यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पंद्रहवां अध्याय
पंद्रहवां अध्याय अग्ने जातान् प्र णुदा नः सपत्नान् प्रत्यजातान् नुद जातवेदः. अधि नो ब्रूहि सुमना ऽ अहेडँस्तव स्याम शर्मं स्त्रिवरूथ ऽ उद्बौ.. (१) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमारे जो भी विद्रोही उत्पन्न हो चुके हैं, उन का नाश कीजिए. आप अच्छे मन से हम से बोलिए. आप अच्छे मन से हमें सुख प्रदान कीजिए. आप की कृपा से हम सुखी हों. आप यज्ञवेदी में बने रहिए. हम आप ही की कृपा से यज्ञ कर सकें. (१) सहसा जातान् प्रणुदा नः सपत्नान् प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व. अधि नो ब्रूहि सुमनस्यमानो वय ँष स्याम प्र णुदा नः सपत्नान्.. (२) हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमारे जो भी शत्रु उत्पन्न हो चुके हैं, उन का नाश कीजिए. आप अच्छे मन से हम से बोलिए. हम आप की कृपा से अच्छे मन वाले हो जाएं. हम शत्रुओं को नष्ट कर के सामर्थ्यशील बन जाएं. (२) षोडशी स्तोम ऽ ओजो द्रविणं चतुश्चत्वारि ँश श स्तोमो वर्चो द्रविणम्. अग्नेः पुरीषमस्यप्सो नाम तां त्वा विश्वे अभि गृणन्तु देवाः. स्तोमपृष्ठा घृतवतीह सीद प्रजावदस्मे द्रविणा यजस्व.. (३) हम सोलह कलाओं वाले स्तोम से आप की स्थापना करते हैं. सोलह कलाओं वाले स्तोम ओज पूर्ण व धनपूर्ण हैं. हम चवालीस शक्तियों वाले स्तोम से आप की स्थापना करते हैं. अग्नि पूर्णतादायी हैं. उन की इस पूर्णता की सभी देवता प्रशंसा करते हैं. हम आप को धीमी आहुति भेंट करते हैं. आप विराजिए और अपनी प्रजा को धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३) एवश्छन्दो वरिवश्छन्दः शम्भूश्छन्दः परिभूश्छन्द ऽ आच्छच्छन्दो मनश्छन्दो व्यचश्छन्दः सिन्धुश्छन्दः समुद्रश्छन्दः सरिरं छन्दः ककुप्छन्दस्त्रिककुप्छन्दः काव्यं छन्दो अङ्कुपं छन्दोक्षरपङ्क्तिश्छन्दः पदपङ्क्तिश्छन्दो विष्टारपङ्क्तिश्छन्दः क्षुरोभ्राजश्छन्द.. (४) हम एव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वरिव छंद से आप की स्थापना यजुर्वेद - १८१
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय करते हैं. हम शंभू छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम परिभू छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम आच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम मन से आप की स्थापना करते हैं. हम व्यच से आप की स्थापना करते हैं. हम सिंधु से आप की स्थापना करते हैं. हम समुद्र से आप की स्थापना करते हैं. हम सरिर से आप की स्थापना करते हैं. हम ककुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम त्रिक् ककुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम काव्य से आप की स्थापना करते हैं. हम अंकुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम अक्षर से आप की स्थापना करते हैं. हम पंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम पदपंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम विष्टारपंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम क्षुरोभ्रज से आप की स्थापना करते हैं. (४) आच्छच्छन्दः प्रच्छच्छन्दः संयच्छन्दो वियच्छन्दो बृहच्छन्दो रथन्तरच्छन्दो निकायश्छन्दो विवधश्छन्दो गिरश्छन्दा भ्रजश्छन्दः स १४ स्तुप्छन्दोनुष्टुप्छन्द ऽ एवश्छन्दो वरिवश्छन्दो वयश्छन्दो वयस्कृतच्छन्दो विष्पर्द्धाश्छन्दो विशालं छन्दश्छदिश्चन्दो दूरोहणं छन्दस्तन्द्रं छन्दो अङ्काङ्कं छन्दः.. (५) हम आच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम प्रच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम संयच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वियच्छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम बृहच्छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम रथंतर छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम निकाय छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम विवध छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम गिर छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम भ्रज छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम स्तुप् छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम अनुष्टुप् छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम एव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वरिव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वय छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वयस्कृत छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम विष्पर्द्ध छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम विशाल छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम छदि छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम दूरोहण छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम तंद्र छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम अंकांक छंद से आप की स्थापना करते हैं. (५) रश्मिना सत्याय सत्यं जिन्व प्रेतिना धर्मणा धर्मं जिन्वान्वित्या दिवा दिवं जिन्व सन्धिनान्तरिक्षेणान्तरिक्षं जिन्व प्रतिधिना पृथिव्या पृथिवीं जिन्व विष्टम्भेन वृष्ट्या वृष्टिं जिन्व प्रवयाह्नाहर्जिव्वानुया रात्र्या रात्रीं जिन्वोशिजा वसुभ्यो वसूञ्जिन्व प्रकेतेनादित्येभ्य ऽ आदित्याञ्जिन्व.. (६) सत्य के लिए रश्मियों का प्रचारप्रसार हो. सत्य की जीत हो. आचरण और धर्म से धर्म की प्रतिष्ठा हो. दिव्यता से दिव्यलोक को पाएं. संधि से अंतरिक्ष के लिए अंतरिक्ष को जीतें. प्रतिधान के माध्यम से पृथ्वी के लिए पृथ्वी को जीतें. वृष्टि के १८२ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय लिए वर्षा को आनंदित करें. वसुओं के लिए वसुओं को आनंदित करें. प्रकाशवान आदित्यों के लिए आदित्यों को आनंदित करें. (६) तन्तुना रायस्पोषेण रायस्पोषं जिन्व स ँ४ सर्पेण श्रुताय श्रुतं जिन्वै डैनौषधीभिरोषधीर्जिन्वोत्तमेन तनूभिस्तनूजिन्व वयोधसाधीतेनाधीतं जिन्वाभिजिता तेजसा तेजो जिन्व.. (७) हे इष्टके! तंतुओं से धन को पोसें. धन के लिए धन को पोसें. श्रुतियों के लिए श्रुतियों से स्नेह रखें. ओषधियों के लिए ओषधियों को पुष्ट करें. उत्तम शरीर से शरीर को पुष्ट करें. तेजस्विता के लिए तेजस्वी बनें. (७) प्रतिपदसि प्रतिपदे त्वानुपदस्यनुपदे त्वा सम्पदासि सम्पदे त्वा तेजोसि तेजसे त्वा.. (८) हे इष्टके! आप जीवन के मूल आधार हैं. आप अनुपद के अनुपद हैं. आप संपत्ति की संपत्ति हैं. आप तेजोमय हैं. आप तेजों में तेज हैं. (८) त्रिवृदसि त्रिवृते त्वा प्रवृदसि प्रवृते त्वा विवृदसि विवृते त्वा सवृदसि सवृते त्वा क्रमोस्याक्रमाय त्वा संक्रमोसि संक्रमाय त्वोत्क्रमोस्युत्क्रमाय त्वोत्क्रान्तिरस्युत्क्रान्त्यै त्वाधिपतिनोजौर्जं जिन्व.. (९) हे इष्टके! आप त्रिवृत हैं. हम त्रिवृत के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. आप विवृत हैं. हम विवृत के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. आप संवृत हैं. हम संवृत के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. आप अक्रम हैं. हम अक्रम के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. आप संक्रम हैं. हम संक्रम के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. आप उत्क्रम हैं. हम उत्क्रम के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. आप उत्क्रांत हैं. हम उत्क्रांत के लिए आप को प्रवृत्त करते हैं. (९) राज्यसि प्राची दिग्वसवस्ते देवा ऽ अधिपतयो॒ग्निर्हेतीनां प्रतिधर्त्ता त्रिवृत् त्वा स्तोमः पृथिव्या ँ४ श्रयत्वाज्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु रथन्तर ँ४ साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१०) हे इष्टके! आप पूर्व दिशा की रानी हैं. दिशाओं के स्वामी आप सब के पालनहार हैं. अग्नि सब के अधिपति हैं. आप त्रिवृत के प्रतिधारणकर्ता हैं. आप त्रिवृत स्तोम को पृथ्वी पर स्थापित करने की कृपा करें. आज्य और उक्थ आप को दृढ़ीभूत करने की कृपा करें. रथंतर साम आप को अंतरिक्षलोक में प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. ऋषिगण प्रथम उत्पन्न देव को देवों में प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. आप विशिष्ट धारणकर्ता व अधिपति हैं. अधिपति आप को विस्तृत करें. सभी देव यजमान को स्वर्गिक सुख उपलब्ध कराने की कृपा करें. (१०) यजुर्वेद - १८३
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय विराडसि दक्षिणा दिग्रुद्रास्ते देवा ऽ अधिपतय ऽ इन्द्रो हेतीनां प्रतिधर्त्ता पञ्चदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु प्र उगमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु बृहत्साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (११) हे इष्टके! आप विराट् हैं और दक्षिण दिशा स्वरूप हैं. रुद्र आप के देव व इंद्र देव अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. पंचदश स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. प्रउग उक्थ आप को स्थिर व सुदृढ़ करें. बृहत्साम आप को अंतरिक्ष में स्थापित करें. ऋषिगण दिव्यलोक में स्थापित करें. वे प्रथम उत्पन्न देव को सब देवों में स्थापित करें. वे दिव्यलोक में स्थापित करें. वे प्रथम उत्पन्न देव को सब देवों में स्थापित करें. (११) सम्राडसि प्रतीची दिगादित्यास्ते देवा ऽ अधिपतयो वरुणो हेतीनां प्रतिधर्त्ता सप्तदशस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु मरुत्वतीयमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैरूप १४ साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१२) हे इष्टके! आप पश्चिम दिशा के सम्राट् हैं. आदित्य आप के देवता हैं. वरुण आप के अधिपति हैं. आप प्रतिधारणकर्ता हैं. सप्तदश स्तोम दिशा के सम्राट् हैं. मरुत् उक्थ दिशा के सम्राट् हैं. वैरूप साम दिशा के सम्राट् हैं. वह अंतरिक्ष में दृढ़ता हेतु आप को प्रतिष्ठित करें. सृष्टि क्रम में प्रथम जन्मे ऋषि आप को देवलोक में स्थित करें. इस तरह समस्त वसु आदि देवता याजकों को सुखसंपन्न स्वर्गलोक में ले जाएं. (१२) स्वराडस्युदीची दिङ्मरुतस्ते देवा ऽ अधिपतयः सोमो हेतीनां प्रतिधर्त्तैकवि १४ शस्त्वा स्तोमः पृथिव्या १४ श्रयतु निष्केवल्यमुक्थमव्यथायै स्तभ्नातु वैराज १४ साम प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१३) हे इष्टके! आप स्वयं प्रकाशमान हैं. आप उत्तर दिशा स्वरूप हैं. मरुद्गण दिक्पालक हैं. सोम अधिपति हैं. सोम प्रतिधारक हैं. एकविंश स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. निष्केवल्य स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. वैराज साम स्तोम आप को पृथिवी पर प्रतिष्ठित करें. पहले प्रादुर्भूत ऋषिगण समस्त दिव्यलोक में श्रेष्ठ दैवी गुणों को प्रसारित करें. वांछित निष्पादक और ये प्रमुख उच्च स्वर्गलोक में यजमान को निस्संदेह स्थित करें. अधिपति भी आप को विस्तार दें. इस तरह वे समस्त १८४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय वसु आदि देव याजकों को एक विचार होकर स्वर्ग में ले जाएं. ( १३ ) अधिपत्न्यसि बृहती दिग्विश्वे ते देवा ऽ अधिपतयो बृहस्पतिर्हेतीनां प्रतिधर्त्ता त्रिणवत्रयस्त्रि १७ शौ त्वा स्तोमौ पृथिव्या १७ श्रयतां वैश्वदेवान्निमारुते उक्थे अव्यथायै स्तभ्नीता १७ शाक्वररैवते सामनी प्रतिष्ठित्या ऽ अन्तरिक्ष ऽ ऋषयस्त्वा प्रथमजा देवेषु दिवो मात्रया वरिम्णा प्रथन्तु विधर्त्ता चायमधिपतिश्च ते त्वा सर्वे संविदाना नाकस्य पृष्ठे स्वर्गे लोके यजमानं च सादयन्तु.. (१४) हे इष्टके! आप अधिपत्नी, विशाल, दिशा रूप व सब देवों के अधिपति हैं. आप बृहस्पति देव के हेतु व प्रतिधारक हैं. हम त्रिणवयवयस्त्रिंशत स्तोम से आप की प्रतिष्ठापना करते हैं. हम पृथ्वी पर आप की प्रतिष्ठापना करते हैं. वैश्वदेव अग्निमरुत्देव उक्थ स्तोत्र के लिए आप की स्थापना करते हैं. शाक्वर साम आप को अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. रैवत साम आप को अंतरिक्ष में प्रतिष्ठित करने की कृपा करें. पूर्व जन्मे ऋषि दिव्यलोक में श्रेष्ठ दैवी गुणों को व्याप्त करें. वांछित कार्यों के कर्ता मुख्य देव भी आप का विस्तार करें. इस तरह समस्त वसु आदि देव एक विचार से सुख संपन्न हों. ( १४ ) अयं पुरो हरिकेशः सूर्यरश्मिस्तस्य रथगृत्सश्च रथौजाइच सेनानीग्रामण्यौ. पुञ्जिकस्थला च क्रतुस्थला चाप्सरसौ दङ्क्ष्णवः पशवो हेतिः पौरुषेयो वधः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१५) यह देव हरे केशों वाले हैं. सूर्य की किरणों की भांति हैं. आप रथज्ञान में निपुण हैं, अग्रणी, सेनानायक, ग्रामस्थलों के नायक, यज्ञस्थल के नायक हैं. आप अप्सराओं के नायक हैं. पशु आप के हथियार हैं. आप ताकतवर का भी वध करने में समर्थ हैं. हम सभी देवताओं के साथ अग्नि को नमन करते हैं. वे हमारी रक्षा करें. वे हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. ( १५ ) अयं दक्षिणा विश्वकर्मा तस्य रथस्वनश्च रथेचित्रश्च सेनानीग्रामण्यौ. मेनका च सहजन्या चाप्सरसौ यातुधाना हेती रक्षा १७ सिप्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१६) दक्षिण दिशा में विश्वकर्मा देव को स्थापित किया गया है. विश्वकर्मा देव रथवान, सेनानी, ग्राम रक्षक, अग्रणी व मेनका तथा सहजन्य इन की अप्सराएं हैं. राक्षस इन के अस्त्रशस्त्र हैं. विश्वकर्मा देव हमारी रक्षा करें. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. ( १६ ) यजुर्वेद - १८५
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय अयं पश्चाद्विश्वव्यचास्तस्य रथप्रोतश्चासमरथश्च सेनानीग्रामण्यौ. प्रम्लोचन्ती चानुम्लोचन्ती चाप्सरसौ व्याघ्रा हेतिः सर्पाः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१७) आदित्य देव सब को प्रकाशित करते हैं. आदित्य देव को पश्चिम दिशा में स्थापित करते हैं. आदित्य देव रथवान, सेनानी, ग्राम रक्षक व अग्रणी हैं. प्रम्लोचन तथा अनुलोचनी इन की दो अप्सराएं हैं. व्याघ्र पशु इन के आयुध हैं. सांप आदि तीखे शस्त्र हैं. आदित्य देव को नमन करते हैं. अग्नि हमारी रक्षा करें. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. (१७) अयमुत्तरात्संयद्वसुस्तस्य तार्क्ष्यश्चारिष्टनेमिश्च सेनानीग्रामण्यौ. विश्वाची च घृताची चाप्सरसावापो हेतिर्वातः प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१८) यह इष्टका देव उत्तर दिशा में प्रतिष्ठित, धन स्वरूप व यज्ञ स्वरूप हैं. इन के हथियार तीक्ष्ण व शत्रुनाशक व अस्त्रशस्त्र विस्तारक हैं. वे अपराजित हैं. वे विश्वपालक व ग्राम पालक हैं. अग्रणी इन की विश्वाची तथा घृताची नामक दो अप्सराएं हैं. जल इन के आयुध हैं. वायु इन के तीक्ष्ण हथियार हैं. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. (१८) अयमुपर्यर्वाग्वसुस्तस्य सेनजिच्च सुषेणश्च सेनानीग्रामण्यौ. उर्वशी च पूर्वचित्तिश्चाप्सरसाववस्फूर्जन् हेतिर्विद्युत्प्रहेतिस्तेभ्यो नमो अस्तु ते नोवन्तु ते नो मृडयन्तु ते यं द्विष्मो यश्च नो द्वेष्टि तमेषां जम्भे दध्मः.. (१९) यह ऊपर मध्य दिशा में बादल देव हैं. यह देव विजेता, अच्छी सेना वाले, सेनानी, ग्राम प्रमुख व अग्रणी हैं. उर्वशी तथा पूर्वचिति इन की दो अप्सराएं हैं. गर्जना इन के शस्त्र हैं. बिजली इन का तीक्ष्ण आयुध है. अग्नि हमें सुख प्रदान करें. जो हम से द्वेष करते हैं और जिन से हम द्वेष करते हैं, उन सब को अग्नि अपने जबड़े में धारने की कृपा करें. (१९) अग्निर्मूर्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम्. अपा ६४ रेता ६४ सि जिन्वति.. (२०) अग्नि मूर्धन्य और स्वर्गलोक के स्वामी हैं. पृथ्वी रक्षक हैं. अग्नि जल के रस को पोषित करते हैं. (२०) अयमग्निः सहस्रिणो वाजस्य शतिनस्पतिः. मूर्धा कवी रणीयाम्.. (२१) १८६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय अग्नि हजारों के लिए सुखदायी हैं व सैकड़ों संपदाओं से युक्त हैं. वे अन्नाधिपति, मूर्धन्य, कवि व धनपति हैं. ( २१ ) त्वामग्ने पुष्करादध्यथर्वा निरमन्थत. मूर्ध्नो विश्वस्य वाघतः... (२२) हे अग्नि! अथर्वा ऋषि ने अरणि मंथन से आप को प्रकट किया. आप मूर्धन्य और विश्ववाहक हैं. ( २२ ) भुवो यज्ञस्य रजसश्च नेता यत्रा नियुद्भिः सचसे शिवाभिः. दिवि मूर्धानं दधिषे स्वर्षां जिह्वामग्ने चक्रुषे हव्यवाहम्.. (२३) हे अग्नि! आप भुवनलोक में यज्ञ के राजा व नेता हैं. आप सब के कल्याण के लिए अपने घोड़े जोतते हैं. आप स्वर्गलोक में मूर्धन्य स्थान पर विराजमान आदित्य की शोभा धारते हैं. आप हवि वाहक व लपटीली जिह्वा वाले हैं. ( २३ ) अबोध्यग्निः समिधा जनानां प्रति धेनुमिवायतीमुषासम्. यह्वा ऽ इव प्र वयामुज्जिहानाः प्र भानवः सिस्रते नाकमच्छ.. (२४) हे अग्नि! आप समिधा से प्रबोधित होते हैं. आप लोगों की ओर उसी प्रकार उन्मुख होते हैं, जैसे दूध पीने के लिए बछड़ा गाय की ओर उन्मुख होता है. उषा काल में प्राणियों के चैतन्य होने की भांति आप चैतन्य होते हैं. जैसे पक्षी आकाश में जाते हैं, वैसे ही आप स्वर्ग की ओर जाते हैं. ( २४ ) अवोचाम कवये मेध्याय वचो वन्दारु वृषभाय वृष्णे. गमविष्ठिरो नमसा स्तोममग्नौ दिवीव रुक्ममुरुव्यञ्चमश्रेत्.. (२५) अग्नि कवि, मेधावी, शक्तिमान व धनवान हैं. हम वचनों से उन की वंदना करते हैं. हम अग्नि की वैसे ही उपासना करते हैं. हम उन की महिमायुक्त उपासना करते हैं. हम स्वर्ग को प्रकाशित करने वाले अग्नि के लिए उपासना करते हैं. ( २५ ) अयमिह प्रथमो धायि धातृभिर्होता यजिष्ठो अध्वरेष्वीड्यः. यमप्नवानो भृगवो विरुरुचुर्वनेषु चित्रं विश्वं विशे विशे.. (२६) अग्नि प्रथम वंदनीय, धारक, होता व यजिष्ठ ( यज्ञ करने योग्य ) हैं. यज्ञ के लिए इन्हें यज्ञ वेदी पर स्थापित किया गया है. भृगु आदि ऋषियों ने यजमानों के कल्याण के लिए बारबार विलक्षण अग्नि को वनों में प्रज्वलित किया. ( २६ ) जनस्य गोपा ऽ अजनिष्ट जागृविरग्निः सुदक्षः सुविताय नव्यसे. घृतप्रतीको बृहता दिविस्पृशा द्युमद्विभाति भरतेभ्यः शुचिः... (२७) अग्नि मनुष्यों के संरक्षक, चेतनामय, जाग्रत व सुदक्ष हैं. वे अपनी ज्वालाओं यजुर्वेद - १८७
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय से हवि वहन करते हैं. वे स्वर्गलोक का स्पर्श करते हैं. वे द्युमान व चमकने वाले हैं. भरणपोषण कर्ता व पवित्र हैं और घृत से विशाल होते हैं. (२७) त्वामग्ने अङ्गिरसो गुहा हितमन्वविन्दञ्छिश्रियाणं वने वने. स जायसे मथ्यमानः सहो महत्त्वामाहुः सहसस्पुत्रमङ्गिरः.. (२८) हे अग्नि! आप को अंगिरा ऋषि ने प्रकट किया. छिपे हुए आप को वनवन में खोजा और प्रकट किया. अरणि मंथन से आप उत्पन्न होते हैं. आप को सभी महत्ता वाला बताते हैं. आप शक्तिमान व अंगिरा के पुत्र हैं. (२८) सखायः सं वः सम्यञ्चमिष ᳪ स्तोमं चाग्नये. वर्षिष्ठाय क्षितीनामूर्जो नप्त्रे सहस्वते.. (२९) अग्नि हमारे सखा हैं. वे हमें जल से सींचते हैं. हम उन के लिए स्तोत्र गाते हैं. वे ज्येष्ठ हैं और पृथ्वी को ऊर्जस्वी बनाते हैं. (२९) स ᳪ समिध्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य ऽ आ. इडस्पदे समिध्यसे स नो वसून्याभर.. (३०) अग्नि समिधा से प्रज्वलित किए जाते हैं. वे शक्तिमान, सब के स्वामी व सुख देने वाले हैं. आप यज्ञवेदी में भलीभांति प्रज्वलित होइए. आप हमें भरपूर धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३०) त्वां चित्रश्रवस्तम हवन्ते विक्षु जन्तवः. शोचिष्केशं पुरुप्रियाग्ने हव्याय वोढवे.. (३१) अग्नि अद्भुत व हवि ग्रहण करने वाले हैं. सभी मनुष्यों के लिए अग्नि का आह्वान करते हैं. आप चमकीले केशों वाले हैं. आप अत्यंत प्रिय हैं. हम आप के लिए हवि वहन करते हैं. (३१) एना वो अग्निं नमसोजों नपातमा हुवे. प्रियं चेतिष्ठमरति ᳪ स्वध्वरं विश्वस्य दूतममृतम्.. (३२) अग्नि प्रिय, इष्ट, हमारे यज्ञ के प्रेरक, सब के दूत व अमर हैं. हम चैतन्य होने के लिए उन का आह्वान करते हैं. (३२) विश्वस्य दूतममृतं विश्वस्य दूतममृतम्. स योजते अरुषा विश्वभोजसा स दुद्रवत्स्वाहुतः... (३३) आप विश्व के दूत व अमृत स्वरूप हैं. अग्नि यज्ञ से भोजन पाने वाले अपने श्रेष्ठ घोड़ों को रथ में जोतते हैं. अग्नि ओज सहित द्रुत गति से यज्ञ में पहुंचते हैं. (३३) १८४ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय स दुद्रवत्स्वाहुतः स दुद्रवत्स्वाहुतः. सुब्रह्मा यज्ञः सुशमी वसूनां देव २४ राधो जनानाम्.. (३४) अग्नि द्रुत गतिमान हैं. हम उन का आह्वान करते हैं. अग्नि द्रुत गतिमान हैं. हम उन का आह्वान करते हैं. अग्नि यज्ञ के अच्छे ब्रह्मा व सुखदायी हैं. वे वैभव के देव हैं और यजमान को धन देते हैं. (३४) अग्ने वाजस्य गोमत ऽ ईशानः सहसो यहो. अस्मे धेहि जातवेदो महि श्रवः.. (३५) अग्नि अन्न, गौ के स्वामी, ईश्वर, सर्वज्ञ व शीघ्र प्रदीप्त होने वाले हैं. वे हमारे लिए पृथ्वी पर धन बरसाने की कृपा करें. (३५) स ऽ इधानो वसुष्कविर्निरीडेन्यो गिरा. रेवदस्मभ्यं पुर्वणीक दीदिहि.. (३६) अग्नि ईंधनमान, धनवान व कवि हैं. हम वाणी से आप की उपासना करते हैं. आप हमें पवित्र धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३६) क्षपो राजन्नुत त्मनाग्ने वस्तोरुतोषसः. स तिग्मजम्भ रक्षसो दह प्रति.. (३७) हे अग्नि! आप की लपटें विशाल हैं. आप चमकने वाले हैं. आप अपने तीक्ष्ण रूप से राक्षसों के दाहक हैं. आप प्रातः हमारे यज्ञों में बाधक राक्षसों का नाश कीजिए. (३७) भद्रो नो अग्निराहुतो भद्रा रातिः सुभग भद्रो अध्वरः. भद्रा ऽ उत प्रशस्तयः.. (३८) अग्नि हमारे कल्याण के लिए प्रकट होते हैं. हम कल्याण के लिए उन का आह्वान करते हैं. वे हमारे लिए कल्याणकारी व सौभाग्यवर्द्धक धन प्रदान करते हैं. हम कल्याणकारी यज्ञों में उन के लिए स्तोत्र गाते हैं. (३८) भद्रा उत प्रशस्तयो भद्रं मनः कृणुष्व वृत्रतूर्ये. येना समत्सु सासहः.. (३९) अग्नि जिस कल्याणकारी मन से वृत्रों का नाश करते हैं, उस कल्याणकारी मन से हम उन की प्रशस्तियां गाते हैं, ताकि वे उत्साहपूर्वक हमारा कल्याण करें. (३९) येना समत्सु सासहोव स्थिरा तनुहि भूरि शर्धताम्. वनेमा ते अभिष्टिभिः.. (४०) अग्नि जिस उत्साह से आप शत्रुनाश करते हैं, उसी उत्साह से हमारे तन को स्थिर करते हैं. हम आप की अभीष्ट कृपा से सुखी रहें. (४०) अग्निं तं मन्ये यो वसुरस्तं यं यन्ति धेनवः. अस्तमर्वन्त ऽ आश्वोस्तान्नित्यासो वाजिन ऽ इष २४ स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (४१) अग्नि को हम मानते हैं. हम उन के धन तक वैसे ही पहुंचते हैं, जैसे गौएं घर यजुर्वेद - १८९
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय तक पहुंचती हैं. घोड़े भी रोज अग्नि को देख कर घुड़साल में आते हैं. अग्नि अपने याजकों को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा करें (४१) सो अग्निर्यो वसुर्गृणे सं यमायन्ति धेनवः. समर्वन्तो रघुद्रुवः स ᳪ सुजातासः सूर्य ऽ इष ᳪ स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (४२) अग्नि अपने धन के साथ ऐसे आते हैं, जैसे गाएं बाड़े में आती हैं. तेजगति वाले घोड़े घुड़साल में आते हैं. संस्कारित यजमान अग्नि की उपासना करते हैं. अग्नि अपने याजकों को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा करें. (४२) उभे सुश्चन्द्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीष ऽ आसनि. उतो न ऽ उत्पूर्या उक्थेषु शवसस्पत ऽ इष ᳪ स्तोतृभ्य ऽ आ भर.. (४३) हे अग्नि! आप चंद्रमा जैसे शांतिदाता हैं. आप घी की हवि ग्रहण करने के लिए दोनों हाथों का उपयोग करते हैं. आप शक्तिमान हैं. हम मंत्रों (उक्थ) द्वारा आप की उपासना करते हैं. आप अपने याजकों को भरपूर धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (४३) अग्ने तमद्याश्वं न स्तोमैः क्रतुं न भद्र ᳪ हृदिस्पृशम्. ऋध्यामा त ऽ ओहैः.. (४४) हे अग्नि! जिस प्रकार प्रार्थनाओं से हम अश्वमेध के अश्व को प्रेरित करते हैं, वैसे ही यज्ञ में हम कल्याणदायी प्रार्थनाओं से हृदय को स्पर्श करते हैं. अग्नि की कृपा से यज्ञ संबंधी संकल्प मजबूत होते हैं. (४४) अधा ह्यग्ने क्रतोर्भद्रस्य दक्षस्य साधोः. रथीर्ऋतस्य बृहतो बभूथ.. (४५) हे अग्नि! आप यज्ञ में कल्याणकारी व फलदायी हैं. आप दक्ष व कार्य साधक हैं. सारथी की भांति आप ऋत के विशाल रथ के संचालक हैं. (४५) एभिनॊ अर्कैर्भवा नो अर्वाङ्क् स्वर्ण ज्योतिः. अग्ने विश्वेभिः सुमना ऽ अनीकैः.. (४६) हे अग्नि! आप स्वर्णिम ज्योति व अच्छे मन वाले हैं. आप स्वर्णिम ज्योति सहित हमारे यहां पधारने व हमारे जीवन को प्रकाशित करने की कृपा कीजिए. (४६) अग्नि ᳪ होतां मन्ये दास्वन्तं वसु ᳪ सूनु ᳪ सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्. य ऽ ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. घृतस्य विभ्राष्टिमनु वष्टि शोचिषाजुह्वानस्य सर्पिषः.. (४७) हे अग्नि! हम आप को होता मानते हैं. आप कर्मशील व दाता हैं. आप धनवान, साहस के पुत्र, सर्वज्ञ व ब्राह्मण हैं. आप हमारा सब कुछ जानते हैं. आप हमारे यज्ञ में ऊपर की ओर गमन करते हैं. आप सब का सहारा हैं. आप घृतपान करते हैं. १९० - यजुर्वेद
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय घृतपान आप को इष्ट है. आप ज्योतिवर्धक हैं. आप ब्रह्मज्ञानी को हम घी की आहुति भेंट करते हैं. ( ४७ ) अग्ने त्वं नो अन्तम ऽ उत त्राता शिवो भवा वरूथ्यः. वसुरग्निर्वसुश्रवा ऽ अच्छा नक्षि द्युमत्तम १७ रयिं दाः. तं त्वा शोचिष्ठ दीदिवः सुम्नाय नूनमीमहे सखिभ्यः.. (४८) हे अग्नि! आप अन्यतम, ज्ञाता, शिव हमारे संरक्षक हैं. आप धनवान व प्रख्यात हैं. आप अग्रगामी, श्रेष्ठलोक वासी, धनदाता, ज्योतिमान व स्वर्गलोक के प्रकाशक हैं. हम अच्छे मन वाले और अपने सखाओं के कल्याण के लिए आप से निवेदन करते हैं. ( ४८ ) येन ऋषयस्तपसा सत्रमायन्निन्धाना ऽ अग्नि १७ स्वराभरन्तः. तस्मिन्नहं नि दधे नाके अग्निं यमाहुर्मनवस्तीर्णबर्हिषम्.. (४९) ऋषियों ने तपस्या से अग्नि को प्रज्वलित किया. अपने स्वर से ऋषियों ने अग्नि को प्रज्वलित किया. हम स्वर्गलोक में अग्नि को धारते हैं. हम अग्नि से विस्तृत कुश के आसन पर विराजने का अनुरोध करते हैं. ( ४९ ) तं पत्नीभिरनु गच्छेम देवाः पुत्रैर्भ्रातृभिरुत वा हिरण्यैः. नाकं गृभ्णानाः सुकृतस्य लोके तृतीये पृष्ठे अधि रोचने दिवः.. (५०) हे अग्नि! आप दिव्य गुणों से संपन्न हैं. हम पत्नी, पुत्र, भाई आदि सहित आप का संरक्षण पाएं. हम इन सब के साथ आप का अनुकरण करें. हम स्वर्ग पाने के लिए आप का अनुकरण करें. आप श्रेष्ठकर्मा हैं. आप स्वर्गलोक में प्रकाशित होते हैं. हम आप की कृपा से श्रेष्ठ लोक को प्राप्त करें. ( ५० ) आ वाचो मध्यमरुहद्दुरण्युर्यमग्निः सत्पतिश्चेकितानः. पृष्ठे पृथिव्या निहितो दविद्युतदधस्पदं कृणुतां ये पृतन्यवः.. (५१) हे अग्नि! आप संसार का भरणपोषण करते हैं. आप सत्पति व चैतन्य हैं और पृथ्वि के पृष्ठ भाग पर स्थित हैं. आप स्वर्गलोक को भी द्युतिमान बनाते हैं. हम पवित्र मंत्रों से आप की स्थापना करते हैं. जो शक्तिशाली हमें नष्ट करना चाहते हैं, आप उन्हें नष्ट करने की कृपा करें. ( ५१ ) अयमग्निtoken -> अयमग्निर्विरतमो वयोधाः सहस्रियो द्योततामप्रयुच्छन्. विभ्राजमानः सरिरस्य मध्य ऽ उप प्र याहि दिव्यानि धाम.. (५२) यह अग्नि वीरतम और वय ( आयु ) धारक हैं. वे हजारों कार्यों के साधक हैं. वे आलस्य रहित हो कर यजमान का कार्य संपादित करते हैं. वे तीनों लोकों के बीच के दिव्य धाम में हमें पहुंचाने की कृपा करें. ( ५२ ) यजुर्वेद - १९१
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय सम्प्रच्यवध्वमुप सम्प्रयाताग्ने पथो देवयानान् कृणुध्वम्. पुनः कृण्वानाः पितरा युवानान्वाता १७ सीत् त्वयि तन्तुमेतम्.. (५३) हे ऋषिगणो! आप अग्नि के समीप पधारिए. आप इन्हें प्रज्वलित करने व देवताओं का पथ प्रदर्शित करने की कृपा कीजिए. हमारे पितरों ने पुनः आप को युवा बनाया. पितरों ने पुनः यज्ञों में आप का विस्तार किया. (५३) उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स १७ सृजेथामयं च. अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन् विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (५४) हे अग्नि! आप उद्बुद्ध होइए. आप यजमानों को भी जाग्रत कीजिए. आप अपने इष्टजनों की इच्छापूर्ति कीजिए. सभी देवगण और यजमानगण इस की उत्तर दिशा में अधिष्ठित होने की कृपा करें. (५४) येन वहसि सहस्रं येनाग्ने सर्ववेदसम्. तेनेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (५५) हे अग्नि! जिस से आप हजार गुने हो जाते हैं, जिस से आप सब कुछ के ज्ञाता हो जाते हैं, आप उसी से हमारे इस यज्ञ में पधारिए और सभी देवों को लाने की कृपा कीजिए. (५५) अयं ते योनिर्ऋत्वियो यतो जातो अरोचथाः. तं जानन्नग्न ऽ आरोहाथा नो वर्धया रयिम्.. (५६) हे अग्नि! यह आप का मूल स्थान है. इस से यजमान ऋतुकाल के कर्मों के लिए जागते हैं. आप उन को जान कर आरोहण करने व हमारे धन की बढ़ोत्तरी करने की कृपा कीजिए. (५६) तपश्च तपस्यश्च शैशिरावृतू अग्नेरन्तःश्लेषोसि कल्पेतां द्यावापृथिवी कल्पन्तामाप ऽ ओषधयः कल्पन्तामग्नयः पृथङ्मम ज्यैष्ठ्याय सव्रताः. ये अग्नयः समनसोन्तरा द्यावापृथिवी इमे. शैशिरावृतू अभिकल्पमाना ऽ इन्द्रमिव देवा ऽ अभिसंविशन्तु तया देवतयाङ्गिरस्वद्ध्रुवे सीदतम्.. (५७) तप तथा तपस्या के लिए शिशिर ऋतु से आवृत होइए. ये महीने अग्नि के भीतर से जुड़े हैं. स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक सुखदायी हैं. ओषधियां आनंददायी हों. अग्नियां संकल्पशील हों. जो अग्नियां समान मन वाली हैं, वे अग्नियां स्वर्गलोक तथा पृथ्वीलोक के बीच स्थापित होने की कृपा करें. जैसे इंद्र देव आश्रय हैं, वैसे ही शिशिर ऋतु से संबंधित देव आश्रय बनें. देवगण अंगिरा ऋषि की तरह ध्रुव हो कर विराजमान होने की कृपा करें. (५७) १९२ - यजुर्वेद 632/12
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय परमेष्ठी त्वा सादयतु दिवस्पृष्ठे ज्योतिष्मतीम्. विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानाय विश्वं ज्योतिर्यच्छ. सूर्यस्तेधिपतिस्तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवा सीद.. (५८) हे अग्नि! आप परम इष्ट और ज्योतिष्मान हैं. आप स्वर्गलोक के पृष्ठ में विराजें. सारे विश्व के प्राण, अपान व व्यान के लिए विश्व ज्योति प्रदान करें. सूर्य आप के अधिपति हैं. आप अंगिरा ऋषि की तरह ध्रुव हो कर विराजिए. ( ५८ ) लोकं पृण छिद्रं पृणाथो सीद ध्रुवा त्वम्. इन्द्राग्नी त्वा बृहस्पति रस्मिन्योनावसीषदन्.. (५९) इंद्र देव, अग्नि और बृहस्पति देव ने आप को यहां अधिष्ठित किया है. आप लोक के छिद्र पूरिए. आप ध्रुव होइए और यहां विराजने की कृपा कीजिए. ( ५९ ) ता अस्य सूददोहसः सोम १४ श्रीणन्ति पृश्नयः. जन्मन्देवानां विशस्त्रिष्वारोचने दिवः.. (६०) वे इन सूर्य की किरणें हैं. वे सोमरस को पकाती हैं. सोमरस को शोभा और श्रेष्ठ रंग प्रदान करती हैं. देवताओं के जन्म में स्वर्गलोक को प्रकाशित करती हैं. ( ६० ) इन्द्रं विश्वा अवीवृधन्समुद्रव्यचसं गिरः. रथीतम १४ रथीनां वाजाना १४ सत्पतिं पतिम्.. (६१) सभी इंद्र देव की बढ़ोत्तरी करते हैं. सभी अपनी वाणी से इंद्र देव के गुण गाते हैं. उन की स्तुति करते हैं. श्रेष्ठ रथी, अन्नस्वामी सत्पति आदि सभी इंद्र देव की स्तुति करते हैं. ( ६१ ) प्रोथदश्वो न यवसेविष्यन्यदा महः संवरणाद्व्यस्थात्. आदस्य वातो अनुवाति शोचिरध स्म ते व्रजनं कृष्णमस्ति.. (६२) अग्नि प्रज्वलित हो कर भूखे घोड़े द्वारा घास के लिए की जाने वाली आवाज की तरह आवाज करते हैं. वायु का अनुकरण करते हैं, जिस से और अधिक प्रज्वलित हो जाते हैं. उन का काला धुआं सर्वत्र व्याप्त हो जाता है. ( ६२ ) आयोष्ट्वा सदने सादयाम्यवतश्छायाया १४ समुद्रस्य हृदये. रश्मीवतीं भास्वतीमा या द्यां भास्या पृथिवीमोर्वन्तरिक्षम्.. (६३) समुद्र के हृदय में व यज्ञ सदन में आप को प्रतिष्ठित किया जाता है. आप किरणमयी व प्रकाशमयी हैं. आप पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक को अपने प्रकाश से परिपूर्ण कर देते हैं. ( ६३ ) यजुर्वेद - १९३
पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय परमेष्ठी त्वा सादयतु दिवस्पृष्ठे व्यचस्वतीं प्रथस्वतीं दिवं यच्छ दिवं दृ १७ ह दिवं मा हि १७ सीः. विश्वस्मै प्राणायापानाय व्यानायोदानाय प्रतिष्ठायै चरित्राय. सूर्यस्त्वाभि पातु मह्या स्वस्त्या छर्दिषा शन्तमेन तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवे सीदतम्.. (६४) आप परम इष्ट हैं. आप विराजिए. आप स्वर्गलोक में स्थापित होइए. आप हमें भी स्वर्गलोक दीजिए. आप हिंसा मत कीजिए. सारे विश्व के लिए प्राण, अपान, व्यान, उदान की प्रतिष्ठा के लिए कृपा कीजिए. सूर्य हमारे चरित्र की रक्षा करने की कृपा करें. आप हमारे कल्याणकारी गुणों को बनाए रखिए. आप अंगिरा ऋषि की तरह ध्रुव रहिए. आप अंगिरा ऋषि की तरह प्रतिष्ठित रहिए. ( ६४ ) सहस्रस्य प्रमासि सहस्रस्य प्रतिमासि सहस्रस्योन्मासि साहसोसि सहस्राय त्वा.. (६५) हे अग्नि! आप हजार का मापदंड हैं. आप हजार की प्रतिमा और हजार स्थानों पर विराजनीय हैं. हम हजारों उच्चगति के लिए आप की उपासना करते हैं. ( ६५ ) १९४ - यजुर्वेद
सोलहवां अध्याय
सोलहवां अध्याय नमस्ते रुद्र मन्यव ऽ उतो त ऽ इषवे नमः. बाहुभ्यामुत ते नमः.. (१) रुद्र देव के लिए नमस्कार. आप के क्रोध को नमन. आप के बाणों के लिए नमस्कार. आप के दोनों बाहुओं के लिए नमस्कार. ( १ ) या ते रुद्र शिवा तनूरघोरा ऽ पापकाशिनी. तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभि चाकशीहि.. (२) रुद्र देव कल्याणकारी, घोर पापों के भी नाशक, शांत व बलवान हैं. रुद्रदेव हम पर कल्याणकारी कृपा दृष्टि रखें. ( २ ) यामिषुं गिरिशन्त हस्ते बिभर्ष्यस्तवे. शिवां गिरित्र तां कुरु मा हि ꣳ सीः पुरुषं जगत्.. (३) आप गिरिवासी हैं. आप के हाथ में हमारा भविष्य है. आप अपनी कल्याणकारी शक्ति से हमारा त्राण ( कल्याण ) कीजिए. आप हिंसा मत कीजिए. आप जगत् और मनुष्यों के प्रति हिंसा मत कीजिए. ( ३ ) शिवेन वचसा त्वा गिरिशाच्छावदामसि. यथा नः सर्वमिज्जगदयक्ष्म ꣳ सुमना ऽ असत्.. (४) हे रुद्र देव! आप पर्वतवासी हैं. हम आप के प्रति कल्याणकारी वचन बोलते हैं. आप इस सारे जग को यक्ष्मा ( रोग ) से दूर रखने की कृपा कीजिए. हम आप की कृपा से अच्छे मन वाले हो जाएं. ( ४ ) अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्यो भिषक्. अहीँश्च सर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्च यातुधान्यो ऽ धराचीः परा सुव.. (५) रुद्र देव अधिवक्ता, प्रथम देव व वैद्य आप सभी हिंसक प्राणियों व नीच प्रवृत्ति वालों को नष्ट करने की कृपा कीजिए. ( ५ ) असौ यस्ताम्रो अरुण ऽ उत बभ्रुः सुमङ्गलः. ये चैन ꣳ रुद्रा ऽ अभितो दिक्षु श्रिताः सहस्रशो ऽ वैषा ꣳ हेड ऽ ईमहे.. (६) यजुर्वेद - १९५
पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय
पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय यह सर्वप्रथम तांबे जैसे रंग का होता है. फिर अरुण ( लाल ) रंग का और उस के बाद भूरे रंग का हो जाता है. ये जो रुद्र देव हैं इन की शक्तियां विभिन्न दिशाओं में फैली हुई हैं. सूर्य की हजारों किरणों की तरह इन की हजारों शक्तियां हैं. हम इन रुद्र देव को नमस्कार करते हैं और अपने प्रति उन की प्रशंसा चाहते हैं. ( ६ ) असौ यो ऽ वसर्पति नीलग्रीवो विलोहितः. उतैनं गोपा ऽ अदृश्रन्नदृश्रन्नुदहार्यः स दृष्टो मृडयाति नः.. ( ७ ) रुद्र देव निरंतर गतिशील रहते हैं वे नीली गरदन वाले हैं और खास प्रकार के लाल रंग वाले हैं. सुबह ही सुबह ग्वाले और पनिहारिनें इन के दर्शन करती हैं. उन के दर्शन हमारे लिए भी सुखकारी हों. ( ७ ) नमो ऽ स्तु नीलग्रीवाय सहस्राक्षाय मीढुषे. अथो ये अस्य सत्वानो ऽ हं तेभ्यो ऽ करं नमः.. ( ८ ) नीली गरदन वाले रुद्र देव के लिए नमन. हजारों आंखों वाले रुद्र देव के लिए नमन. वर्षा करने वाले रुद्र देव के लिए नमन. सत्यवान रुद्र देव के लिए नमन. ( ८ ) प्रमुञ्च धन्वनस्त्वमुभयोरात्र्योर्ज्याम्. याश्च ते हस्त ऽ इषवः परा ता भगवो वप.. ( ९ ) रुद्र देव धनुष की प्रत्यंचा को उतार लें. वे धारण किया हुआ अपना धनुष उतारने की कृपा करें. हाथ में जो बाण हैं वे अपनी तीक्ष्णता छोड़ने की कृपा करें. ( ९ ) विज्यं धनुः कपर्दिनो विशल्यो बाणवाँ २ उत. अनेशन्नस्य या ऽ इषव ऽ आभुरस्य निषङ्गाधिः.. ( १० ) रुद्र देव का धनुष विजयी हो. उन का धनुष प्रत्यंचा हीन हो जाए. उन का धनुष बाण और तरकसहीन हो जाए. इन का तलवार रखने का स्थान रिक्त हो जाए. कहीं भी उन के बाण न दिखाई पड़ें. ( १० ) या ते हेतिर्मीढुष्टम हस्ते बभूव ते धनुः. तयास्मान्विश्वतस्त्वमयक्ष्मया परि भुज.. ( ११ ) हे रुद्र देव! आप के हाथ में धनुष है. आप हमें रोग व हिंसा से बचाइए. आप सुखदाता हैं. ( ११ ) परि ते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तु विश्वतः. अथो य ऽ इषुधिस्तवारे अस्मान्निधेहि तम्.. ( १२ ) हे रुद्र देव! आप अपने धनुष से सब ओर से, सब प्रकार से हमारी रक्षा कीजिए. अपने बाण हमारे लिए मत धारिए. ( १२ ) १९६ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय अवतत्य धनुष्ट्व ँ सहस्राक्ष शतेषुधे. निशीर्य शल्यानां मुखा शिवो नः सुमना भव.. (१३) हे रुद्र देव! आप हजारों आंखों वाले व सैकड़ों तरकस वाले हैं. आप बाणों के मुंह निकाल दीजिए. बाणों के मुंह हमारे लिए कल्याणकारी हों. हम अच्छे मन वाले हों. ( १३ ) नमस्त ऽ आयुधायानातताय धृष्णवे. उभाभ्यामुत ते नमो बाहुभ्यां तव धन्वने.. (१४) आततायियों के लिए आयुध धारण करने वाले रुद्र देव के लिए नमन. आप की दोनों बाहुओं व आप के धनुष और तरकस दोनों के लिए नमन. ( १४ ) मा नो महान्तमुत मा नो अर्भकं मा न ऽ उक्षन्तमुत मा न ऽ उक्षितम्. मा नो वधीः पितरं मोत मातरं मा नः प्रियास्तन्वो रुद्र रीरिषः.. (१५) हे रुद्र देव! जो हमारे प्रिय हैं व जो हमारे इष्ट हैं, आप उन की रक्षा करने की कृपा कीजिए. आप हमारे महान् लोगों का वध मत कीजिए. आप हमारे छोटे बच्चों का वध मत कीजिए. आप हमारे मातापिता आदि का वध मत कीजिए. ( १५ ) मा नस्तोके तनये मा न ऽ आयुषि मा नो गोषु मा नो अश्वेषु रीरिषः. मा नो वीरान् रुद्र भामिनो वधीर्हविष्मन्तः सदमित् त्वा हवामहे.. (१६) हे रुद्र देव! आप हमारे पुत्रों को नष्ट न करें. आप हमारे पौत्रों को नष्ट न करें. आप हमारी आयु को नष्ट न करें. आप हमारी गायों को नष्ट न करें. आप हमारे घोड़ों को नष्ट न करें. आप हमारे वीरों को नष्ट न करें. आप हमारी स्त्रियों को नष्ट न करें. हम सब हविमान हो कर आप का आह्वान कर रहे हैं. ( १६ ) नमो हिरण्यबाहवे सेनान्ये दिशां च पतये नमो नमो वृक्षेभ्यो हरिकेशेभ्यः पशूनां पतये नमो नमः शष्पिञ्जराय त्विषीमते पथीनां पतये नमो नमो हरिकेशायोपवीतिने पुष्टानां पतये नमः.. (१७) सोने से सज्जित बाहु वाले को नमन. दिशापति को नमन. सेनानी को नमन. वृक्षों को नमन. हरे बालों वाले को नमन. पशुपति को नमन. कोंपल जैसे रंग वाले को नमन. पथपति को नमन. हरे केश वाले को नमन. यज्ञोपवीतधारी को नमन. पुष्टता के स्वामी को नमन. ( १७ ) नमो बभ्लुशाय व्याधिने ऽ न्नानां पतये नमो नमो भवस्य हेत्यै जगतां पतये नमो नमो रुद्रायातातयिने क्षेत्राणां पतये नमो नमः सूतायाहन्त्यै वनानां पतये नमः.. (१८) भूरे रंग वाले को नमन. रोगपति को नमन. अन्नपति को नमन. जगहित हेतु आयुधधारी को नमन. संसारपति को नमन. आततायियों से बचाने वाले को नमन. यजुर्वेद - १९७
पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय क्षेत्रपति को नमन. अवह्य सारथी को नमन. वनों के स्वामी को नमन. रुद्र देव को नमन. रुद्र देव को नमन. रुद्र देव को नमन. ( १८ ) नमो रोहिताय स्थपतये वृक्षाणां पतये नमो नमो भुवन्तये वारिवस्कृतायौषधीनां पतये नमो नमो मन्त्रिणे वाणिजाय कक्षाणां पतये नमो नम ऽ उच्चैर्घोषायाक्रन्दयते पत्तीनां पतये नमः... (१९) लाल रंग वाले स्थापक देव को नमन. वृक्षपति को नमन. भुवनपति को नमन. धनपति को नमन. ओषधिपति को नमन. मंत्रणादाता को नमन. व्यापारपति को नमन. कक्षापति को नमन. उच्चघोष करने वाले को नमन. भयंकर क्रंदन करने वाले को नमन. ( १९ ) नमः कृत्स्नायतया धावते सत्वनां पतये नमो नमः सहमानाय निव्याधिन ऽ - आव्याधिनीनां पतये नमो नमो निषङ्गिणे ककुभाय स्तेनानां पतये नमो नमो निचेरवे परिचरायारण्यानां पतये नमः... (२०) सत्यपति को नमन. चोर नियंत्रक को नमन. रोग नियंत्रक को नमन. उपद्रव नियंत्रक को नमन. अपहरण नियंत्रक को नमन. वनपालक को नमन. रुद्र देव को नमन. ( २० ) नमो वञ्चते परिवञ्चते स्तायूनां पतये नमो नमो निषङ्गिण ऽ इषुधिमते तस्कराणां पतये नमो नमः सृकायिभ्यो जिघासद्भ्यो मुष्णतां पतये नमो नमोसिमद्भ्यो नक्तञ्चरद्भ्यो विकृन्तानां पतये नमः... (२१) ठगने और लूटने वालों के नियंत्रक को नमन. गुप्तचरों के नियंत्रक को नमन. उपद्रव नियंत्रक को नमन. चोरपति को नमन. शस्त्रयुक्त शत्रुनाशक को नमन. मूठ पति को नमन. रात्रिपति को नमन. परधन हारक को नमन. ( २१ ) नम ऽ उष्णीषिणे गिरिचराय कुलुञ्चानां पतये नमो नम ऽ इषुमद्भ्यो धन्वायिभ्यश्च वो नमो नम ऽ आतन्वानेभ्यः प्रतिदधानेभ्यश्च वो नमो नम ऽ आयच्छद्भ्यो ऽ स्यद्भ्यश्च वो नमः... (२२) पगड़ीधारी को नमन. पर्वत पर विचरने वाले को नमन. धन हरने वालों के नियंत्रक को नमन. दुष्टों को डराने वाले रुद्र देव को नमन. धनुष बाणधारी को नमन. बाण प्रहरी रुद्र को नमन. धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाने वाले रुद्र को नमन. ( २२ ) नमो विसृजद्भ्यो विध्यद्भ्यश्च वो नमो नमः स्वपद्भ्यो जाग्रद्भ्यश्च वो नमो नमः शयानेभ्य ऽ आसीनेभ्यश्च वो नमो नमस्तिष्ठद्भ्यो धावद्भ्यश्च वो नमः... (२३) बाण छोड़ने वाले को नमन. शत्रुवध करने वाले को नमन. सोने वाले को नमन. १९८ - यजुर्वेद
पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय जागने वाले को नमन. बैठने वाले को नमन. ठहरने वाले को नमन. दौड़ने वाले को नमन. चित्त में विराजमान रुद्र देव को नमन. ( २३ ) नमः सभाभ्यः सभापतिभ्यश्च वो नमो नमो ऽ श्वेभ्यो ऽ श्वपतिभ्यश्च वो नमो नम ऽ- आव्याधिनीभ्यो विविध्यन्तीभ्यश्च वो नमो नम ऽ उगणाभ्यस्तृ ँ हतीभ्यश्च वो नमः.. ( २४) सभा स्वरूप रुद्र देव को नमन. सभापति रुद्र देव को नमन. अश्वपति रुद्र देव को नमन. निरोगपति रुद्र देव को नमन. युद्ध में सहायक रुद्र देव को नमन. शत्रु प्रहरी रुद्र देव को नमन. ( २४ ) नमो गणेभ्यो गणपतिभ्यश्च वो नमो नमो ब्रातेभ्यो ब्रातपतिभ्यश्च वो नमो नमो गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्च वो नमो नमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्च वो नमः.. ( २५) गणों को नमन. गणपति को नमन. व्रतपति को नमन. व्रत के अधिपति को नमन. बुद्धिमान को नमन. बुद्धिमानों को नमन, विविध रूपवान को नमन. बहुत रूपवान को नमन. ( २५ ) नमः सेनाभ्यः सेनानिभ्यश्च वो नमो नमो रथिभ्यो अरथेभ्यश्च वो नमो नमः क्षत्तृभ्यः संगृहीतृभ्यश्च वो नमो नमो महद्द्भ्यो अर्भकेभ्यश्च वो नमः.. ( २६) सेना स्वरूप को नमन. सेनापति को नमन. रथवान को नमन. रथहीन को नमन. क्षत्रिय को नमन. संग्रहकर्ता को नमन. महान् स्वरूप को नमन. कनिष्ठ को नमन. ( २६ ) नमस्तक्षभ्यो रथकारेभ्यश्च वो नमो नमः कुलालेभ्यः कमारिभ्यश्च वो नमो नमो निषादेभ्यः पुञ्जिष्ठेभ्यश्च वो नमो नमः श्वनिभ्यो मृगयुभ्यश्च वो नमः.. ( २७) तरकसकार और रथकार को नमन. कुम्हार और लोहार को नमन. भील और जंगलवासी को नमन. कुत्ता पालक और शिकारियों को नमन. ( २७ ) नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः शर्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च.. ( २८) कुत्तों को नमन. कुत्तों के स्वामी के लिए नमन. संसार के स्वामी को नमन. रुद्र देव के लिए नमन. विश्व स्वामी को नमन. पशुपति के लिए नमन. पशुपति को नमन. नीली गरदन वाले व नीले कंठ वाले के लिए नमन. ( २८ ) नमः कपर्दिने च व्युप्तकेशाय च नमः सहस्राक्षाय च शतधन्वने च नमो गिरिशयाय च शिपिविष्टाय च नमो मीढुष्टमाय चेषुमते च.. (२९) जटामय रुद्र को नमन. मुंडित के लिए नमन. हजारों आंखों वाले के लिए यजुर्वेद - १९९
पूर्वार्ध सोलहवां अध्याय नमन. सैकड़ों धनुष वाले के लिए नमन. गिरि में सोने वाले के लिए नमन. सभी में व्याप्त के लिए नमन. सुखदाता के लिए नमन. इषुमान ( बाणधारी ) के लिए नमन. ( २९ ) नमो ह्रस्वाय च वामनाय च नमो बृहते च वर्षीयसे च नमो वृद्धाय च सवृधे च नमो ऽग्र्याय च प्रथमाय च.. ( ३०) ह्रस्व के लिए नमन. वामन के लिए नमन. विशाल के लिए नमन. वर्ष वालों के लिए नमन. वृद्ध के लिए नमन. आकर्षक युवारूप के लिए नमन. अग्रणी के लिए नमन. प्रथम के लिए नमन. ( ३० ) नम ऽ आशवे चाजिराय च नमः शीघ्र्याय च शीभ्याय च नम ऽ ऊर्म्याय चा वस्वन्याय च नमो नादेयाय च द्वीप्याय च.. (३१) तीव्र गति वाले के लिए नमन. शीघ्र कर्म करने वाले के लिए नमन. वेगवान के लिए नमन. लहर वाले के लिए नमन. जल में स्थित के लिए नमन. नदी में व द्वीप पर रहने वाले के लिए नमन. ( ३१ ) नमो ज्येष्ठाय च कनिष्ठाय च नमः पूर्वजाय चापरजाय च नमो मध्यमाय चापगल्भाय च नमो जघन्याय च बुध्याय च.. (३२) ज्येष्ठ के लिए नमन. कनिष्ठ के लिए नमन. पूर्वज के लिए नमन. वर्तमान के लिए नमन. मध्यम के लिए नमन. अप्रौढ़ के लिए नमन. जघन्य और जाग्रत के लिए नमन. ( ३२ ) नमः सोभ्याय च प्रतिसर्याय च नमो याम्याय च क्षेम्याय च नमः श्लोक्याय चावसान्याय च नम ऽ उर्वर्याय च खल्याय च.. (३३) सौम्य के लिए नमन. प्रत्याक्रमण करने वाले के लिए नमन. न्यायकर्ता के लिए नमन. कुशलक्षेम वाले के लिए नमन. श्लोक वाले के लिए नमन. समापन वाले के लिए नमन. लहरों वाले व संग्रह करने वाले के लिए नमन. ( ३३ ) नमो वन्याय च कक्ष्याय च नमः श्रवाय च प्रतिश्रवाय च नम ऽ आशुषेणाय चाशुरथाय च नमः शूराय चावभेदिने च.. (३४) वन देव के लिए नमन. कक्ष में स्थित के लिए नमन. काम में स्थित लिए नमन. प्रतिश्रवण में स्थित के लिए नमन. शीघ्रगामी रथ वाले के लिए नमन. शूरवीर व शत्रुओं के हृदय भेदक के लिए नमन. ( ३४ ) नमो बिल्मिने च कवचिने च नमो वर्मिणे च वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्याय चाहनन्याय च.. (३५) २०० - यजुर्वेद