यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 88, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सातवां अध्याय हे सोम! मित्र और वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. दीर्घ आयु हेतु मित्र और वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! इंद्र देव के लिए आप को ग्रहण किया है. हम ने इंद्र देव और अग्नि के लिए आप को ग्रहण किया है. वरुण देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! बृहस्पति देव के लिए आप को ग्रहण किया गया है. हे सोम! विष्णु के लिए आप को ग्रहण किया गया है. ( २३ ) मूर्धानं दिवो ऽ अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽ आ जातमग्निम्. कवि १४ सम्राजमतिथिं जनानामासन्नापात्रं जनयन्त देवा:.. ( २४) हे अग्नि! आप स्वर्गलोक के सर्वोच्च स्थान पर चमकते हैं. आप पृथ्वी पर सूर्य की भांति चमकते हैं. आप वैश्वानर ( आग ) व सर्वज्ञ हैं. यजमान लोगों ने अग्नि को अरणिमंथन ( लकड़ियों की रगड़ ) से प्रकट किया है. अग्नि देव हमारे अतिथि सम्राट् हैं. ( २४ ) उपयामगृहीतोसि ध्रुवोस ध्रुवक्षितिर्ध्रुवाणां ध्रुवतमोच्युतानामच्युत क्षित्तम ऽ एष ते योनिर्वैश्वानराय त्वा. ध्रुवं ध्रुवेण मनसा वाचा सोममवनयामि. अथा न ऽ इन्द्र इद्विशोसपत्नला: समनसस्करत्.. ( २५ ) हे सोम! आप ध्रुव ( स्थिर ) और पृथ्वी पर ध्रुव रहने वालों में अग्रगण्य हैं. आप ध्रुवतम के नाम से प्रसिद्ध हैं. आप सब का मूल स्थान व आश्रय स्थान हैं. ध्रुव मन वाले यजमान हम ध्रुव मन से वाणीपूर्वक आप को नमन करते हैं. इंद्र देव हम पत्नी और संतान सहित अच्छे मन से आप को नमन करते हैं. ( २५ ) यस्ते द्रप्सः स्कन्दति यस्ते ऽ अ १४ शुग्रावच्युतो धिषणयोरुपस्थात्. अध्वर्योर्वा परि वा यः पवित्रात्तं ते जुहोमि मनसा वषट्कृत १४ स्वाहा देवानामुत्क्रमणमसि.. ( २६ ) हे सोम! आप का जो अंश पत्थरों से टूटते समय, निचोड़ते और छानते समय इधरउधर गिर जाता है, जो यज्ञ में आहुति डालने के बाद अध्वर्यु के पास बच जाता है, हम उस पवित्र भाग को मन से इकट्ठा करते हैं. एकत्रित किए हुए इस अंश को अग्नि को समर्पित करते हैं. सोम को संकल्पपूर्वक स्वाहा. आप देवताओं को ऊर्ध्वगति प्रदान करने वाले हैं. ( २६ ) प्राणाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व व्यानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्वोदानाय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व वाचे मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व क्रतूक्षाभ्यां मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व श्रोत्राय मे वर्चोदा वर्चसे पवस्व चक्षुर्भ्यां मे वर्चोदसौ वर्चसे पवेथाम्.. ( २७) आप हमारे प्राणों के लिए वर्चस्व ( तेज ) प्रदान कीजिए. आप हमारे व्यान के ८८ - यजुर्वेद