भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

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उनतालीसवां अध्याय स्वाहा प्राणेभ्यः साधिपतिकेभ्यः. पृथिव्यै स्वाहाग्नये स्वाहान्तरिक्षाय स्वाहा वायवे स्वाहा दिवे स्वाहा सूर्याय स्वाहा.. (१) प्राणों के लिए स्वाहा. प्राणों के अधिपति सहित (प्राणों के लिए) स्वाहा. पृथ्वी के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. अंतरिक्ष देव के लिए स्वाहा. वायु के लिए स्वाहा. स्वर्गलोक के लिए स्वाहा. सूर्य के लिए स्वाहा. (१) दिग्भ्यः स्वाहा चन्द्राय स्वाहा नक्षत्रेभ्यः स्वाहाद्भ्यः स्वाहा वरुणाय स्वाहा. नाभ्यै स्वाहा पूताय स्वाहा.. (२) सभी दिशाओं के देवों के लिए स्वाहा. चंद्र देव के लिए स्वाहा. नक्षत्र देवों के लिए स्वाहा. जल देव के लिए स्वाहा. वरुण देव के लिए स्वाहा. यज्ञ देव की नाभि (केंद्र) के लिए स्वाहा. पवित्र करने वाले सभी देवताओं के लिए स्वाहा. (२) वाचे स्वाहा प्राणाय स्वाहा प्राणाय स्वाहा. चक्षुषे स्वाहा चक्षुषे स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा श्रोत्राय स्वाहा.. (३) वाणी देव के लिए स्वाहा. (बाईं) प्राण वायु के लिए स्वाहा. (दाईं) प्राण वायु के लिए स्वाहा. (बाएं) चक्षु (आंख) के लिए स्वाहा. (दाएं) चक्षु के लिए स्वाहा. (बाएं) कान के लिए स्वाहा. (दाएं) कान के लिए स्वाहा. (३) मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीय. पशूना ँ४ रूपमन्नस्य रसो यशः श्रीः श्रयतां मयि स्वाहा.. (४) मन की इच्छा पूरी हो. वाणी सत्य को धारण करे. पशुओं, रूप व अन्न के रस की बढ़ोतरी हो. यश, शोभा व श्रेय बढ़े. हम इन सब की बढ़ोतरी के लिए आहुति अर्पित करते हैं. (४) प्रजापतिः सम्भ्रियमाणः सम्राट् सम्भृतो वैश्वदेवः स ँ४ सन्नो घर्मः प्रवृक्त स्तेज ऽ उद्यत ऽ आश्विनः पयस्यानीयमाने पौष्णो विष्यन्दमाने मारुतः क्लथन् मैत्रः शरसि सन्ताय्यमाने वायव्यो ह्रियमाण ऽ आग्नेयो हूयमानो वाग्घुत:... (५) ४१४ - यजुर्वेद