यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९. शास्त्र- इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ। एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत।। (गीता, १५/२०) इस प्रकार यह अति गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया। स्पष्ट है कि शास्त्र गीता है। तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ। ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि।। (गीता, १६/२४) कर्त्तव्य और अकर्त्तव्य के निर्धारण में शास्त्र ही प्रमाण है। अतः गीता में निर्धारित विधि से आचरण करें। २०. धर्म- सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।। (गीता, १८/६६) धार्मिक उथल-पुथल को छोड़ एकमात्र मेरी शरण हो जा अर्थात् एक भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण ही धर्म का मूल है, उस प्रभु को पाने की नियत विधि का आचरण ही धर्माचरण है (अध्याय २, श्लोक ४०) और जो उसे करता है वह अत्यन्त पापी भी शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है (अध्याय ९, श्लोक ३०)। २१. धर्म प्राप्त कहाँ से करें?- ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहममृतस्याव्ययस्य च। शाश्वतस्य च धर्मस्य सुखस्यैकान्तिकस्य च।। (गीता, १४/२७) उस अविनाशी ब्रह्म का, अमृत का, शाश्वत-धर्म का और अखण्ड एकरस आनन्द का मैं ही आश्रय हूँ अर्थात् परमात्मस्थित सद्गुरु ही इन सबका आश्रय है। नोट- विश्व के सारे धर्मों की सत्यधारा 'गीता' का ही प्रसारण है। ॐ