यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 87, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सातवां अध्याय पृथ्वी और आकाश के बीच जो ग्यारह दिव्य देव स्थित हैं, वे सभी देव महिमावान हैं. वे ग्यारह ही देव इस यज्ञ को सफलतापूर्वक संपन्न कराने की कृपा करें. (१९) उपयामगृहीतोस्याग्रयणोसि स्वाग्रयणः. पाहिह्यज्ञं पाहि यज्ञपतिं विष्णुस्त्वामिन्द्रियेण पातु विष्णुं त्वं पाह्यभि सवनानि पाहि.. (२०) हे देवगण! आप के लिए सोमरस को कलश में ग्रहण किया गया है. आप यज्ञ में सर्वप्रथम ग्रहण किए जाने वाले हैं. आप यज्ञ में सर्वप्रथम बुलाए जाने वाले हैं. आप यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप यज्ञपति को संरक्षण दीजिए. आप विष्णु की रक्षा कीजिए. उन की रक्षा करें. आप तीनों संध्याओं की रक्षा करने की कृपा कीजिए. (२०) सोमः पवते सोमः पवतेस्मै ब्रह्मणेस्मै क्षत्रायास्मै सुन्वते यजमानाय पवत ऽ इष ऽ ऊर्जे पवतेद्भ्य ऽ ओषधीभ्यः पवते द्यावापृथिवीभ्यां पवते सुभूताय पवते विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्य ऽ एष ते योनिर्विश्वेभ्यस्त्वा देवेभ्यः.. (२१) सोमरस प्रवाहित होता है. पवित्र सोम इस में प्रवाहित होता है. ब्राह्मणों के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. क्षत्रियों के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. ऊर्जादायी के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. ओषध के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. अच्छे भरणपोषणकर्ता हेतु यह सोम प्रवाहित होता है. विश्व के लिए यह सोम प्रवाहित होता है. यह विश्व के लिए मूल स्थान है. सभी देव यज्ञशाला में अपने लिए निर्धारित स्थान पर विराजें. (२१) उपयामगृहीतोसीन्द्राय त्वा बृहद्वते वयस्वत ऽ उक्थाव्यं गृह्णामि. यत्त ऽ इन्द्र बृहद्वयस्तस्मै त्वा विष्णवे त्वैष ते योनिरुक्थेभ्यस्त्वा देवेभ्यस्त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि.. (२२) हे सोम! आप को इंद्र देव के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. आप को बृहद् देव के लिए उपयाम में ग्रहण किया गया है. आप उपयाम (कलश) हैं. हम उक्त मंत्रों से आप की उपासना करते हैं. यह उपयाम इंद्र देव का मूल स्थान है. यह उपयाम ब्रह्म देव व विष्णु का मूल स्थान है. हम यज्ञ में उक्त मंत्र से आप सब देवों की उपासना करते हैं. हम यज्ञ में श्रेष्ठ दीर्घ जीवन की कामना से आप को ग्रहण करते हैं. (२२) मित्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राय त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राग्निभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्रावरुणाभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राबृहस्पतिभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामीन्द्राविष्णुभ्यां त्वा देवाव्यं यज्ञस्यायुषे गृह्णामि.. (२३) यजुर्वेद - ८७