भारतकोश
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा

स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)

DevanagariHindipublished429 पृष्ठ

पृष्ठ 20, कुल 429 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 20

प्राचीनकाल से लेकर अद्यतन मनीषियों द्वारा दिये गये तैथिक क्रमानुसार सन्देश श्री परमहंस आश्रम जगतानन्द, ग्रा०पो०-बरैनी, कछवा, जिला-मिर्जापुर (उ०प्र०) में अपने निवास की अवधि में स्वामी श्री अड़गड़ानन्द जी ने प्रवेश-द्वार के पास इस तालिका को गंगा दशहरा (१९९३ ई०) के पावन पर्व पर बोर्ड पर अंकित कराया। ।। विश्वगुरु भारत ।। • सृष्टि का आदिशास्त्र- ‘इमं विवस्वते योगम्’ (गीता, ४/१) भगवान श्रीकृष्ण ने कहा- इस अविनाशी योग को मैंने आरम्भ में सूर्य से कहा, सूर्य ने इसे स्वयंभू आदिमनु से कहा। जिसके अनुसार एक परमात्मा ही सत्य है, परमतत्त्व है; वह कण- कण में व्याप्त है। योग-साधना के द्वारा वह परमात्मा दर्शन, स्पर्श और प्रवेश के लिये सुलभ है। भगवान द्वारा उपदिष्ट वह आदिज्ञान वैदिक ऋषियों से लेकर अद्यावधि अक्षुण्ण रूप से प्रवाहित है। • वैदिक ऋषि (अनादिकाल-नारायण सूक्त)- कण-कण में व्याप्त ब्रह्म ही सत्य है। उसे विदित करने के अतिरिक्त मुक्ति का कोई अन्य उपाय नहीं है। • भगवान श्रीराम (त्रेता-लाखों वर्ष पूर्व-रामायण)- एक परमात्मा के भजन के बिना जो कल्याण चाहता है, वह मूढ़ है। • योगेश्वर श्रीकृष्ण (५००० वर्ष पूर्व-गीता)- परमात्मा ही सत्य है। चिन्तन की पूर्ति में उस सनातन ब्रह्म की प्राप्ति सम्भव है। देवी-देवताओं की पूजा मूढ़बुद्धि की देन है। • महात्मा मूसा (३००० वर्ष पूर्व-यहूदी धर्म)- तुमने ईश्वर से श्रद्धा हटायी, मूर्ति बनायी- इससे ईश्वर नाराज है। प्रार्थना में लग जाओ। • महात्मा जरथुस्त्र (२७०० वर्ष पूर्व-पारसी धर्म)- अहूर-मज्दा (ईश्वर) की उपासना द्वारा हृदय में स्थित विकारों को नष्ट करो, जो दुःख के कारण हैं।