्.. (१२) हे जल देव! इंद्र ने वृत्र का नाश करने के लिए ( सहयोग हेतु ) आप को चुना. आप ने वृत्रासुर के नाश में इंद्र का वरण किया. आप ने वृत्रासुर के नाश में इंद्र का सहयोग किया. आप अग्नि के प्रिय हैं. हम अग्नि के लिए आप को परिष्कृत ( शुद्ध ) करते हैं. आप सोम के प्रिय हैं. हम सोम के लिए आप को परिष्कृत करते हैं. हम देवताओं से संबंधित कार्यों के लिए आप को शुद्ध करते हैं. ( १२ ) युष्मा इन्द्रोवृणीत वृत्रतूर्ये यूयमिन्द्रमवृणीध्वं वृत्रतूर्ये प्रोक्षिताः स्थ. अग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षाम्यग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि. दैव्याय कर्मणे शुन्धध्वं देवयज्यायै यद्वोशुद्धाः पराजघ्नुरिदं वस्तच्छुन्धामि.. (१३) हे जल देव! हम देव संबंधी यज्ञ कार्यों के लिए आप को शुद्ध करते हैं. यज्ञ के अशुद्ध उपकरण भी ग्रहण करने योग्य नहीं होते. अशुद्ध जल भी यज्ञ में ग्रहण नहीं किया जाता. ( १३ ) शर्मास्यवधूत ઽ हथं रक्षोवधूता ऽ अरातयो दित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु. अद्रिरसि वानस्पत्यो ग्रावासि पृथुबुध्नः प्रति त्वादित्यास्त्वग्वेत्तु.. (१४) सुख के आसन से राक्षसों, दुष्टों व दैत्यों को दूर कर दिया गया है. आसन पृथ्वी पर आवरण है. पृथ्वी माता उस आसन को स्वीकार करने की कृपा करें. आप पत्थर की तरह मजबूत हैं. आप का आधार भी पत्थर की तरह मजबूत है. आप यजुर्वेद - ३३
पूर्वार्ध पहला अध्याय वनस्पति से निर्मित हैं. पृथ्वी माता आप को धारण करने की कृपा करें. ( १४ ) अग्नेस्तनूरसि वाचो विसर्जनं देववीतये त्वा गृह्णामि बृहद्ग्रावासि वानस्पत्यः स ऽ इदं देवेभ्यो हविः शमीष्व सुशमि शमीष्व. हविष्कृदेहि हविष्कृदेहि.. (१५) हे मनुष्यो! हवि को मंत्रों के साथ ( अग्नि में ) देवताओं के लिए विसर्जित किया जाता है. हे हवि! आप अग्नि देव का शरीर हो. हवि को तैयार करने वाला ओखल और मूसल विशाल ( बड़े ) पत्थर और वनस्पति से तैयार किया जाता है. इन से देवताओं के लिए हवि तैयार की जाती है. देवताओं को हवि भेंट करने के लिए मूसल ग्रहण किया जाता है. मूसल श्रेष्ठ हवि तैयार कर के देवताओं को सुख प्रदान करें. हे मूसल! आप हवि तैयार करने के लिए आइए ( पधारिए ). ( १५ ) कुक्कुटोसि मधुजिह्व ऽ २४ इषमूर्जमावद त्वया वय २४ संघात २४ संघातं जेष्म वर्षवृद्धमसि प्रति त्वा वर्षवृद्धं वेत्तु परापूत २४ रक्षः परापूता ऽ अरातयोपहत २४ रक्षो वायूर्वो विविनक्तु देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृह्णात्वच्छिद्रेण पाणिना.. ( १६) हे शम्य ( यज्ञ में काम आने वाला साधन ) ! आप कुक्कुट हैं यानी मुरगे की तरह जागरूक रहने वाले हैं. आप मधुर जीभ वाले ( मीठा बोलने वाले ) हैं. आप हमें ऊर्जस्वी बनाने और बल प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप की कृपा से हम संघातों ( संघर्षों ) में दृढ़ता व संघातों में विजय प्राप्त करें. हे सूप ! हे हवि! आप प्रतिवर्ष बरसात से बढ़ोतरी पाते हैं. यज्ञ बरसात की बढ़ोतरी करते हैं. यज्ञ देव आप को स्वीकार करने की कृपा करें. आप को पूरी तरह पवित्र बना लिया गया है. अशुद्धियों से आप की रक्षा कर ली गई है. शत्रुओं को दूर कर दिया गया है. वायु आप की रक्षा करें. वे आप के माध्यम से हवि को शुद्ध ( फटकने ) करने की कृपा करें. सविता देव अपने सोने के बिना छेद वाले हाथों से आप को ग्रहण करने की कृपा करें. ( १६ ) धृष्टिरस्यपाग्ने अग्निममादं जहि निष्क्रव्याद २४ सेधा देवयजं वह. ध्रुवमसि पृथिवीं दृ २४ ह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय.. ( १७) हे उपवेष देव ( यज्ञ में काठ का पात्र जो अग्नि धारण करता है ) ! आप धैर्यवान हैं. आप देवताओं के लिए किए जाने वाले यज्ञ ( अग्नि ) को वहन करने की कृपा कीजिए. आप कच्ची चीजों और मांस को पकाने वाली अग्नि छोड़ दीजिए अर्थात् आप इन दोनों अग्नियों को धारण मत कीजिए. आप यज्ञ-अग्नि ( गार्हपत्य ) को धारण करने की कृपा कीजिए. आप ध्रुव ( स्थिर ) हैं. आप पृथ्वी पर दृढ़ता से बने रहने की कृपा कीजिए. आप ब्राह्मणों, क्षत्रियों व श्रेष्ठ जाति वालों को धारण करते हैं. हम शत्रुओं के वध के लिए आप को धारण करते हैं. ( १७ ) ३४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पहला अध्याय अग्ने ब्रह्म गृभीष्व धरुणमस्यन्तरिक्षं दृ ᳪ ह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय. धर्त्रमसि दिवं दृ ᳪ ह ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि सजातवन्युपदधामि भ्रातृव्यस्य वधाय. विश्वाभ्यस्त्वाशाभ्य ऽ उपदधामि चितः स्थोर्ध्वचितो भृगूणामङ्गिरसां तपसा तप्यध्वम्.. (१८) हे अग्नि! आप ब्राह्मणों को धारण करते हैं. आप अंतरिक्ष को दृढ़ बनाते हैं. आप ब्राह्मणों, क्षत्रियों व श्रेष्ठ जाति वालों को धारण करते हैं. हम शत्रुओं का वध करने के लिए आप को धारण करते हैं. आप सभी को चेतना देते हैं. आप हमें ऊर्ध्वगामी, स्थिरचित्त तथा भृगु और अंगिरस ऋषि के तप की तरह तेजस्वी बनाने की कृपा कीजिए. ( १८ ) शर्मास्यवधूत ᳪ रक्षोवधूता अरातयो दित्यास्त्वगसि प्रति त्वादितिर्वेत्तु. धिषणासि पर्वती प्रति त्वादित्यास्त्वग्वेत्तु दिवः स्कम्भनीरसि धिषणासि पार्वतेयी प्रति त्वा पर्वती वेत्तु.. (१९) यज्ञ का आसन सुखदायी है. इस आसन से राक्षसों व दुष्टों को हटाया गया है. यह पृथ्वी का आवरण है. इसलिए पृथ्वी इसे अपना जाने. हे सिल ( पत्थर )! आप पर्वत से उत्पन्न कर्मशक्ति हैं. इसलिए पृथ्वी आप को अपना जाने. हे शय्ये! आप स्वर्गलोक की रोक हैं. हे लोढ़े! आप घर्षण ( रगड़ ) करने वाले हैं. आप सिल की पुत्री के समान हैं. इसलिए सिल आप को अपना जाने ( १९ ). धान्यमसि धिनुहि देवान् प्राणाय त्वोदानाय त्वा व्यानाय त्वा. दीर्घामनु प्रसितिमायुषे धां देवो वः सविता हिरण्यपाणिः प्रतिगृह्णात्वच्छिद्रेण पाणिना चक्षुषे त्वा महीनां पयोसि.. (२०) हे हविधान्य! आप देवताओं को तृप्त कीजिए. आप प्राण, उदान ( प्राणवायु ) व्यान ( शरीर में रहने वाली एक वायु ) को धारण करते हैं. आप दीर्घायु देते हैं. पृथ्वी आप को धारण करती है. आप दूध रूप में अमृत हैं. सविता देव छिद्र रहित सोने के हाथों से आप को धारण करने की कृपा करें. ( २० ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. सं वपामि समाप ऽ ओषधीभिः समोषधयो रसेन. सं ᳪ रेवतीर्जगतीभिः पृच्यन्ता ᳪ सं मधुमतीर्मधुमतीभिः पृच्यन्ताम्.. (२१) सविता देव! आप प्रकाश पैदा करते हैं. उस प्रकाश में अश्विनी देव ओषधियों को अपने बाहुओं से बढ़ाते हैं. पूषा देव अपने हाथों से ओषधियों को बढ़ाते हैं. ओषधियां ओषधियों के रस से सिंच जाएं. वे संसार को अपने रस से सींचें और मधुरता प्राप्त करें. वे मधुरतायुक्त जल प्रवाहों से सिंच जाएं. ( २१ ) यजुर्वेद - ३५
पूर्वार्ध पहला अध्याय जनयत्यै त्वा संद्यौमीदमग्नेरिदमग्नीषोमयोborderरेषे त्वा घर्मोसि विश्वायुरुरुप्रथा ऽ उरु प्रथस्वोरु ते यज्ञपतिः प्रथतामग्निष्टे त्वचं मा हि १७ सीद्देवस्त्वा सविता श्रपयतु वर्षिष्ठेधि नाके.. (२२) पानी और पिसे हुए चावल को मिलाया जाता है. फिर उसे अग्नि में पकाया जाता है. इस क्रिया से पुरोडाश (यज्ञ में आहुति देने के लिए पकाई गई टिकिया) बनाया जाता है. पुरोडाश यजमान को दीर्घायु व ऊर्जस्वी बनाता है. वह यजमान के यश को और फैलाता है. उसे अग्नि और सोम के लिए तैयार किया जाता है. सविता देव स्वर्गलोक की अग्नि से पुरोडाश पकाने की कृपा करें. (२२) मा भेर्मा संविक्था ऽ अतमेरुर्यज्ञोतमेरुर्यजमानस्य प्रजा भूयात् त्रिताय त्वा द्विताय त्वैकताय त्वा.. (२३) हे मनुष्यो! डरो मत. पीछे मत हटो. यज्ञ कार्य यजमान को संकट मुक्त करने वाला होता है. एक गुनी, दो गुनी और तीन गुनी कितनी ही प्रजा हो सभी को संकट मुक्त करने वाला होता है. (२३) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आददेध्वरकृतं देवेभ्य ऽ इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणः सहस्त्रभृष्टिः शततेजा वायुरसि तिग्मतेजा द्विषतोवधः.. (२४) हे सविता! आप दुनिया के लिए प्रकाश फैलाते हैं. हम अश्विनी देव की बाहुओं और पूषा देव के हाथों से आप को धारण करते हैं. हम देवताओं की तृप्ति के लिए यज्ञ करते हैं. आप इंद्र देव की दाहिनी भुजा हैं. आप अपने तेज से हजारों विकारों को जला देने वाले वायु हैं. आप अत्यंत प्रकाश युक्त व तीक्ष्ण तेजवान हैं. आप दोषियों का नाश करने की सामर्थ्य रखते हैं. (२४) पृथिवि देवयजन्योषध्यास्ते मूलं मा हि १७ सिषं व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या १७ शतेन पाशैर्योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक्.. (२५) हे पृथ्वी माता (देव)! आप में उपजने वाली ओषधियों को हमारे कारण नुकसान न पहुंचे. देवताओं के लिए हवन किया जा रहा है. उस के लिए (खोद कर) मिट्टी हटाई गई है. हे मिट्टी! आप गायों के बाड़े में जाइए. स्वर्गलोक आप पर अपनी कृपा बरसाए. हे सविता! आप पृथ्वी पालक हैं. आप हम से द्वेष करने वालों को अपने सैकड़ों पाशों से बांध दीजिए व उन्हें मुक्त मत कीजिए. (२५) अपाररुं पृथिव्यै देवयजनाद्वध्यासं व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान देव सवितः परमस्यां पृथिव्या १७ शतेन पाशैर्योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक्. अररो दिवं मा पप्तो द्रप्सस्ते द्यां मा स्कन् व्रजं गच्छ गोष्ठानं वर्षतु ते द्यौर्बधान ३६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पहला अध्याय देव सवितः परमस्यां पृथिव्या ᳪ शतेन पाशैर्योस्मान्द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मस्तमतो मा मौक्.. (२६) हम ने दुष्ट अररु नामक शत्रु को पृथ्वी से दूर कर दिया है. मिट्टी को निकाल कर जगह साफ कर दी है. अब उस मिट्टी से निवेदन करते हैं कि वह गायों के बाड़े में जाए. स्वर्गलोक पृथ्वी पर पर्याप्त बरसात करने की कृपा करे. सविता सिरजनहार हैं. वे हम से द्वेष करने वालों को सैकड़ों बंधनों से बांध दें और उन्हें कभी मुक्त न करें. (२६) गायत्रेण त्वा छन्दसा परिगृह्णामि त्रैष्टुभेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि. जागतेन त्वा छन्दसा परिगृह्णामि. सुक्ष्मा चासि शिवा चासि स्योना चासि सुषदा चास्यूर्जस्वती चासि पयस्वती च.. (२७) हे मनुष्यो! हम यज्ञवेदिका को गायत्री, त्रिष्टुप् और जगती छंदों वाली प्रार्थनाओं से रचते हैं. यज्ञवेदिका दर्शनीय, कल्याणकारिणी, ऊर्जस्विनी व अमृतवती है. (२७) पुरा क्रूरस्य विसृपो विरप्शिन्नुदादाय पृथिवीं जीवदानुम्. यामैरयँश्चन्द्रमसि स्वधाभिस्तामु धीरासो अनुदिश्य यजन्ते. प्रोक्षणीरासादय द्विषतो वधोसि.. (२८) हे परमेश्वर! आप वीरों के और क्रूर युद्धों में वीर यजमानों के सर्वस्व हैं. आप पृथ्वी पर जीवन दान व दानअनुदान की कृपा कीजिए. धीर पृथ्वी को चंद्रमा की ओर प्रेरित करने के उद्देश्य से स्वधा (यज्ञ में दी जाने वाली आहुति) के द्वारा यज्ञ करते हैं. हे याजको! आप यज्ञ में काम आने वाले साधनों को अपने पास ले कर बैठिए. ईश्वर हम से द्वेष करने वालों का वध करने की कृपा करें. (२८) प्रत्युष्ट ᳪ रक्षः प्रत्युष्टा ऽ अरातयो निष्पप्त ᳪ रक्षो निष्पप्ता ऽ अरातयः. अनिशितोसि सपत्नक्षिद्वाजिनं त्वा वाजेध्यायै सम्मार्ज्म. प्रत्युष्ट ᳪ रक्षः प्रत्युष्टा ऽ अरातयो निष्पप्त रक्षो निष्पप्ता ऽ अरातयः. अनिशितासि सपत्नक्षिद्वाजिनीं त्वा वाजेध्यायै सम्मार्ज्म.. (२९) राक्षसों व शत्रुओं को नष्ट कर दिया गया है. हम पूर्णतया रक्षित हैं. अब हमें पत्नी सहित यज्ञ करने के लिए प्रवृत्त होना चाहिए. हमारे साधन भले ही उतने पैने नहीं हैं, परंतु उन्होंने राक्षसों और शत्रुओं को नष्ट कर दिया है. हमें पूरी तरह सुरक्षित बना लिया है. हम पत्नी सहित अन्न व बल की प्राप्ति के लिए यज्ञ करते हैं. हम अन्न व बल का ध्यान करते हुए आप को सम्मार्जित करते हैं. (२९) यजुर्वेद - ३७
पूर्वार्ध पहला अध्याय अदित्यै रास्नासि विष्णोर्वेषोऽस्यूर्जे त्वादब्धेन त्वा चक्षुषावपश्यामि. अग्नेर्जिह्वासि सुहूर्देवेभ्यो धाम्ने धाम्ने मे भव यजुषे यजुषे.. (३०) हे अदिति देव! आप रसमय, विष्णु के वास स्थल व ऊर्जस्वी हैं. हम कमल जैसे नेत्रों से बारबार आप को देखते हैं. आप अग्नि की जीभ, देवताओं के निवास स्थल व सर्वत्र व्यापक हैं. हे यजमानो! आप धामधाम पर ऐसे देव को पुकारें व आमंत्रित करें. ( ३० ) सवितुस्त्वा प्रसव ऽ उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः. सवितुर्वः प्रसव ऽ उत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेण सूर्यस्य रश्मिभिः. तेजोसि शुक्रमस्यमृतमसि धाम नामासि प्रियं देवानामनाधृष्टं देवयजनमसि (३१) सविता ने यज्ञ साधनों को उत्पन्न किया है. बिना छेद वाली पवित्र सूर्य की किरणों से इन यज्ञ-साधनों को शुद्ध करते हैं. आप तेजस्वी, चमकीले, अमृत देवताओं के प्रिय तथा अधृष्ट (विनयी) हैं. आप देवताओं के लिए किए जा रहे इस यज्ञ के प्रमुख साधन हैं. ( ३१ ) ३८ - यजुर्वेद
दूसरा अध्याय
दूसरा अध्याय कृष्णोस्याखरेष्ठोग्नये त्वा जुष्टं प्रोक्षामि वेदिरसि बर्हिषे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि बर्हिरसि स्रुग्भ्यस्त्वा जुष्टं प्रोक्षामि.. (१) हे समिधा! हम यज्ञ में इष्ट होने के कारण आप को पवित्र करते हैं. हे वेदिका! यज्ञ के लिए आप भी आवश्यक हैं. आप को भी ( प्रक्षालित कर के ) पवित्र करते हैं. हे कुशा ( यज्ञ में प्रयोग आने वाली घास )! आप को भी हम ( प्रक्षालित कर के ) पवित्र करते हैं. ( १ ) अदित्यै व्युन्दनमसि विष्णोः स्तूपोस्यूर्णम्म्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थां देवेभ्यो भुवपतये स्वाहा भुवनपतये स्वाहा भूतानां पतये स्वाहा.. (२) हे यज्ञजल! आप अदिति ( पृथ्वी ) को सींचते हैं. आप ओषधियों को सींचते हैं. हे स्तूप के आकार वाले कुशो! देवताओं के लिए नरम ( कोमल ) आसन के रूप में आप को फैलाया जाता है. हे यजमानो! आप देवताओं, पृथ्वीपति, पृथ्वीपालक और प्राणियों आदि के लिए आहुति अर्पित कीजिए. ( २ ) गन्धर्वस्त्वा विश्वावसुः परिदधातु विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः. इन्द्रस्य बाहुरसि दक्षिणो विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः. मित्रावरुणौ त्वोत्तरतः परिधत्तां ध्रुवेण धर्मणा विश्वस्यारिष्ट्यै यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिड ऽ ईडितः.. (३) विश्वावसु गंधर्व यज्ञ की परिधियों ( घेरों ) की रक्षा करने की कृपा करें. यजमान के सभी प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) के निवारण के लिए अग्नि और यज्ञ की परिधियों की उपासना करते हैं. यज्ञपरिधि इंद्र की दाईं भुजा है. यजमान को संरक्षण देने वाली है. यजमान के सब प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) निवारण के लिए अग्नि और यज्ञ की परिधि की उपासना करते हैं. मित्र और वरुण उत्तर से धर्म के साथ यज्ञ की परिधि को धारण करने की कृपा करें. हम यजमान के सभी प्रकार के अनिष्ट ( अमंगल ) का निवारण करने के लिए अग्नि और यज्ञ की परिधि की उपासना करते हैं. ( ३ ) यजुर्वेद - ३९
पूर्वार्ध दूसरा अध्याय वीतिहोत्रं त्वा कवे द्युमन्त १८ समिधीमहि. अग्ने बृहन्तमध्वरे.. (४) हे अग्नि! आप यज्ञ में प्रमुख हैं. आप विशाल, तेजस्वी, कवि व भूत और भविष्य को जानने वाले हैं. हम समिधा से आप को प्रज्वलित करते हैं. (४) समिदसि सूर्यस्त्वा पुरस्तात् पातु कस्याश्चिदभिशस्त्यै. सवितुर्बाहू स्थ ऽ ऊर्णम्रदसं त्वा स्तृणामि स्वासस्थं देवेभ्य ऽ आत्वा वसवो रुद्रा ऽ आदित्याः सदन्तु.. (५) हे समिधा! सूर्य आप की रक्षा करने की कृपा करे. हे कुश! सूर्य आप की रक्षा करने की कृपा करे. समिधा और कुश दोनों ही सविता देव की दोनों भुजाएं हो जाएं. हम यजमान भेड़ के बालों से बने आसन को बिछा रहे हैं. ये आसन हम देवताओं के लिए बिछाते हैं ताकि देवता सुखपूर्वक विराज सकें. वसु, रुद्र व आदित्य पधार कर आसन पर विराजने की कृपा करें. (५) घृताच्यसि जुहूर्नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् घृताच्यस्युपभृन्नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् घृताच्यसि ध्रुवा नाम्ना सेदं प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद् प्रियेण धाम्ना प्रिय १८ सद ऽ आसीद्. ध्रुवा असदन्नृतस्य योनौ ता विष्णो पाहि पाहि यज्ञं पाहि यज्ञपतिं पाहि मां यज्ञन्यम्.. (६) जुहू नामक यज्ञ साधन को घी प्रिय है. (घी) घृत-सिंचन के बाद वह प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. वह यजमानों को घृत देने की कृपा करें. उपभृत नामक यज्ञ साधन को (घी) घृत-सिंचन के बाद वह प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. ध्रुव नामक यज्ञ साधन को घी प्रिय है. घृत-सिंचन के बाद वह अपने प्रिय धाम (यज्ञस्थान) पर पधारने की कृपा करें. हे विष्णु! आप यज्ञस्थान पर पधारने व विराजने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ, साधनों, उसे करने वालों और उस के सहायकों की रक्षा कीजिए. (६) अग्ने वाजजिद्वाजं त्वा सरिष्यन्तं वाजजित १८ सम्मार्ज्मि. नमो देवेभ्यः स्वधा पितृभ्यः सुयमे मे भूयास्तम्.. (७) हे अग्नि! आप अन्नदाता हैं. शक्तिमान लोग अन्न की प्राप्ति हेतु आप को सम्मार्जित (शुद्ध) करते हैं. हम आहुति के साथ देवताओं व पितरों को नमस्कार करते हैं. आप हमारे लिए कल्याणकारी होने की कृपा कीजिए. (७) अस्कन्नमद्य देवेभ्य ऽ आज्य १८ संभ्रियासमङ्घ्रिणा विष्णो मा त्वावक्रमिषं वसुमतीमग्ने ते च्छायामुपस्थेषं विष्णोः स्थानमसीत ऽ इन्द्रो वीर्यमकृणोदूर्ध्वोध्वर ऽ आस्थात्.. (८) हे अग्नि! हम देवताओं को अर्पित करने के लिए पवित्र (शुद्ध) घी ले कर आए हैं. हे अग्नि! इंद्र ने अपने बल से यज्ञ की प्रतिष्ठा बढ़ाई. विष्णु ने अपने बल ४० - यजुर्वेद
पूर्वाध दूसरा अध्याय
पूर्वाध दूसरा अध्याय से यज्ञ को उन्नति दी. आप अन्नदाता हैं. आप यज्ञ स्थल पर विराजमान हैं. हम आप की छत्रच्छाया में रहना चाहते हैं. हम सदैव यज्ञस्थल की पवित्रता को बनाए रखेंगे.( ८ ) अग्ने वेर्होत्रं वेर्दूत्यमवतां त्वां द्यावापृथिवी अव त्वं द्यावापृथिवी स्विष्टकृद्देवेभ्य ऽ इन्द्र ऽ आज्येन हविषा भूत्स्वाहा सं ज्योतिषा ज्योतिः.. ( ९ ) हे अग्नि! आप यज्ञ की व्यवस्था और विधान को अच्छी तरह जानते हैं. आप देवताओं के दूत हैं. आप पृथ्वीलोक से स्वर्गलोक तक आहुति पहुंचाने की कृपा करते हैं. आप पृथ्वीलोक व स्वर्गलोक की रक्षा करने की कृपा कीजिए. इंद्र अन्य देवताओं सहित घी की हवि से तृप्त व ज्योति से ज्योति में एकाकार होने की कृपा करें. ( ९ ) मयीदमिन्द्र ऽ इन्द्रियं दधात्वस्मान् रायो मघवानः सचन्ताम्. अस्माक १७ सन्तवाशिषः सत्या नः सन्तवाशिष ऽ उपहूता पृथिवी मातोपमां पृथिवी माता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहा.. ( १० ) हे इंद्र! आप हमें इंद्रमय बनाने की कृपा कीजिए. आप हमारे लिए धन धारण करने, हमें धनवान बनाने, आशीर्वाद प्रदान करने व हमारी आशाएं फलीभूत करने की कृपा कीजिए. आप हमें आशीर्वाद दीजिए. पृथ्वी माता के समान है. हम ने पृथ्वी माता की उपासना की है. हम यज्ञ की अग्नि प्रज्वलित करते हैं. आप हमें अपने जैसा तेजोमय बनाएं. हम आप को लोकहित के लिए आहुति समर्पित करते हैं. ( १० ) उपहूतो द्यौष्पितोप मां द्यौष्पिता ह्वयतामग्निराग्नीध्रात्स्वाहा. देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेऽश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. प्रतिगृह्णाम्यग्नेष्ट्वास्येन प्राश्नामि.. ( ११ ) हे यजमानो! हम ने स्वर्गलोक के पिता को अपने समीप ( पास ) आमंत्रित किया है. हम ने उस के पिता की उपासना की है. हम अग्नि का आह्वान करते हैं. आहुति हमारा कल्याण करने की कृपा करे. सविता देव ने आहुति उपजाई है. अश्विनीकुमार अपनी भुजाओं से इस हवि को ग्रहण करते हैं. पूषा देव दोनों हाथों से यज्ञ के इस अन्न को ग्रहण करते हैं. सभी देव अग्नि के मुख से अन्न ग्रहण करने ( खाने ) की कृपा करें. ( ११ ) एतन्ते देव सवितर्यज्ञं प्राहुर्बृहस्पतये ब्रह्मणे. तेन यज्ञमव तेन यज्ञपतिं तेन मामव.. (१२) हे सविता! हम आप के लिए इस विशाल यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं. आप यज्ञपति हैं. आप इस यज्ञ की व हमारी रक्षा करने की कृपा करें. ( १२ ) यजुर्वेद - ४१