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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

छठा अध्याय

छठा अध्याय देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे नार्यसी दमह ६ह रक्षसां ग्रीवा ऽ अपि कृन्तामि. यवोसि यवयास्मद् द्वेषो यवयारातीर्दिवे त्वान्तरिक्षाय त्वा पृथिव्यै त्वा शुन्धन्ताँल्लोकाः पितृषदनाः पितृषदनमसि.. ( १ ) हे यज्ञ साधनो! आप देवताओं के नायक हैं. हम आप को सविता द्वारा प्रेरित अश्विनीकुमारों की बांहों से ग्रहण करते हैं. हम आप को पूषा देव के हाथों से ग्रहण करते हैं, जो आर्य नहीं हैं. ( आप आइए ) आप उन राक्षसों की गरदनों पर प्रहार कीजिए. आप हमारे मित्र हैं. आप हमारे द्वेषियों को हम से दूर करने की कृपा कीजिए. हम स्वर्गलोक, अंतरिक्ष व पृथ्वी के लिए आप को पवित्र करते हैं. आप हमारे लिए पिता की तरह हैं. आप का घर हमारे लिए पिता के घर की तरह है. ( १ ) अग्रेणीरसि स्वावेश ऽ उन्नेत्तृणामेतस्य वित्तादधि त्वा स्थास्यति देवस्त्वा सविता मध्वानक्तु सुपिप्पलाभ्यस्त्वौषधीभ्यः. द्यामग्रेणास्पृक्ष ऽ आन्तरिक्षं मध्येनाप्राः पृथिवीमुपरेणादृ ६ह हीः... ( २ ) हे यज्ञ साधनो! आप अग्रणी हैं. आप अपनी जिम्मेदारी मान कर सब को उन्नति की ओर अग्रसर कीजिए. सविता देव जगत् के स्वामी हैं. वे आप को सुफल ओषधियों से भूषित करने की कृपा करें. आप स्वर्गलोक की ऊंचाइयों को छुएं. श्रेष्ठ विचारों से अंतरिक्षलोक को पूर्ण कर दीजिए. आप श्रेष्ठ कर्मों से पृथ्वी को ओतप्रोत करने की कृपा कीजिए. ( २ ) या ते धामान्युश्मसि गमध्यै यत्र गावो भूरिश्रृङ्गा ऽ अयासः. अत्राह तदुरुगायस्य विष्णोः परमं पदमव भारि भूरि. ब्रह्मवनि त्वा क्षत्रवनि रायस्पोषवनि पर्यूहामि. ब्रह्म दृ ६ह ह क्षत्रं दृ ६ह ह्यायुर्दृ ६ह ह प्रजां दृ ६ह ह.. ( ३ ) विष्णु का जो धाम है, वह सूर्य की किरणों से प्रकाशित है. वह धाम सर्वव्यापक है. हम विष्णु के उस श्रेष्ठ धाम को पाने की इच्छा रखते हैं. आप ७४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध छठा अध्याय ब्राह्मणों व क्षत्रियों आदि को यथायोग्य धन और पोषण देते हैं. आप ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों को धन व संतान दीजिए. ( ३ ) विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (४) हे यजमानो! हम विष्णु से जुड़ें. हम उन के मित्र हो जाएं. उन के कामों को देखें. हम उन के व्रतों का पालन करें. ( ४ ) तद्विष्णोः परमं पद १४ सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (५) शूरवीर सदैव विष्णु का परम पद स्वर्गलोक में छाए हुए प्रकाश के समान देखते हैं. ( ५ ) परिवीरसि परि त्वा दैवीर्विशो व्ययन्तां परीमं यजमान १४ रायो मनुष्याणाम्. दिवः सूनुरस्येष ते पृथिव्याँल्लोक ऽ आरण्यस्ते पशुः.. (६) हे यज्ञ देव! आप सर्वव्यापक हैं. यजमान आप को कणकण में देखते हैं. आप दिन के पुत्र की तरह व्याप्त हैं. पृथ्वीलोक, वन प्रदेश, व पशु भी आप का ही विस्तार है. आप मनुष्यों को धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. ( ६ ) उपावीरस्युप देवान्दैवीर्विशः प्रागुरुशिजो वह्नितमान्. देव त्वष्टर्वसु रम हव्या ते स्वदन्ताम्.. (७) हे त्वष्टा देव! आप सर्जक हैं. आप समीप आए हुए की रक्षा करते हैं. आप की कृपा से प्रजा श्रेष्ठ गुणों से संपन्न हो जाए. आप दिव्य गुण संपन्न, तेजस्वी व समर्थ हैं. ये सभी गुण आप की कृपा से विद्वानों को प्राप्त हों. हम आप को रमणीय हवि प्रदान कर रहे हैं. आप उस का आस्वादन करने की कृपा कीजिए. ( ७ ) रेवती रमध्वं बृहस्पते धारया वसूनि. ऋतस्य त्वा देवहविः पाशेन प्रतिमुञ्चामि धर्षा मानुषः.. (८) यज्ञ के आचार्यों ने उत्तम कोटि की हवि के लिए विशाल धाराओं के रूप में धन देने वाले जिन पशुओं को बांधा, उन पशुओं को अब हम मुक्त करते हैं. वे पशु हमें और हमारे यज्ञ के लिए दूध आदि के रूप में धन धारण करते रहें. हम समर्थ बनें. ( ८ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. अग्नीषोमाभ्यां जुष्टं नियुनज्मि. अद्भ्यस्त्वौषधीभ्योनु त्वा माता मन्यतामनु पितानु भ्राता सगर्भ्योनु सखा सयूथ्यः. अग्नीषोमाभ्यां त्वा जुष्टं प्रोक्षामि.. (९) सविता देव की कृपा से हम अश्विनीकुमारों व पूषा देव को दोनों बाहुओं से यजुर्वेद - ७५

पूर्वार्ध छठा अध्याय ग्रहण करते हैं. अग्नि व सोम देव की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. ओषधियां और जल शुद्धता का अनुकरण करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) माता अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) पिता अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) भाई अनुमति प्रदान करें. ( यज्ञ कार्य हेतु ) मित्र अनुमति प्रदान करें. हम अग्नि की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. हम सोम की संतुष्टि के लिए यज्ञ करते हैं. ( ९ ) अपां पेरुरस्यापो देवीः स्वदन्तु स्वात्तं चित्सद्देवहविः. सन्ते प्राणो वातेन गच्छता १४ समङ्गानि यजत्रैः सं यज्ञपतिराशिषा.. (१०) हे यज्ञ से जुड़े पशु देव! आप जल के रक्षक व दिव्य गुणों वाले हैं. आप सदैव हविमय रहने की कृपा करें. देव कृपा से यज्ञपति को आशीर्वाद मिले. हमारे प्राण वायु से भरे रहें. हम यज्ञीय अनुशासन का पालन करें. ( १० ) घृतेनाक्तौ पशूँस्त्रायेथा १४ रेवति यजमाने प्रियं धा ऽ आ विश. उरोरन्तरिक्षात्सजूर्देवेन वातेनास्य हविषस्तमना यज समस्य तन्वा भव. वर्षो वर्षीयांसि यज्ञे यज्ञपतिं धाः स्वाहा देवेभ्यो देवेभ्यः स्वाहा.. (११) हे यज्ञ देव! आप घी आदि ( हवि हेतु उपयोगी ) देने वाले पशुओं की रक्षा करने की कृपा करें. यजमान के लिए ये पशु प्रिय हों. उन के प्रिय धाम में वास करें. ये पशु यजमान के अनुकूल हों. यजमान की रक्षा करने की कृपा कीजिए. इस यज्ञ में हवि से उस का विस्तार करने की कृपा करें. यज्ञपति बरसों तक जीएं. वे कल्याण करें. देवताओं के लिए स्वाहा. ( ११ ) माहिर्भूर्मा पृदाकुर्नमस्त ऽ आतानान्वर्वा प्रेहि. घृतस्य कुल्या ऽ उप ऋतस्य पथ्या ऽ अनु.. (१२) हे यज्ञ देव! आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति हिंसक मत होना. आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति निर्दय मत होना. आप महान् हैं. आप यजमानों के प्रति क्रोधित मत होना. आप की कृपा से घी जल की भांति बहे. हम सत्य के पथ का अनुसरण करें. ( १२ ) देवीरापः शुद्धा वोढ्व १४ सुपरिविष्टा देवेषु सुपरिविष्टा वयं परिवेष्टारो भूयास्म.. (१३) हे देवियो! आप शुद्ध हैं. आप प्राकृतिक रूप से शुद्ध हैं. आप देवताओं के लिए हवि वहन करने की कृपा करें. हवि उत्तम पात्र में है. आप उसे ग्रहण करने की कृपा कीजिए. इन की कृपा से हम भी कार्य करने वाले हों. ( १३ ) वाचं ते शुन्धामि प्राणं ते शुन्धामि चक्षुस्ते शुन्धामि श्रोत्रं ते शुन्धामि नाभिं ते शुन्धामि मेढ्रं ते शुन्धामि पायुं ते शुन्धामि चरित्राँस्ते शुन्धामि.. (१४) हे याजक! हम यजमान आप की वाणी को शुद्ध करते हैं. यजमान आप के ७६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध छठा अध्याय

पूर्वार्ध छठा अध्याय प्राण को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के नेत्रों को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के कानों को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की नाभि को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की जननेंद्रिय को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप की गुदा को शुद्ध करते हैं. हम यजमान आप के चरित्र को शुद्ध करते हैं. (१४) मनस्त ऽ आप्यायतां वाक्त ऽ आप्यायतां प्राणस्त ऽ आप्यायतां चक्षुस्त ऽ आप्यायता १४ श्रोत्रं त ऽ आप्यायताम्. यत्ते क्रूरं यदास्थितं तत्त ऽ आप्यायतां निष्प्यायतां तत्ते शुध्यतु शमहोभ्यः. ओषधे त्रायस्व स्वधिते मैन १४ हि १४ सी:... (१५) हे याजक! आप का मन प्रसन्न हो. आप की वाणी प्रसन्न हो. आप के प्राण प्रसन्न हों. आप के नेत्र प्रसन्न हों. आप के कान प्रसन्न हों. हे यजमान! आप की क्रूरता समाप्त हो. आप का स्वभाव स्थिर हो. हे याजक! आप का स्वभाव दृढ़ हो. आप का आचरण शुद्ध हो, हमें भी शुद्ध करे. ओषधियां रक्षा करें. आप इन्हें नष्ट होने से बचाइए. (१५) रक्षासां भागोसि निरस्त १४ रक्ष ऽ इदमह १४ रक्षोभि तिष्ठामीदमह १४ रक्षोव बाध इदमह १४ रक्षोधमं तमो नयामि. घृतेन द्यावापृथिवी प्रोर्णुवाथां वायो वे स्तोकानाम्नग्निरराज्यस्य वेतु स्वाहा स्वाहाकृते ऊर्ध्वनभसं मारुतं गच्छतम्.. (१६) यज्ञ में त्यागा हुआ तिनका राक्षसों का भाग है. इसलिए हे परित्यक्त तृण! हम आप को दूर करते हैं. आप राक्षसी वृत्ति (स्वभाव) वाले हैं. आप पतन के गड्ढे में ही बैठे रहिए. आप बाधक व अधम हैं. हम आप को अंधकार में ले जाते हैं. यजमान द्वारा दी गई हवि से स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक परिपूर्ण हों. यजमान द्वारा दी गई हवि अग्निग्रहण करने की कृपा करें. अग्नि के लिए स्वाहा. नभ देव के लिए स्वाहा. वह हवि ऊंचे नभलोक तक पहुंचे. हवा के रूप में पूरे आकाशलोक में चली जाए. (१६) इदमपः प्र वहतावद्यं च मलं च यत्. यच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपे अभीरुणम्. आपो मा तस्मादेनसः पवमानश्च मुञ्चतु.. (१७) हे जल देव! आप जिस तरह हमारे मल आदि को दूर करते हैं, उसी तरह यजमान के ईर्ष्या, झूठ, दोष आदि को दूर करें. जल तथा वायु हम को इन पापों से मुक्त करें. जल हम को पवित्र बनाने की कृपा करे. (१७) सन्ते मनो मनसा सं प्राणः प्राणेन गच्छताम्. रेडस्यग्निष्ट्वा श्रीणात्वापस्त्वा समरिणन्वातस्य त्वा ध्राज्यै पूष्णो र १४ ह्मा ऊष्मणो व्यथिषत् प्रयुतं द्वेषः... (१८) यजुर्वेद - ७७

पूर्वार्ध छठा अध्याय याजक उन यजमानों के मन से युक्त हो. वह उन यजमानों के मन प्राण से युक्त हो. वह उन यजमानों के दिव्य प्राण से युक्त हो. अग्नि व जल देव आप को शोभा युक्त बनाने की कृपा करें. वायु देव की गति एवं सूर्य की ऊर्जा परिपक्व हो. सब के विकार व द्वेष नष्ट हों. ( १८ ) घृतं घृतपावानः पिबत वसां वसापावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा. दिशः प्रदिश ऽ आदिशो विदिश ऽ उद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहाः.. (१९) घी पीने वाले घी पीएं. वसा पीने वाले वसा पीएं. घी और वसा अंतरिक्ष के लिए हवि हों. घी और वसा दोनों के लिए स्वाहा. दिशा के लिए स्वाहा. प्रदिशा के लिए स्वाहा. शत्रु के लिए स्वाहा. अमर के लिए स्वाहा. सब के लिए स्वाहा. ( १९ ) ऐन्द्रः प्राणो अङ्गे अङ्गे निदीध्यदैन्द्र ऽ उदानो अङ्गे अङ्गे निधीतः. देव त्वष्टर्भूरि ते स ᳪ समेतु सलक्ष्मा यद्विषुरूपं भवाति. देवत्रा यन्तमवसे सखायोनु त्वा माता पितरो मदन्तु.. (२०) अंगअंग, प्राणप्राण व उदान में इंद्र विराजमान हैं. त्वष्टा इन सब की सुरक्षा करने की कृपा करें. इंद्र की शक्ति इन सब की सुरक्षा करने की कृपा करे. देव की शक्ति इन सब की रक्षा करने की कृपा करें. देव हमारे सखाओं का कल्याण करने की कृपा करें. देव हमारे मातापिता को आनंदित करने की कृपा करें. ( २० ) समुद्रं गच्छ स्वाहान्तरिक्षं गच्छ स्वाहा देव ᳪ सवितारं गच्छ स्वाहा मित्रावरुणौ गच्छ स्वाहाहोरात्रे गच्छ स्वाहा छन्दा ᳪ सि गच्छ स्वाहा द्यावापृथिवी गच्छ स्वाहा यज्ञं गच्छ स्वाहा सोमं गच्छ स्वाहा दिव्यं नभो गच्छ स्वाहाग्निं वैश्वानरं गच्छ स्वाहा मनो मे हार्दि यच्छ दिवं ते धूमो गच्छतु स्वर्ज्योतिः पृथिवीं भस्मनापृण स्वाहा.. (२१) यजमान द्वारा दी गई हवि समुद्र तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि अंतरिक्ष तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि सविता देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि मित्र देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि वरुण देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि दिन देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि रात्रि देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि छंद तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि स्वर्गलोक तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि पृथ्वी लोक तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि यज्ञ देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि सोम तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि नभ देव तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि अग्नि तक जाए, कल्याणकारी हो. यजमान द्वारा दी गई हवि वैश्वानर तक जाए, कल्याणकारी हो. देवगण हमारे मन को हार्दिक दिव्यता प्रदान करें. अग्नि का धुआं सर्वत्र जाए. अग्नि की ज्योति और भस्म पृथ्वीलोक को ७८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध छठा अध्याय पूर्ण करें. अग्नि की ज्योति और भस्म अंतरिक्षलोक को परिपूर्ण करें. इन अग्नि के लिए स्वाहा. (२१) मा ऽ पो मौषधीर्हि ᳵषी र्धाम्नो धाम्नो राजँस्ततो वरुण नो मुञ्च. यदाहुरघ्न्या ऽ इति वरुणेति शपामहे ततो वरुण नो मुञ्च. सुमित्रिया न ऽ आप ऽ ओषधयः सन्तु दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तु यो ऽ स्मान् द्वेष्टि यं च वयं द्विष्मः.. (२२) यज्ञ में स्थित जल व ओषधि को अपनी जगह से मत हटाइए. यज्ञ में स्थित आप ओषधि को अपने स्थान पर रहने दीजिए. इन दोनों को वहीं सुशोभित होने दीजिए. वरुण देव हमें न छोड़ें. जो न मारने योग्य हैं, हम उन का वध न करें. हम वरुण देव की कृपा से शाप और पाप से मुक्त रहें. वे हमें न छोड़ें. जल और ओषधियां हमारी अच्छी मित्र हों. जिन से हम द्वेष रखते हैं, उन का नाश हो. जो हम से द्वेष रखते हैं, उन का नाश हो. (२२) हविष्मतीरिमा ऽ आपोहविष्माँ २ आ विवासति. हविष्मान् देवो अध्वरो हविष्माँ २ अस्तु सूर्यः.. (२३) जल वाली नदियां हविष्मती हों. जल हविष्मान हो. देव हविष्मान हों. यज्ञ हविष्मान हो. सूर्य हविष्मान हो. (२३) अग्नेर्वोपन्नगृहस्य सदसि सादयामीन्द्राग्न्योर्भागधेयी स्थ मित्रावरुणयोर्भागधेयी स्थ विश्वेषां देवानां भागधेयी स्थ. अमूर्या ऽ उप सूर्ये याभिर्वा सूर्यः सह. ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्.. (२४) अग्नि देवताओं तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे इंद्र देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे मित्र देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे वरुण देव तक हवि भाग पहुंचाते हैं. वे सभी देवों तक हवि भाग पहुंचाते हैं. भाप बना कर जो जल सूर्य ऊपर बहुत समय तक साथ रखते हैं, उस जल से हमारे यज्ञ को सफल बनाने की कृपा करें. (२४) हृदे त्वा मनसे त्वा दिवे त्वा सूर्याय त्वा. ऊर्ध्वमिममध्वरं दिवि देवेषु होत्रा यच्छ.. (२५) हे देवगण! आप हृदय, मन, स्वर्ग और सूर्य में हैं. आप यज्ञ को ऊंचा उठाएं. यजमान को दिव्यता दें. यजमान को स्वर्ग दें.(२५) सोम राजन् विश्वास्त्वं प्रजा ऽ उपावरोह विश्वास्तवां प्रजा ऽ उपावरोहन्तु. शृणोत्वग्निः समिधा हवं मे शृण्वन्त्वापो धिषणाश्च देवीः. श्रोता ग्रावाणो विदुषो न यज्ञ ᳵँ शृणोतु देवः सविता हवं मे स्वाहा.. (२६) हे सोम! आप सब के राजा हैं. आप प्रजा पर अनुग्रह करने की कृपा करें. अग्नि यजुर्वेद - ७९

पूर्वार्ध छठा अध्याय समिधा से प्रज्वलित हैं. अग्नि हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए हवि समर्पित करते हैं. जल देव हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए हवि समर्पित करते हैं. बुद्धि की देवी हमारी स्तुतियां सुनने की कृपा करें. हम उन के लिए हवि समर्पित करते हैं. विद्वान् यज्ञ में स्तुतियां पढ़ते हैं. सविता देव उन्हें सुनने की कृपा करें. उन के लिए यह आहुति समर्पित हैं. ( २६ ) देवीरापो अपां नपाद्यो व ऽ ऊर्मिर्हविष्य ऽ इन्द्रियावान् मदिन्तमः. तं देवेभ्यो देवत्रा दत्त शुक्रपेभ्यो येषां भाग स्थ स्वाहा.. (२७) दिव्य जल! आप के लहरदार प्रवाह इंद्रियों की शक्ति बढ़ाने वाले हैं. आप के लहरदार प्रवाह आनंददायी हैं. उस जल को देवों व रक्षक के लिए समर्पित कीजिए. उसे वीर्य बढ़ाने के लिए समर्पित कीजिए. इस में आप का भी एक भाग है. इन सब के लिए स्वाहा. ( २७ ) कार्षिरसि समुद्रस्य त्वा क्षित्या ऽ उन्नयामि. समापो अद्भिर्गमत समोषधीभिरोषधीः.. ( २८) समुद्र तक पृथ्वी की उर्वरता के लिए आप को ऊपर की ओर उठाते हैं. इस जल के साथ जलों को मिला कर ओषधियां उत्पन्न होती हैं. ओषधियों को भी ओषधि के साथ मिलाया जाता है. ( २८ ) यमग्ने पृत्सु मर्त्यमवा वाजेषु यं जुनाः. स यन्ता शश्वतीरिषः स्वाहा.. (२९) हे अग्नि! आप जिन यजमानों के पास से देवताओं तक हवि पहुंचाते हैं, वे लोग आप की कृपा से यज्ञ करते हैं. वे यजमान शाश्वत (स्थायी) और इष्ट धन को प्राप्त करते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. ( २९ ) देवस्य त्वा सवितुः प्रसवेश्विनोर्बाहुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम्. आ ददे रावासि गभीरमिममध्वरं कृधीन्द्राय सुषूतमम्. उत्तमेन पविनोर्जस्वन्तं मधुमन्तं पयस्वन्तं निग्राभ्या स्थ देवश्रुतस्तर्पयत मा मनो मे.. (३०) हम यजमान सूर्योदय के समय यज्ञ के साधन को अश्विनीकुमारों के हाथों में ग्रहण कराते हैं. अग्नि के लिए स्वाहा. पूषा देव के लिए स्वाहा. आप इच्छापूरक हैं. हम इंद्र देव के लिए यज्ञ करना चाहते हैं. हम उन के लिए यज्ञ को ऊर्जस्वी पदार्थों से पवित्र करते हैं. हम उन के लिए यज्ञ को रसीले और पवित्र पदार्थों से पवित्र करते हैं. वे हवि को भलीभांति ग्रहण करने की कृपा करें. आप हमें तृप्ति प्रदान करने की कृपा करें. ( ३० ) मनो मे तर्पयत वाचं मे तर्पयत प्राणं मे तर्पयत चक्षुर्मे तर्पयत श्रोत्रं मे तर्पयतात्मानं मे तर्पयत प्रजां मे तर्पयत पशून्मे तर्पयत गणान्मे तर्पयत गणा मे मा वितृषन्.. (३१) ८० - यजुर्वेद 632/5

पूर्वार्ध छठा अध्याय

पूर्वार्ध छठा अध्याय हे जल समूह! आप हमारे मन, वचन, प्राण को तृप्त कीजिए. आप हमारे नेत्रों व कानों को तृप्त कीजिए. आप हमारी आत्मा, प्रजा को तृप्त कीजिए. आप हमारे पशुओं व हमारे सेवकों को तृप्त कीजिए. हम आप के बिना कभी भी प्यासे न हों. ( ३१ ) इन्द्राय त्वा वसुमते रुद्रवत ऽ इन्द्राय त्वादित्यवत ऽ इन्द्राय त्वाभिमातिघ्ने. श्येनाय त्वा सोमभृतेग्नये त्वा रायस्पोषदे.. ( ३२) हे सोम! हम इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम वसुमान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम रुद्र समान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम आदित्य के समान के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हम शत्रुनाशक के लिए आप को ग्रहण करते हैं. हे सोम! हम आप को पीने के लिए बाज की तरह झपटने वाले इंद्र देव के लिए ग्रहण करते हैं.हम भरणपोषण कर्ता के लिए बाज की तरह ग्रहण करते हैं. हम धनदाता, पोषणदाता अग्नि के लिए ग्रहण करते हैं. ( ३२ ) यत्ते सोम दिवि ज्योतिर्यत्पृथिव्यां यदुरावन्तरिक्षे. तेनास्मै यजमानायोरु राये कृध्यधि दात्रे वोचः.. ( ३३) हे सोम! आप स्वर्गलोक व अंतरिक्षलोक तक फैले हुए हैं. आप दिव्य व प्रकाशमान हैं. आप यजमान के लिए धन धारिए, धन दीजिए, आप यजमान की सहायता कीजिए. ( ३३ ) श्वात्रा स्थ वृत्रतुरो राधोगूर्ता ऽ अमृतस्य पत्नीः. ता देवीर्देवत्रेमं यज्ञं नयतोपहूताः सोमस्य पिबत.. ( ३४) देवियां (सोम रूपी) अमृत की पत्नी हैं वे कल्याणकारी वृत्र नाशक व धनदायक हैं. आप इस यज्ञ की रक्षा करें. आप इस यज्ञ का मार्ग निर्देशन करें. आप इस यज्ञ में सोमरस का पान करने की कृपा करें. ( ३४ ) मा भेर्मा सं विक्था ऽ ऊर्जं धत्स्व धिषणे वीड्वी सती वीडयेथामूर्जं दधाथाम्. पाप्मा हतो न सोमः.. ( ३५) हे सोम! आप का रस निकालते समय आप को पत्थरों से कूटा जाता है. आप उस से भयभीत मत होइए. आप चंद्रमा जैसे शीतल और समर्थ हैं. आप सब के पाप और कपट दूर करने की कृपा कीजिए. ( ३५ ) प्रागपागुदगधराक्सर्वतस्त्वा दिश ऽ आधावन्तु. अम्ब निष्पर समरीर्विदाम्.. (३६) हे सोम! आप पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण दिशा में अपने भाग को ग्रहण कर के दौड़ते हुए यज्ञ में आइए. आप इस तरह यज्ञ को भलीभांति जानने की कृपा कीजिए. ( ३६ ) यजुर्वेद - ८१

पूर्वार्ध छठा अध्याय त्वमङ्ग प्रशं १४ सिषो देवः शविष्ठ मर्त्यम्. न त्वदन्यो मघवन्नस्ति मर्डितेन्द्र ब्रवीमि ते वचः.. (३७) हे इंद्र! आप प्रशंसित, शक्तिमान, दिव्य हैं व सुखदायी हैं. आप जैसा धनदायी कोई और देव नहीं है. हम आप के कृपा वचनों के आधार पर ही ऐसा कहते हैं. ( ३७ ) ८२ - यजुर्वेद

सातवां अध्याय

सातवां अध्याय वाचस्पतये पवस्व वृष्णो ऽ अ १४ꣳ शुभ्यां गभस्तिपूतः. देवो देवेभ्यः पवस्व येषां भागोसि.. (१) हे सोम! आप वाचस्पति के लिए पवित्र होइए. आप शक्तिशाली, शुभ एवं गर्भ से ही पवित्र हैं. आप जिन देवताओं का भाग हैं, उन के लिए प्रवाहित होइए. (१) मधुमतीर्न ऽ इषस्कृधि यत्ते सोमादाभ्यं नाम जागृवि तस्मै ते सोम सोमाय स्वाहा स्वाहोर्वन्तरिक्षमन्वेमि.. (२) हे सोम! आप मधुर धाराओं वाले हैं. आप हमारा इष्ट कीजिए. आप हमें जाग्रत कीजिए. जाग्रत सोम के लिए स्वाहा. सोम से सोम के लिए स्वाहा. यह आहुति अंतरिक्ष में विस्तार पाने की कृपा करे. (२) स्वाङ्कृतोसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्यो देवा १४ꣳशो यस्मै त्वेडे तत्सत्यमुपरिप्लुता भङ्गेन हतो ऽ सौ फट् प्राणाय त्वा व्यानाय त्वा.. (३) आप स्वयंभू हैं. आप सभी देवों के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप इंद्रियों के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप स्वर्गलोक के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप पृथ्वी के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. पवित्र मन वाले आप के लिए स्वाहा. अच्छी तरह उत्पन्न होने वाले सूर्य के लिए स्वाहा. मरीचि देवों के लिए स्वाहा. मर्यादा भंग करने वालों का नाश कीजिए. आप सत्य से ओतप्रोत हैं. हम प्राण और व्यान से आप की उपासना करते हैं. (३) उपयामगृहीतोस्यन्तर्यच्छमघवन् पाहि सोमम्. उरुष्य राय ऽ एषो यजस्व.. (४) हे इंद्र! सोम को कलश में ग्रहण कर लिया है. आप इस की रक्षा कीजिए. आप यजमानों को भरपूर वैभव दीजिए एवं उन की शत्रुओं से रक्षा कीजिए. (४) अन्तस्ते द्यावापृथिवी दधाम्यन्तर्दधाम्युर्वन्तरिक्षम्. सजूर्देवैर्भवैरैः परैश्चान्तर्यामे मघवन् मादयस्व.. (५) हे इंद्र देव! स्वर्गलोक में, पृथ्वीलोक पर एवं अंतरिक्षलोक में आप का ही यजुर्वेद - ८३

पूर्वार्ध सातवां अध्याय

पूर्वार्ध सातवां अध्याय विस्तार है. अंतरिक्षलोक में आप देवताओं सहित अन्यों को ( मनुष्यों को ) मदमस्त बनाने की कृपा कीजिए. ( ५ ) स्वाङ्कृतोसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्य ऽ उदानाय त्वा.. ( ६ ) हे श्रेष्ठ जन्म वाले! आप सभी के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप इंद्रियों के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप देवताओं और मनुष्यों के मन के संतोष के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप को सूर्य के लिए ( कलश में ) ग्रहण किया जाता है. आप को मरीचि के लिए ( कलश में ) ग्रहण किया जाता है. आप को उदान ( देवता ) के लिए ( उपयाम में ) ग्रहण किया जाता है. ( ६ ) आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार. उपो ते अन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा.. (७) हे वायु! आप पवित्रता के रक्षक हैं. आप हजारों गुणों के आधार हैं. हम सोमरस से आप को आनंदित बनाते हैं. आप इस पेय को पहले भी पी चुके हैं. हम वायु के लिए इस पेय को धारण करते हैं. ( ७ ) इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम्. इन्दवो वामुशन्ति हि. उपयामगृहीतोसि वायव ऽ इन्द्रवायुभ्यां त्वैष ते योनिः सजोषोभ्यां त्वा.. (८) हे इंद्र देव! हे वायु! आप दोनों के प्रयोग में लाने के लिए यह सोमरस आया है ( लाया गया है ). आप इस का सेवन कीजिए. हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. आप को वायु के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. हम उन्हीं दोनों की प्रसन्नता के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ८ ) अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा. ममेदिह श्रुत १४ हवम्. उपयामगृहीतो ऽ सि मित्रावरुणाभ्यां त्वा.. (९) हे मित्र देव! हे वरुण देव! आप सत्य की वृद्धि करते हैं. हम आप के पुत्र आप दोनों के लिए इस सोमरस कलश में ग्रहण करते हैं. आप सोमरस का सेवन करने की कृपा कीजिए. ( ९ ) राया वय १४ ससवा १४ सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः. तां धेनुं मित्रावरुणा युवँ नो विश्वाहा धत्तममपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां त्वा.. (१०) ८४ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सातवां अध्याय हे मित्र देव! हे वरुण देव! आप हमें ऐसा धन दीजिए जो वापस हम से न जाए. उस धन को पा कर हम आनंदित हों. हमें ऐसी गाएं प्रदान कीजिए, जो हमें छोड़ कर कहीं नहीं जाएं. आप की इस कृपा से हम वैसे ही प्रसन्न होंगे, जैसे देवगण हवि पा कर प्रसन्न होते हैं, गाय आहार पा कर प्रसन्न होती है. ऋत (सत्य) व यज्ञ की आयु की बढ़ोतरी के लिए आप दोनों यज्ञशाला में अपने लिए निश्चित आसन पर विराजिए. (१०) या वां कशा मधुमत्यश्विना सूनृतावति. तया यज्ञं मिमिक्षतम्. उपयामगृहीतोस्यश्विभ्यां त्वैष ते योनिर्माध्वीभ्यां त्वा.. (११) हे अश्विनी देवो! आप मधुर वाणी से हमारे यज्ञ को सींचने की कृपा कीजिए. मधुर वाणी से हम ने भी यज्ञ को सींचा है. हम ने आप दोनों के लिए हवि को कलश में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. यज्ञ में आप अपने निर्धारित आसन पर विराजने की कृपा कीजिए. (११) तं प्रत्नथा पूर्वथा विश्वथेमथा ज्येष्ठतातिं बर्हिषद छं स्वर्विदम्. प्रतीचीनं वृजनं दोहसे धुनिमाशुं जयन्तमनु यासु वर्धसे. उपयामगृहीतोसि षण्डाय त्वैष ते योनिर्वीरतां पाह्यपमृष्टः षण्डो देवास्त्वा शुक्रपाः प्रणयन्त्वनाधृष्टासि.. (१२) इंद्र देव बारबार सोमरस को पीते हैं. सोमरस पोषक व आनंददायी है. इंद्र देव आत्मज्ञाता, ज्येष्ठ, कुश के आसन पर विराजते हैं. वे यजमानों के लिए धन का दोहन करते हैं और यजमानों के लिए धन की बढ़ोतरी करते हैं. वे वीर्यरक्षक हैं. उन के लिए सोमरस को कलश में ग्रहण किया गया है. वही उस की मूल योनि है. वे हमें दुष्टों से दूर करें तथा अपने लिए निर्धारित आसन पर विराजने की कृपा करें. (१२) सुवीरो वीरान् प्रजनयन् परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्. सज्जमानो दिवा पृथिव्या शुक्रः शुक्रशोचिषा निरस्तः षण्डः शुक्रस्याधिष्ठानमसि.. (१३) आप सुवीर हैं. आप वीरों को पैदा कीजिए. आप यजमान को धन से पोषित कीजिए. आप स्वर्गलोक व पृथ्वीलोक को चमकाने वाले हैं. आप सर्वत्र प्रकाश से चमकाइए. आप प्रकाश के निवास स्थान हैं. आप उजड्डपन को नष्ट करने वाले हैं. (१३) अच्छिन्नस्य ते देव सोम सुवीर्यस्य रायस्पोषस्य ददितारः स्याम. सा प्रथमा संस्कृतिर्विश्ववारा स प्रथमो वरुणो मित्रो अग्निः.. (१४) हे सोम! आप अनंत शक्तिमान, श्रेष्ठ वीर्यवान व धन के पोषक हैं. हम आप यजुर्वेद - ८५

पूर्वार्ध सातवां अध्याय के लिए सदा हवि देने वाले हैं. विश्व पर वारने योग्य यह हमारी आद्य (पहली) संस्कृति हैं. वरुण, मित्र व अग्नि प्रथम देव हैं. (१४) स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमा जुहोत स्वाहा. तृम्पन्तु होत्रा मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहायाऽग्नीत्.. (१५) बृहस्पति देव प्रथम देवता हैं. ज्ञाता लोग इंद्र देव के लिए यज्ञ करें. स्वाहापूर्वक उन के लिए हवि प्रदान करने की कृपा करें. यजमान होता मधुर आहुति से उन्हें तृप्त करने की कृपा करें. होता सुप्रीतिकर आहुति से उन्हें तृप्त करें. यजमान उन के लिए अच्छी तरह आहुति अग्नि के पास पहुंचाने की कृपा करें. (१५) अयं वेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने. इममपा १४ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति. उपयामगृहीतोसि मर्काय त्वा.. (१६) ये वेन देव बादलों के गर्भ में स्थित जल को बरसने के लिए प्रेरित करते हैं. चिरायु ज्योति वाले सूर्य का वंदन करते हैं. जल को पा कर यजमान ऐसे प्रसन्न होते हैं, जैसे लोग पुत्र को पा कर प्रसन्न होते हैं. विद्वान् बुद्धिपूर्वक सूर्य की उपासना करते हैं. आप को मर्क (राक्षस-विनाश) के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. (१६) मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता. आ यः शर्याभिस्तुविनृम्णो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तावेष ते योनिः प्रजाः पाह्यपमृष्टो मर्को देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्वनाधृष्टासि.. (१७) यजमान हवनों में मन से भाग लेते हैं. द्रवित होने वाले सोमरस का मन से पान करते हैं. हम सोम से अनुरोध करते हैं कि हम संतानसहित शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ हो सकें. हम मथानी की तरह उन्हें मथ दें. हम निर्भय हो कर देवत्व प्राप्त करें. देवगण हमें संरक्षण प्रदान करने की कृपा करें. (१७) सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन् परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्. सञ्ग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा निरस्तो मर्को मन्थिनोधिष्ठानमसि.. (१८) हे देवगण! यजमान की संतान श्रेष्ठ हो. आप यजमान को श्रेष्ठ धन से पोसने की कृपा कीजिए. जैसे सूर्य स्वर्गलोक से पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं. वैसे ही देवगण हमारे जीवन को प्रकाशित करने की कृपा करें. इन की कृपा से हम शत्रुओं को मथानी से मथने की तरह मथ दें. मर्क नामक असुर दुःख का घर है. आप की कृपा से (तेज से) वह भी पलायन कर जाए. (१८) ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ. अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्.. (१९) ८६ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सातवां अध्याय पृथ्वी और आकाश के बीच जो ग्यारह दिव्य देव स्थित हैं, वे सभी देव महिमावान हैं. वे ग्यारह ही देव इस यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराने की कृपा करें. (१९) उपयामगृहीतोस्याग्रयणोसि स्वाग्रयणः. पाहिह्यज्ञं पाहि यज्ञपतिं विष्णुस्त्वामिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाह्यभि सवनानि पाहि.. (२०) हे देवगण! आप के लिए सोमरस को कलश में ग्रहण किया गया है. आप यज्ञ में सर्वप्रथम ग्रहण किए जाने वाले हैं. आप यज्ञ में सर्वप्रथम बुलाए जाने वाले हैं. आप यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप यज्ञपति को संरक्षण दीजिए. आप विष्णु की रक्षा कीजिए. उन की रक्षा करें. आप तीनों संध्याओं की रक्षा करने की कृपा कीजिए. (२०) सोमः पवते सोमः पवतेस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्रायास्मै सुन्वते यजमानाय पवत ऽ इष ऽ ऊर्जे पवतेद्भ्य ऽ ओषधीभ्यः पवते द्यावापृथिवीभ्यां पवते सुभूताय पवते विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (२१) सोमरस प्रवाहित होता है. पवित्र सोम इस में प्रवाहित होता है. ब्राह्मणों के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. क्षत्रियों के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. ऊर्जादायी के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. ओषध के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. अच्छे भरणपोषणकर्ता हेतु यह सोम प्रवाहित होता है. विश्व के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. यह विश्व के लिए मूल स्थान है. सभी देव यज्ञशाला में अपने लिए निर्धारित स्थान पर विराजें. (२१) उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वत ऽ उक्थाव्यं गृह्णामि. यत्त ऽ इन्द्र बृहद्वयस्तस्मै त्वा विष्णवे त्वैष ते योनिरुक्थेभ्यस्त्वा देवेभ्यस्त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि.. (२२) हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को बृहद् देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप उपयाम (कलश) हैं. हम उक्त मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. यह उपयाम इंद्र देव का मूल स्थान है. यह उपयाम ब्रह्म देव व विष्णु का मूल स्थान है. हम यज्ञ में उक्त मंत्र से आप सब देवों की उपासना करते हैं. हम यज्ञ में श्रेष्ठ दीर्घ जीवन की कामना से आप को ग्रहण करते हैं. (२२) मित्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राय त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राग्निभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राबृहस्पतिभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राविष्णुभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि.. (२३) यजुर्वेद - ८७

पूर्वार्ध सातवां अध्याय हे सोम! मित्र और वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. दीर्घ आयु हेतु मित्र और वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण किया है. हम ने इंद्र देव और अग्नि के लिए आप को ग्रहण किया है. वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! बृहस्पति देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! विष्णु के लिए आप को ग्रहण किया गया है. ( २३ ) मूर्धानं दिवो ऽ अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽ आ जातमग्निम्. कवि १४ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नापात्रं जनयन्त देवा:.. ( २४) हे अग्नि! आप स्वर्गलोक के सर्वोच्च स्थान पर चमकते हैं. आप पृथ्वी पर सूर्य की भांति चमकते हैं. आप वैश्वानर ( आग ) व सर्वज्ञ हैं. यजमान लोगों ने अग्नि को अरणिमंथन ( लकड़ियों की रगड़ ) से प्रकट किया है. अग्नि देव हमारे अतिथि सम्राट् हैं. ( २४ ) उपयामगृहीतोसि ध्रुवोस ध्रुवक्षितिर्ध्रुवाणां ध्रुवतमोच्युतानामच्युत क्षित्तम ऽ एष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा. ध्रुवं ध्रुवेण मनसा वाचा सोममवनयामि. अथा न ऽ इन्द्र इद्विशोसपत्नला: समनसस्करत्.. ( २५ ) हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) और पृथ्वी पर ध्रुव रहने वालों में अग्रगण्य हैं. आप ध्रुवतम के नाम से प्रसिद्ध हैं. आप सब का मूल स्थान व आश्रय स्थान हैं. ध्रुव मन वाले यजमान हम ध्रुव मन से वाणीपूर्वक आप को नमन करते हैं. इंद्र देव हम पत्नी और संतान सहित अच्छे मन से आप को नमन करते हैं. ( २५ ) यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते ऽ अ १४ शुग्रावच्युतो धिषणयोरुपस्थात्. अध्वर्योर्वा परि वा यः पवित्रात्तं ते जुहोमि मनसा वषट्कृत १४ स्वाहा देवानामुत्क्रमणमसि.. ( २६ ) हे सोम! आप का जो अंश पत्थरों से टूटते समय, निचोड़ते और छानते समय इधरउधर गिर जाता है, जो यज्ञ में आहुति डालने के बाद अध्वर्यु के पास बच जाता है, हम उस पवित्र भाग को मन से इकट्ठा करते हैं. एकत्रित किए हुए इस अंश को अग्नि को समर्पित करते हैं. सोम को संकल्पपूर्वक स्वाहा. आप देवताओं को ऊर्ध्वगति प्रदान करने वाले हैं. ( २६ ) प्राणाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व व्यानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वोदानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व वाचे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व क्रतूक्षाभ्यां मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व श्रोत्राय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व चक्षुर्भ्यां मे वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २७) आप हमारे प्राणों के लिए वर्चस्व ( तेज ) प्रदान कीजिए. आप हमारे व्यान के ८८ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सातवां अध्याय लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे अपान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे उदान के लिए वर्चस्व प्रदान कीजिए. आप हमारे मन में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी वाणी में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कर्म में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे नेत्र में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे कानों को वर्चस्व दीजिए. ( २७ ) आत्मने मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वौजसे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वायुषे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व विश्वाभ्यो मे प्रजाभ्यो वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २८ ) आप हमारी आत्मा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारे ओज में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी आयु में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी सारी प्रजा में वर्चस्व दीजिए. आप हमारी पृथ्वी के सभी साधनों को वर्चस्व दीजिए. ( २८ ) कोसि कतमोसि कस्यासि को नामासि. यस्य ते नामामन्महि यं त्वा सोमेनातीत्पाम. भूर्भुवः स्वः सुप्रजाः प्रजाभिः स्या ७ष सुवीरो वीरैः सुपोषः पोषैः.. ( २९) हे सोम! आप कौन हैं ? आप कहां से हैं ? आप किस के हैं ? आप का क्या नाम है, जिसे जान कर हम आप को सोमरस से तृप्त कर सकें. आप सर्वत्र व्याप्त हैं. आप की कृपा से हम अच्छी संतान वाले, वीरों वालें हों एवं अच्छे पोषण से पुष्ट हों. ( २९ ) उपयामगृहीतोसि मधवे त्वोपयामगृहीतोसि माधवाय त्वोपयामगृहीतोसि शुक्राय त्वोपयामगृहीतोसि शुचये त्वोपयामगृहीतोसि नभसे त्वोपयामगृहीतोसि नभस्याय त्वोपयामगृहीतोसीषे त्वोपयामगृहीतोस्यूर्जे त्वोपयामगृहीतोसि सहसे त्वोपयामगृहीतोसि सहस्याय त्वोपयामगृहीतोसि तपसे त्वोपयामगृहीतोसि तपस्याय त्वोपयामगृहीतोस्य ७ष हसस्पतये त्वा.. ( ३० ) हे सोम! आप को कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मधु के लिए कलश से ग्रहण किया गया है. आप को माधव हेतु ग्रहण किया गया है. आप को शुक्र के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को पवित्रता के लिए ग्रहण किया गया है. आप को नभ हेतु ग्रहण किया गया है. आप को ऊर्जा हेतु ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को साहस से ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को तप के लिए ग्रहण किया गया है. हे सोम! आप को मर्यादा के लिए ग्रहण किया गया है. ( ३० ) इन्द्राग्नी ऽ आ गत ७ष सुतं गीर्भिर्नभो वरेण्यम्. अस्य पातं धियेषिता. उपयामगृहीतोसीन्द्राग्निभ्यां त्वैष ते योनिरिन्द्राग्निभ्यां त्वा.. ( ३१ ) हे सोम! आप को इंद्र देव हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि हेतु यजुर्वेद - ८९

पूर्वार्ध सातवां अध्याय उपयाम में ग्रहण किया है. आप को इंद्र देव की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है. आप को अग्नि की तृप्ति हेतु कलश में ग्रहण किया है, कलश आप दोनों का मूल स्थान है. आप यज्ञशाला में निर्धारित स्थान पर विराजने की कृपा कीजिए. हम श्रेष्ठ वाणियों से आप की उपासना करते हैं. आप यज्ञ में अपना भाग स्वीकार कीजिए. ( ३१ ) आ घा ये ऽ अग्निमिन्धते स्तृणन्ति बर्हिरानुषक्. येषामिन्द्रो युवा सखा. उपयामगृहीतोस्यग्नीन्द्राभ्यां त्वैष ते योनिरग्नीन्द्राभ्यां त्वा.. (३२) हे सोम! आप को इंद्र देव व अग्नि की तृप्ति हेतु विधिवत ग्रहण किया गया है. यज्ञस्थल में आप दोनों देवों का कुश का आसन निर्धारित है. इंद्र आप के मित्र हैं. वे युवा हैं. सोम को इंद्र देव और अग्नि दोनों के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप ही इंद्र और अग्नि दोनों का मूल स्थान हैं. ( ३२ ) ओमासश्चर्षणीधृतो विश्वे देवास ऽ आगत. दाश्वां ᳵ सो दाशुषः सुतम्. उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३३) विश्व देव यज्ञ में पधारने की कृपा करें. वे यजमानों के संरक्षक व यजमानों के पालक हैं. वे हम सब के अनुरोध पर यज्ञशाला में सोमरस का पान करने के लिए पधारने की कृपा करें. सोमरस को विश्व देव की वृत्ति के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यह आप का मूल स्थान है. आप सभी देवताओं के लिए यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३३ ) विश्वे देवास ऽ आगत शृणुता म इम ᳵ हवम्. एदं बर्हिनिषीदत. उपयामगृहीतोसि विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (३४) हे विश्व देव! आप हमारी प्रार्थनाएं सुनिए. आप पधारने की कृपा कीजिए. हम आप से यहां कुश के आसन पर बैठने का अनुरोध करते हैं. आप उस आसन पर विराजने की कृपा कीजिए. आप को सभी देवताओं के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. यही आप का और देवताओं का मूल स्थान है. ( ३४ ) इन्द्र मरुत्व ऽ इह पाहि सोमं यथा शार्याते ऽ अपिबः सुतस्य. तव प्रणीती तव शूर शर्मन्ना विवासन्ति कवयः सुयज्ञाः. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. (३५) हे इंद्र देव! हे मरुद् देव! आप सोम की रक्षा कीजिए. जैसे आप ने शर्याति के यज्ञ में सोमरस पीने की कृपा की, वैसे ही आप इस यज्ञ में पधारिए और सोमरस ९० - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सातवां अध्याय पीने की कृपा कीजिए. आप शूरवीर, सुखदाता, श्रेष्ठ यज्ञ वाले एवं अच्छे कवि हैं. आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को मरुद्गण देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. आप मरुद्गण के साथ यहां स्थिर होने की कृपा कीजिए. ( ३५ ) मरुत्वन्तं वृषभं वावृधानमकवारिं दिव्य १४ँ शासमिन्द्रम्. विश्वासाहमवसे नूतनायोग १४ँ सहोदामिह त १४ँ हुवेम. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते. उपयामगृहीतोसि मरुतां त्वौजसे.. ( ३६ ) हे इंद्र! आप हम यजमानों की विनती पर मरुद्वान हो कर पधारिए. मरुद्गण जल की वर्षा करने वाले एवं दिव्य हैं. आप को विश्वासपूर्वक आमंत्रित करते हैं. आप नूतन और उग्र हैं. आप साथसाथ रहते हैं. आप को इंद्र देव व मरुद्गण के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है. ओज पाने के लिए आप को कलश में ग्रहण किया गया है. ( ३६ ) सजोषा ऽ इन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमं पिब वृत्रहा शूर विद्वान्. जहि शत्रूँ २ ऽ रप मृधो नुदस्वाथाभयं कृणुहि विश्वतो नः. उपयाम गृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३७ ) हे इंद्र देव! आप वृत्रासुर नाशक, शूरवीर, विद्वान् हैं. मरुद्गणों के साथ इस यज्ञ में पधारने की कृपा कीजिए. आप शत्रुओं को दूर एवं उन का नाश कीजिए. आप हमें सब ओर से सुरक्षा प्रदान करने की कृपा कीजिए. आप को इंद्र देव व मरुद् देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही इंद्र देव और मरुद्गण का मूल स्थान है. ( ३७ ) मरुत्वाँ २ ऽ इन्द्र वृषभो रणाय पिबा सोममनुष्वधं मदाय. आसिञ्चस्व जठरे मध्व ऽ ऊर्मिं त्व १४ँ राजासि प्रतिपत्सुतानाम्. उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा मरुत्वत ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वा मरुत्वते.. ( ३८ ) हे मरुद्गण! आप यजमानों के लिए जल, धन व अन्न बरसाते हैं. आप सोमरस पी कर आनंदित होइए. आप शत्रुओं से युद्ध कीजिए. सोमरस लहरदार व मीठा है. आप छक कर इस को पीजिए. आप तो सोमरस के राजा हैं. आप को इंद्र देव व मरुद्गण के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही इंद्र देव व मरुद्गण का मूल स्थान है. ( ३८ ) महाँ २ ऽ इन्द्रो नृवदा चर्षणिप्रा ऽ उत द्विबर्हा ऽ अमिनः सहोभिः. अस्मद्र्यग्वावृधे वीर्यायोरुः पृथुः सुकृतः कर्तृभिर्भूत्. उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. ( ३९ ) यजुर्वेद - ९१

पूर्वार्ध सातवां अध्याय हे इंद्र! आप महान्, व्यापक, सर्वज्ञ, मनोकामना पूरक हैं. आप अपने सहयोगी देवों के साथ यज्ञ में पधारने व हमारा द्रव्य व पराक्रम बढ़ाने की कृपा कीजिए. आप हमारे कर्म विशाल बनाने की कृपा कीजिए. आप कर्मों के पोषक हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ३९ ) मँहाँ २ ऽ इन्द्रो य ऽ ओजसा पर्जन्यो वृष्टिमां २ ऽ इव. स्तोमैर्वत्सस्य वावृधे. उपयामगृहीतोसि महेन्द्राय त्वैष ते योनिर्महेन्द्राय त्वा.. (४०) हे इंद्र देव! आप महान् और जल वर्षक हैं. आप हम पर ओज बरसाइए. आप उपासक यजमानों की बढ़ोतरी करते हैं. आप को महान् इंद्र देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. वही आप का मूल स्थान है. ( ४० ) उदु त्यं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः. दृशे विश्वाय सूर्य ४ स्वाहा.. (४१) सूर्य सर्वज्ञ और दिव्य किरणें वहन करते हैं. वे अपनी किरणों की पताका फहराते हैं. वे प्राणीमात्र को दुनिया दिखाते हैं. उन के लिए स्वाहा. ( ४१ ) चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः. आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष १५ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च स्वाहा.. (४२) मित्र देव वरुण देव और अग्नि देवता के नेत्र हैं. स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक तथा अंतरिक्षलोक में सूर्य प्रकाश फैलाते हैं. सूर्य जगत् की आत्मा हैं. इन सब देवों के लिए स्वाहा. सूर्य मित्र देव के नेत्र हैं. वे वरुण देव के नेत्र हैं. वे अग्नि के नेत्र हैं. वे देवताओं के नेत्र हैं. वे स्वर्गलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे पृथ्वीलोक को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे अंतरिक्ष को अपने प्रकाश से पूर्णतया प्रकाशित करते हैं. वे जगत् की आत्मा हैं. उन सूर्य के लिए स्वाहा. ( ४२ ) अग्ने नय सुपथा राये ऽ अस्मान्विश्वानि देव वयुनानि विद्वान्. युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयिष्ठां ते नम उक्तिं विधेम स्वाहा.. (४३) हे अग्नि! आप हमें अच्छे पथ की ओर ले जाइए और धन प्रदान कीजिए. आप हमें अच्छा विद्वान् बनाइए. आप हम से बुराइयों को दूर कीजिए. हम बारबार आप को नमन करते हैं. हम बारबार आप के लिए प्रार्थना करते हैं. आप के लिए स्वाहा. आप हमें सुपथ पर ले चलिए. आप हमें धन दीजिए. ( ४३ ) अयं नो ऽ अग्निर्वरिवस्कृणोत्वयं मृधः पुर ऽ एतु प्रभिन्दन्. अयं वाजाञ्जयतु वाजसातावय १४ शत्रूञ्जयतु जर्हषाणः स्वाहा.. (४४) हे अग्नि! हमारे दुश्मनों का भेद दीजिए व उन को हरा दीजिए. हमारे दुश्मनों के ९२ - यजुर्वेद

पूर्वार्ध सातवां अध्याय नगर भेद दीजिए. हमारे दुश्मनों की जमा पूंजी हमें दे दीजिए. शत्रुओं को पराजित करने वाले अग्नि के लिए स्वाहा. ( ४४ ) रूपेण वो रूपमभ्यागां तुथो वो विश्ववेदा विभजतु. ऋतस्य पथा प्रेत चन्द्रदक्षिणा वि स्वः पश्य व्यन्तरिक्षं यतस्व सदस्यैः... ( ४५) हम अपने रूप से आप के रूप की ओर गमन करना चाहते हैं. देवगण सर्वज्ञ हैं. वे देवगण सभी के लिए सुख बांटने की कृपा करें. उन की कृपा से हम सत्य के पथ के पथिक बनें. जैसे चंद्र देव अंतरिक्ष से देखते हैं, वैसे ही हम भी दूर दृष्टिवान हों. ( ४५ ) ब्राह्मणमद्य विदेयं पितृमन्तं पैतृमत्यमृषिमार्येय ४७ सुधातुदक्षिणम्. अस्मद्राता देवत्रा गच्छत प्रदातारमाविशत.. (४६) देवताओं की कृपा से हम आज ब्राह्मणों, पिता, पितामह, ऋषि व आर्षगण से युक्त हों. आप दक्षिणा अच्छी तरह धारण करें. देवगण हमारे त्राता हैं. श्रेष्ठ दानदाता याजकों को श्रेष्ठ फल प्रदान करने की कृपा करें. ( ४६ ) अग्नये त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीयायुर्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे रुद्राय त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय प्राणो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे बृहस्पतये त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय त्वग्दात्र ऽ एधि मयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे यमाय त्वा मह्यं वरुणो ददातु सोमृतत्त्वमशीय हयो दात्र ऽ एधि वयो मह्यं प्रतिग्रहीत्रे.. (४७) हे अग्नि! आप हमें वरुण देव को देने की कृपा कीजिए. हम अमृत पान करें. आप आयुदाता हैं. आप की कृपा से हम दीर्घायु पाएं. आप हमें रुद्र देव को देने की कृपा कीजिए. आप हमें बृहस्पति देव को देने की कृपा कीजिए. आप हमें यम देव को देने की कृपा कीजिए. ( ४७ ) कोदात्कस्मा ऽ अदात्कामोदात्कामायादात्. कामो दाता कामः प्रतिग्रहीता कामैतत्ते.. (४८) कौन देता है ? किस को देता है ? कामना से ही कोई किसी को देता है. कामना से ही दान दिया और लिया जाता है. ( संसार में ) कामनाएं ही सब कुछ हैं. ( ४८ ) यजुर्वेद - ९३