भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

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१५० श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता नियत कर्म यज्ञ की प्रक्रिया, जिसे करनेवाले 'यान्ति ब्रह्म सनातनम्'- सनातन ब्रह्म में प्रवेश पा जाते हैं। इसे करते समय 'स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यान्'- बाहर के स्पर्श, मन और सभी इन्द्रियों के स्पर्श बाहर ही त्यागकर चित्त को ब्रह्म-चिन्तन में, श्वास-प्रश्वास में, ध्यान में लगाना है। मन ब्रह्म में लगा है तो बाह्य स्मरण कौन करे? यदि बाह्य स्मरण होता है तो अभी मन लगा कहाँ? विकार शरीर में नहीं, मन की तरंगों में रहते हैं। मन ब्रह्माचरण में लगा है तो जननेन्द्रिय-संयम ही नहीं, सकलेन्द्रिय-संयम तक स्वाभाविक हो जाता है। अतः ब्रह्म के आचरण में स्थित रहकर) भयरहित और अच्छी प्रकार शान्त अन्तःकरणवाला मन को संयत रखते हुए, मुझमें लगे हुए चित्त से युक्त मेरे परायण होकर स्थित हो। ऐसा करने का परिणाम क्या होगा?- युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः। शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति।।१५।। इस प्रकार अपने आपको निरन्तर उसी चिन्तन में लगाता हुआ संयत मनवाला योगी मेरे में स्थितिरूपी पराकाष्ठावाली शान्ति को प्राप्त होता है। इसलिये अपने को निरन्तर कर्म में लगाएँ। यहाँ यह प्रश्न पूर्णप्राय है। अगले दो श्लोकों में वे बताते हैं कि परमानन्दवाली शान्ति के लिये शारीरिक संयम, युक्ताहार-विहार भी आवश्यक हैं- नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः। न चाति स्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन।।१६।। अर्जुन! यह योग न तो बहुत खानेवाले का सिद्ध होता है और न बिल्कुल न खानेवाले का सिद्ध होता है, न अत्यन्त सोनेवाले का और न अत्यन्त जागनेवाले का ही सिद्ध होता है। तब किसका सिद्ध होता है?- युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु। युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा।।१७।। दुःखों का नाश करनेवाला यह योग उचित आहार-विहार, कर्मों में उपयुक्त चेष्टा और संतुलित शयन-जागरण करनेवाले का ही पूर्ण होता है।