भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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यज्ञ न करनेवालों को दुबारा मनुष्य-शरीर भी नहीं मिलता अर्थात् यज्ञ करने का अधिकार उन सबको है जिन्हें मनुष्य-शरीर मिला है। १३. ईश्वर देखा जा सकता है- भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन। ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप।। (गीता, ११/५४) अनन्य भक्ति के द्वारा मैं प्रत्यक्ष देखने, जानने तथा प्रवेश करने के लिये भी सुलभ हूँ। आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेन- माश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः। आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित्।। (गीता, २/२९) इस अविनाशी आत्मा को कोई विरला ही आश्चर्य की तरह देखता है, आश्चर्य की ज्यों उपदेश करता है और कोई विरला ही इसे आश्चर्य की ज्यों सुनता है अर्थात् यह प्रत्यक्ष दर्शन है। १४. आत्मा ही सत्य है, सनातन है- अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः।। (गीता, २/२४) यह आत्मा सर्वव्यापक, अचल, स्थिर रहनेवाला और सनातन है। आत्मा ही सत्य है। १५. विधाता और उससे उत्पन्न सृष्टि नश्वर है- आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन। मामुपेत्य तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते।। (गीता, ८/१६) ब्रह्मा और उससे निर्मित सृष्टि, देवता और दानव दुःखों की खानि, क्षणभंगुर और नश्वर हैं। १६. देव-पूजा- कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः। तं तं नियममास्थाय प्रकृत्या नियताः स्वया।। (गीता, ७/२०)