भारतकोश
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

डा. रेखा व्यास द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 421 में से

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पृष्ठ 418

उत्तरार्ध चालीसवां अध्याय जो सभी प्राणियों ( जड़चेतन ) में अपने को ( आत्मतत्त्व को ) देखता है तथा उस का अनुभव करता है, उसे कभी भी कोई भ्रम नहीं होता. ( ६ ) यस्मिन्त्सर्वाणि भूतान्यात्मैवाभूद्विजानतः. तत्र को मोहः कः शोक ऽ एकत्वमनुपश्यतः.. (७) जिस ( स्थिति ) में मनुष्य यह जान लेता है कि सभी भूतों में एक ही आत्मतत्त्व है, तब क्या मोह ? क्या शोक ? उसे सर्वत्र एक जैसी स्थिति दिखाई देती है. ( ७ ) स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्नाविर १७ शुद्घमपापविद्धम्. कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोर्थान् व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः.. (८) वह परमपिता सर्वव्यापक, चमकीला, ( दीप्तिमान ), काया रहित, नाड़ियों से रहित है. वह घावों से रहित, पवित्र, पाप रहित, विद्वान्, मननशील, सर्वव्यापक व स्वयंभू ( स्वयं उत्पन्न होने वाला ) है. उस ने सृष्टि के आरंभ से ही सब के लिए यथायोग्य साधन सुविधाओं की व्यवस्था की है. ( ८ ) अन्धं तमः प्र विशन्ति ये संभूतिमुपासते. ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ सम्भूत्या १७ रताः.. (९) जो व्यक्ति विनाश की उपासना करते हैं, वे घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं. जो संभूति ( सृजन ) के उपासक हैं, वे भी वैसे ही अंधकार में प्रवेश करते हैं. ( ९ ) अन्य देवाहुः सम्भवादन्यदाहुरसम्भवात्. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे.. (१०) अन्य देवों ने संभव से असंभव के बारे में विशेष रूप से कहा है. हम ने उन धीर पुरुषों से जाना है कि संभव से असंभव का प्रभाव उस से अलग है. ( १० ) सम्भूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभय १७ सह. विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा सम्भूत्यामृतमश्नुते.. (११) सृजन और विनाश इन दोनों को साथसाथ ही समझिए. विनाश से मृत्यु को तैरकर और सृजन से अमृत की प्राप्ति की जाती है. ( ११ ) अन्धं तमः प्र विशन्ति येविद्यामुपासते. ततो भूय ऽ इव ते तमो य ऽ उ विद्याया १७ रताः.. (१२) जो अज्ञान की उपासना करते हैं, वे गहरे अंधकार में प्रवेश करते हैं. जो ज्ञान की उपासना करते हैं, वे भी फिर वैसे ही गहरे अंधकार में प्रवेश करते हैं. ( १२ ) अन्य देवाहुर्विद्याया ऽ अन्यदाहुरविद्यायाः. इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे.. (१३) ४१८ - यजुर्वेद