यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 86, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध सातवां अध्याय के लिए सदा हवि देने वाले हैं. विश्व पर वारने योग्य यह हमारी आद्य (पहली) संस्कृति हैं. वरुण, मित्र व अग्नि प्रथम देव हैं. (१४) स प्रथमो बृहस्पतिश्चिकित्वाँस्तस्मा ऽ इन्द्राय सुतमा जुहोत स्वाहा. तृम्पन्तु होत्रा मध्वो याः स्विष्टा याः सुप्रीताः सुहुता यत्स्वाहायाऽग्नीत्.. (१५) बृहस्पति देव प्रथम देवता हैं. ज्ञाता लोग इंद्र देव के लिए यज्ञ करें. स्वाहापूर्वक उन के लिए हवि प्रदान करने की कृपा करें. यजमान होता मधुर आहुति से उन्हें तृप्त करने की कृपा करें. होता सुप्रीतिकर आहुति से उन्हें तृप्त करें. यजमान उन के लिए अच्छी तरह आहुति अग्नि के पास पहुंचाने की कृपा करें. (१५) अयं वेनश्चोदयत्पृश्निगर्भा ज्योतिर्जरायू रजसो विमाने. इममपा १४ सङ्गमे सूर्यस्य शिशुं न विप्रा मतिभी रिहन्ति. उपयामगृहीतोसि मर्काय त्वा.. (१६) ये वेन देव बादलों के गर्भ में स्थित जल को बरसने के लिए प्रेरित करते हैं. चिरायु ज्योति वाले सूर्य का वंदन करते हैं. जल को पा कर यजमान ऐसे प्रसन्न होते हैं, जैसे लोग पुत्र को पा कर प्रसन्न होते हैं. विद्वान् बुद्धिपूर्वक सूर्य की उपासना करते हैं. आप को मर्क (राक्षस-विनाश) के लिए कलश में ग्रहण किया गया है. (१६) मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता. आ यः शर्याभिस्तुविनृम्णो ऽ अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तावेष ते योनिः प्रजाः पाह्यपमृष्टो मर्को देवास्त्वा मन्थिपाः प्रणयन्त्वनाधृष्टासि.. (१७) यजमान हवनों में मन से भाग लेते हैं. द्रवित होने वाले सोमरस का मन से पान करते हैं. हम सोम से अनुरोध करते हैं कि हम संतानसहित शत्रुओं का विनाश करने में समर्थ हो सकें. हम मथानी की तरह उन्हें मथ दें. हम निर्भय हो कर देवत्व प्राप्त करें. देवगण हमें संरक्षण प्रदान करने की कृपा करें. (१७) सुप्रजाः प्रजाः प्रजनयन् परीह्यभि रायस्पोषेण यजमानम्. सञ्ग्मानो दिवा पृथिव्या मन्थी मन्थिशोचिषा निरस्तो मर्को मन्थिनोधिष्ठानमसि.. (१८) हे देवगण! यजमान की संतान श्रेष्ठ हो. आप यजमान को श्रेष्ठ धन से पोसने की कृपा कीजिए. जैसे सूर्य स्वर्गलोक से पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं. वैसे ही देवगण हमारे जीवन को प्रकाशित करने की कृपा करें. इन की कृपा से हम शत्रुओं को मथानी से मथने की तरह मथ दें. मर्क नामक असुर दुःख का घर है. आप की कृपा से (तेज से) वह भी पलायन कर जाए. (१८) ये देवासो दिव्येकादश स्थ पृथिव्यामध्येकादश स्थ. अप्सुक्षितो महिनैकादश स्थ ते देवासो यज्ञमिमं जुषध्वम्.. (१९) ८६ - यजुर्वेद