यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
डा. रेखा व्यास द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपूर्वार्ध आठवां अध्याय हे यज्ञ देव! आप यज्ञ की ओर जाइए. आप यज्ञपति को प्राप्त होइए. आप अपने मूल स्थान को जाइए. यह आप का यज्ञ है. आप यज्ञपति के पास जाइए. हम आप को आहुति भेंट करते हैं. हम हजारों वाणियों से आप की स्तुति करते हैं. आप सर्वाधिक वीर हैं. हम इस यज्ञ में आप के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २२ ) माहिर्भूर्मा पृदाकुः. उरु १७ हि राजा वरुणश्चकार सूर्याय पन्थामन्वेतवा उ. अपदे पादा प्रतिधातवेकरुतापवक्ता हृदयाविधश्चित्. नमो वरुणायाधिष्ठितो वरुणस्य पाशः.. ( २३) आप पृथ्वी पर अजगर के समान खतरनाक मत बनिए. सूर्य के प्रस्थान के लिए वरुण देव मार्ग को सुगम बनाने की कृपा करें. वरुण देव जहां पैर न रखे जा सकते हैं, वहां भी मार्ग बना देते हैं, प्रतिघात कर देते हैं. हृदय के कष्ट दूर करते हैं. उन के पाश दुष्टनाशी हैं. वे प्रतिष्ठित देव हैं. हमारा उन्हें नमन. ( २३ ) अग्नेरनीकमप ऽ आ विवेशापां नपात् प्रतिरक्षन्नसुर्यम्. दमेदमे समिधं यक्ष्यग्ने प्रति ते जिह्वा घृतमुच्चरण्यत् स्वाहा.. (२४) हे अग्नि! आप जल में प्रवेश कीजिए. ताकि जलधार नीचे न गिर पाए. आप असुरों से यज्ञ की रक्षा कीजिए. आप समिधा को ग्रहण करने की कृपा कीजिए. आप की जिह्वा यज्ञ का घी धारण करने के लिए प्रेरित हो. हम अग्नि के लिए आहुति अर्पित करते हैं. ( २४ ) समुद्रे ते हृदयमप्स्वन्तः सं त्वा विशन्त्वोषधीरुपताः. यज्ञस्य त्वा यज्ञपते सूक्तोक्तौ नमोवाके विधेम यत् स्वाहा.. (२५) हे सोम! आप का हृदय समुद्र व जलमय हैं. आप को हम वहां स्थापित करते हैं. आप की ओषधियां और जल हमारे लिए प्रवाहित होते रहें. हे यज्ञपति! हम आप के लिए सूक्त उच्चारते हैं. विधिविधानपूर्वक आहुति अर्पित करते हैं. आप के लिए नमन. ( २५ ) देवीराप ऽ एष वो गर्भस्त १७ सुप्रीत १७ सुभृतं बिभृत. देव सोमैष ते लोकस्तस्मिञ्छं च वक्ष्व परि च वक्ष्व.. (२६) हे दिव्य जल! यह सोमपात्र आप का गर्भ है. आप प्रेम से व इस का पोषण करते हुए ग्रहण करें. हे सोम! जल आप का लोक है. आप उस की इच्छा करिए. आप भी सुखी रहिए. हमें भी सुखी रखिए. संरक्षण दीजिए. ( २६ ) अवभृथ निचम्पुण निचेरुरसि निचम्पुणः. अव देवैर्देवकृतमेनोयासिषमव मर्त्यैर्मर्त्यकृतं पुरुराव्णो देव रिषस्पाहि. देवाना १७ समिदसि.. (२७) ९८ - यजुर्वेद