यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 415, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तरार्ध उनतालीसवां अध्याय हे यज्ञ देवता! यज्ञ से परिपुष्ट होने वाले प्रजापति देव के लिए स्वाहा. संभ्रांत राजा के लिए स्वाहा. सभी देवों ( विश्व देव ) के लिए स्वाहा. सन्मार्ग पर चलने वालों के लिए स्वाहा. धर्मपरायणों के लिए स्वाहा. तेजस्वियों के लिए स्वाहा. जल से अभिषिक्त किए जाते हुए अश्विनीकुमारों के लिए स्वाहा. हितकारी पूषा देव के लिए स्वाहा. शत्रुनाशी मरुद्गणों के लिए स्वाहा. खेतीबाड़ी की समृद्धि करने वाले मित्र देव के लिए स्वाहा. चलायमान वायु के लिए स्वाहा. अग्नि के लिए स्वाहा. वाग्देवता के लिए स्वाहा. ( ५ ) सविता प्रथमेऽहन्नग्निर्द्वितीये वायुस्तृतीय ऽ आदित्यश्चतुर्थे चन्द्रमाः पञ्चम ऽ ऋतुः षष्ठे मरुतः सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे. मित्रो नवमे वरुणो दशम ऽ इन्द्र ऽ एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे.. ( ६ ) पहले दिन सविता देव के लिए स्वाहा. दूसरे दिन अग्नि के लिए स्वाहा. तीसरे दिन वायु के लिए स्वाहा. चौथे दिन आदित्य देव के लिए स्वाहा. पांचवें दिन चंद्र देव के लिए स्वाहा. छठे दिन ऋत देव ( सत्य ) के लिए स्वाहा. सातवें दिन मरुद्गणों के लिए स्वाहा. आठवें दिन बृहस्पति देव के लिए स्वाहा. नौवें दिन मित्र देव के लिए स्वाहा. दसवें दिन वरुण देव के लिए स्वाहा. ग्यारहवें दिन इंद्र देव के लिए स्वाहा. बारहवें दिन विश्वों के लिए स्वाहा. ( ६ ) उग्रश्च भीमश्च ध्वान्तश्च धुनिश्च. सासह्वांश्चाभियुग्वा च विक्षिपः स्वाहा.. ( ७ ) वायु उग्र, भीम, घनघोर शब्द करने वाले हैं, कंपकंपा देने वाले सभी को हरा देने वाले व शत्रुओं पर आक्रमण करने वाले हैं. शत्रुओं को छिन्नभिन्न कर सकने वाले हैं. उन वायु के लिए हम आहुति समर्पित करते हैं. ( ७ ) अग्नि १७ हृदयनाशनि १७ हृदयाग्रेण पशुपतिं कृत्स्नहृदयेन भवं यक्ना. शर्वं मतस्नाभ्यामीशानं मन्युना महादेवमन्तः पार्श्व्येनोग्रं देवं वनिष्ठुना वसिष्ठहनुः शिङ्गीनि कोश्याभ्याम्.. ( ८ ) हम यजमान हृदय से अग्नि को प्रसन्न करते हैं. हृदय के आगे के भाग से प्रकाश देव को प्रसन्न करते हैं. पूरे हृदय से पशुपति देव को प्रसन्न करते हैं. हम यकृत से आकाश देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. गुरदों से जल देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. मन से ईशान देव को प्रसन्न करना चाहते हैं. हम अंतःकरण से महादेव, अंतड़ियों से उग्र देव व हनु से वसिष्ठ को प्रसन्न करना चाहते हैं. हृदय के कोषों से सिद्धि पाना चाहते हैं. ( ८ ) उग्रँल्लोहितेन मित्र १७ सौब्रत्येन रुद्रं दौर्ब्रत्येनेन्द्रं प्रक्रीडेन मरुतो बलेन साध्यान् प्रमुदा. भवस्य कण्ठ १७ रुद्रस्यान्तः पार्श्व्यं महादेवस्य यकृच्छर्वस्य वनिष्ठुः पशुपतेः पुरीतत्.. ( ९ ) यजुर्वेद - ४१५