यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 97, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध आठवां अध्याय हम वर्चस्वी, दूधपूर्ण, श्रेष्ठ शरीर वाले मन से कल्याणकारी रहें. त्वष्टा देव! हमारे लिए धन धारिए. आप हमें धन दीजिए. आप हमें कष्ट विहीन करने की कृपा कीजिए. ( १६ ) धाता रातिः सवितेदं जुषन्तां प्रजापतिर्निधिपा देवो अग्निः. त्वष्टा विष्णुः प्रजया स १४ रराणा यजमानाय द्रविणं दधात स्वाहा.. (१७) हे सविता देव! आप धन धारणकर्ता हैं. हम आप के लिए यज्ञ करते हैं. प्रजापति निधिवान व पालक हैं. अग्नि, त्वष्टा देव विष्णु यजमान के लिए श्रेष्ठ संतान व धन धारने की कृपा करें. हम इन सब देवताओं के लिए आहुतियां भेंट करते हैं. ( १७ ) सुगा वो देवाः सदना ऽ अकर्म य ऽ आजग्मेद १४ सवनं जुषाणाः. भरमाणा वहमाना हवी १४ ष्यस्मे धत्त वसवो वसूनि स्वाहा.. (१८) हे देवो! यज्ञ सदन आप के लिए सुगम बना दिए हैं. आप आसानी से यज्ञ- सेवन करने का काम कर सकते हैं. आप के लिए पात्र हवि से भरे हैं. आप के लिए हवि वहन कर रहे हैं. आप हमारे लिए धन धारिए. ये सभी आहुतियां धन के लिए अर्पित हैं. ( १८ ) याँ २ आवह ऽ उशतो देव देवाँस्तान् प्रेरय स्वे अग्ने सधस्थे. जक्षिवा १४ सः पपिवा १४ सश्च विश्वेसुं घर्म १४ स्वरातिष्ठतानु स्वाहा.. (१९) हे अग्नि! आप ने जिन का आह्वान किया है, उन देवों को अपनेअपने स्थान पर प्रतिष्ठित करने की कृपा कीजिए. आप यज्ञ में दी गई हवि सारे यज्ञ की आहुतियां ग्रहण करने की कृपा कीजिए. हम आप के लिए आहुतियां अर्पित करते हैं. ( १९ ) वय १४ हि त्वा प्रयति यज्ञे अस्मिन्नग्ने होतारमवृणीमहीह. ऋधगया ऽ ऋधगुताशमिष्ठाः प्रजानन् यज्ञमुपयाहि विद्वान्स्वाहा.. (२०) हे अग्नि! जिस यज्ञ के लिए आप को यहां आमंत्रित किया गया है, उसे आप ने अच्छी तरह पूरा किया. इसलिए अब ज्ञान संपन्न आप अपने स्थान की ओर प्रस्थान करते हुए यह आहुति स्वीकार करें. ( २० ) देवा गातुविदो गातुं वित्त्वा गातुमित. मनसस्पत ऽ इमं देव यज्ञ १४ स्वाहा वाते धाः.. (२१) हे देवतागण! आप यज्ञ के ज्ञाता हैं. आप अपने ज्ञात स्थान की ओर गमन कीजिए. आप मन के स्वामी हैं. इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. आप हमारे लिए शुद्ध वायु धारिए. ( २१ ) यज्ञ यज्ञं गच्छ यज्ञपतिं गच्छ स्वां योनिं गच्छ स्वाहा. एष ते यज्ञो यज्ञपते सहसूक्तवाकः सर्ववीरस्तं जुषस्व स्वाहा.. (२२) यजुर्वेद - ९७