भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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१०. यज्ञ- सर्वाणीन्द्रियकर्माणि प्राणकर्माणि चापरे। आत्मसंयमयोगाग्नौ जुह्वति ज्ञानदीपिते।। ( गीता, ४/२७) सम्पूर्ण इन्द्रियों के व्यापार को, मन की चेष्टाओं को ज्ञान से प्रकाशित हुई आत्मा में संयमरूपी योगाग्नि में हवन करते हैं। अपाने जुह्वति प्राणं प्राणेऽपानं तथापरे। प्राणापानगतीरुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः।। ( गीता, ४/२९) बहुत से योगी श्वास को प्रश्वास में हवन करते हैं और बहुत से प्रश्वास को श्वास में। इससे उन्नत अवस्था होने पर अन्य श्वास-प्रश्वास की गति रोककर प्राणायामपरायण हो जाते हैं। इस प्रकार योग-साधना की विधि-विशेष का नाम यज्ञ है। उस यज्ञ को कार्यरूप देना कर्म है। ११. कर्म- एवं बहुविधा यज्ञा वितता ब्रह्मणो मुखे। कर्मजान्विद्धि तान्सर्वानेवं ज्ञात्वा विमोक्ष्यसे।। ( गीता, ४/३२) इस प्रकार बहुत से यज्ञ जैसे श्वास का प्रश्वास में हवन, प्रश्वास का श्वास में हवन, श्वास-प्रश्वास का निरोध कर प्राणायाम के परायण होना इत्यादि यज्ञ जिस आचरण से पूर्ण होता है, उस आचरण का नाम कर्म है। कर्म माने आराधना, कर्म माने चिन्तन ! योग साधना पद्धति का नाम यज्ञ है। विकर्म- विकर्म का अर्थ विकल्पशून्य कर्म है। प्राप्ति के पश्चात् महापुरुषों के कर्म विकल्पशून्य होते हैं। आत्मस्थित, आत्मतृप्त, आप्तकाम महापुरुषों को न तो कर्म करने से कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि ही है; फिर भी वे पीछेवालों के हित के लिए कर्म करते हैं। ऐसा कर्म विकल्पशून्य है, विशुद्ध है और यही कर्म विकर्म कहलाता है। ( गीता, ४/१७) १२. यज्ञ करने का अधिकार- यज्ञशिष्टामृतभुजो यान्ति ब्रह्म सनातनम्। नायं लोकोऽस्त्ययज्ञस्य कुतोऽन्यः कुरुसत्तम।। ( गीता, ४/३१ )

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