यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 413, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध अड़तीसवां अध्याय यावती द्यावापृथिवी यावच्च सप्त सिन्धवो वितस्थिरे. तावन्तमिन्द्र ते ग्रहमूर्जा गृह्णाम्यक्षितं मयि गृह्णाम्यक्षितम्.. (२६) हे यज्ञ देव! जहां तक स्वर्गलोक का विस्तार है, जहां तक पृथ्वीलोक का विस्तार है, जहां तक सप्त सिंधु (समुद्र) विस्तृत है, वहां तक हम आप से ऊर्जा ग्रहण कर सकें. हम आप की कृपा से इसे ग्रहण करने की सामर्थ्य पा सकें. (२६) मयि त्यदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः. घर्मस्त्रिशुग्वि राजति विराजा ज्योतिषा सह ब्रह्मणा तेजसा सह.. (२७) जो परम शक्ति और परम तेज से सुशोभित हो कर विराजमान है, जो प्रकाश के साथ शोभती है, जो विविध तेज से तेजोमयी है, वह विशाल परम शक्ति मुझे बलवान और निपुण बनाने की कृपा करे. हमें कार्य करने की शक्ति प्रदान करे. (२७) पयसो रेत ऽ आभृतं तस्य दोहमशीमह्युत्तरामुत्तरा १४ समाम्. त्विषः संवृक् क्रत्वे दक्षस्य ते सुषुम्णस्य ते सुषुम्णाग्निहुतः. इन्द्रपीतस्य प्रजापति भक्षितस्य मधुमत ऽ उपहूत ऽ उपहूतस्य भक्षयामि.. (२८) हे यज्ञ देव! आप की कृपा से बरसात से बरसे हुए अमृतजल से प्रकृति पूरी तरह भर गई है. आप की ही कृपा से हम आगे भी निरंतर अपने लाभ के लिए उस का दोहन कर सकने में समर्थ हो सकें. आप संकल्प सिद्ध करने में दक्ष (कुशल) व प्रकाशमान हैं. हम यज्ञ में आप का आह्वान करते हैं. यज्ञ में दी गई सुखदायी आहुतियां हमारे लिए सुखदायक हैं. इंद्र देव द्वारा पी गई मधुर हवि और प्रजापति द्वारा खाई गई (सेवन की गई) मधुर हवि का, हम उन को अपने पास आमंत्रित कर के, सेवन करना चाहते हैं. (२८) यजुर्वेद - ४१३