भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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६. ज्ञान- अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थ दर्शनम्। एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। (गीता, १३/११) आत्मा के आधिपत्य में आचरण, तत्त्व के अर्थरूप मुझ परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन ज्ञान है और इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, अज्ञान है। अतः ईश्वर की प्रत्यक्ष जानकारी ही ज्ञान है। ७. भजन का अधिकार सबको- अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः।। (गीता, ९/३०) क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति। कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति।। (गीता, ९/३१) अत्यन्त दुराचारी भी मेरा भजन करके शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है एवं सदा रहनेवाली शाश्वत शान्ति को प्राप्त कर लेता है। अतः धर्मात्मा वह है जो एक परमात्मा के प्रति समर्पित है और भजन करने का अधिकार दुराचारी तक को है। ८. भगवत्पथ में बीज का नाश नहीं- नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्।। (गीता, २/४०) इस आत्मदर्शन की क्रिया का स्वल्प आचरण भी जन्म-मरण के महान् भय से उद्धार करनेवाला होता है। ९. ईश्वर का निवास- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया।। (गीता, १८/६१) ईश्वर सभी भूतप्राणियों के हृदय में रहता है। तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत। तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम्।। (गीता, १८/६२) सम्पूर्ण भाव से उस एक परमात्मा की शरण में जाओ। जिसकी कृपा से तू परमशान्ति, शाश्वत परमधाम को प्राप्त होगा।