भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 84

पूर्वार्ध सातवां अध्याय विस्तार है. अंतरिक्षलोक में आप देवताओं सहित अन्यों को ( मनुष्यों को ) मदमस्त बनाने की कृपा कीजिए. ( ५ ) स्वाङ्कृतोसि विश्वेभ्य ऽ इन्द्रियेभ्यो दिव्येभ्यः पार्थिवेभ्यो मनस्त्वाष्टु स्वाहा त्वा सुभव सूर्याय देवेभ्यस्त्वा मरीचिपेभ्य ऽ उदानाय त्वा.. ( ६ ) हे श्रेष्ठ जन्म वाले! आप सभी के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप इंद्रियों के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप देवताओं और मनुष्यों के मन के संतोष के लिए स्वयं प्रकाशित हुए हैं. आप को सूर्य के लिए ( कलश में ) ग्रहण किया जाता है. आप को मरीचि के लिए ( कलश में ) ग्रहण किया जाता है. आप को उदान ( देवता ) के लिए ( उपयाम में ) ग्रहण किया जाता है. ( ६ ) आ वायो भूष शुचिपा ऽ उप नः सहस्रं ते नियुतो विश्ववार. उपो ते अन्धो मद्यमयामि यस्य देव दधिषे पूर्वपेयं वायवे त्वा.. (७) हे वायु! आप पवित्रता के रक्षक हैं. आप हजारों गुणों के आधार हैं. हम सोमरस से आप को आनंदित बनाते हैं. आप इस पेय को पहले भी पी चुके हैं. हम वायु के लिए इस पेय को धारण करते हैं. ( ७ ) इन्द्रवायू इमे सुता उप प्रयोभिरागतम्. इन्दवो वामुशन्ति हि. उपयामगृहीतोसि वायव ऽ इन्द्रवायुभ्यां त्वैष ते योनिः सजोषोभ्यां त्वा.. (८) हे इंद्र देव! हे वायु! आप दोनों के प्रयोग में लाने के लिए यह सोमरस आया है ( लाया गया है ). आप इस का सेवन कीजिए. हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. आप को वायु के लिए कलश में ग्रहण किया है. वही आप का मूल स्थान है. हम उन्हीं दोनों की प्रसन्नता के लिए आप को ग्रहण करते हैं. ( ८ ) अयं वां मित्रावरुणा सुतः सोम ऽ ऋतावृधा. ममेदिह श्रुत १४ हवम्. उपयामगृहीतो ऽ सि मित्रावरुणाभ्यां त्वा.. (९) हे मित्र देव! हे वरुण देव! आप सत्य की वृद्धि करते हैं. हम आप के पुत्र आप दोनों के लिए इस सोमरस कलश में ग्रहण करते हैं. आप सोमरस का सेवन करने की कृपा कीजिए. ( ९ ) राया वय १४ ससवा १४ सो मदेम हव्येन देवा यवसेन गावः. तां धेनुं मित्रावरुणा युवँ नो विश्वाहा धत्तममपस्फुरन्तीमेष ते योनिर्ऋतायुभ्यां त्वा.. (१०) ८४ - यजुर्वेद