यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठम अध्याय १५१ अधिक भोजन करने से आलस्य, निद्रा और प्रमाद घेरेंगे, तब साधना नहीं होगी। भोजन छोड़ देने से इन्द्रियाँ क्षीण हो जायेंगी, अचल-स्थिर बैठने की क्षमता नहीं रहेगी। 'पूज्य महाराज जी' कहते थे कि खुराक से डेढ़-दो रोटी कम खाना चाहिये। विहार अर्थात् साधन के अनुकूल विचरण, कुछ परिश्रम भी करते रहना चाहिये, कोई कार्य ढूँढ़ लेना चाहिये अन्यथा रक्त-संचार शिथिल पड़ जायेगा, रोग घेर लेंगे। आयु सोना और जागना, आहार और अभ्यास से घटता-बढ़ता है। 'महाराज जी' कहा करते थे- “योगी को चार घण्टे सोना चाहिये और अनवरत चिन्तन में लगे रहना चाहिये। हठ करके न सोनेवाले शीघ्र पागल हो जाते हैं।” कर्मों में उपयुक्त चेष्टा भी हो अर्थात् नियत कर्म आराधना के अनुरूप निरन्तर प्रयत्नशील हो। बाह्य विषयों का स्मरण न कर सदैव उसी में लगे रहनेवाले का ही योग सिद्ध होता है। साथ ही- यदा विनियतं चित्तमात्मन्येवावतिष्ठते। निःस्पृहः सर्वकामेभ्यो युक्त इत्युच्यते तदा।।१८।। इस प्रकार योग के अभ्यास से विशेष रूप से वश में किया हुआ चित्त जिस काल में परमात्मा में भली प्रकार स्थित हो जाता है, विलीन-सा हो जाता है, उस काल में सम्पूर्ण कामनाओं से रहित हुआ पुरुष योगयुक्त कहा जाता है। अब विशेष जीते हुए चित्त के लक्षण क्या हैं?- यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः।।१९।। जिस प्रकार वायुरहित स्थान में रखा गया दीपक चलायमान नहीं होता, लौ सीधे ऊपर जाती है, उसमें कम्पन नहीं होता, यही उपमा परमात्मा के ध्यान में लगे हुए योगी के जीते हुए चित्त की दी गयी है। दीपक तो उदाहरण मात्र है। आजकल दीपक का प्रचलन शिथिल पड़ रहा है। अगरबत्ती ही जलाने पर धुआँ सीधे ऊपर जाता है, यदि वायु में वेग न हो। यह योगी के जीते हुए चित्त का एक उदाहरण मात्र है। अभी चित्त भले ही जीता गया है, निरोध हो गया है; किन्तु अभी चित्त है। जब निरुद्ध चित्त का भी विलय हो जाता है, तब कौन- सी विभूति मिलती है? देखें-