यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्राक्कथन (ङ) जा सकता। उन्हें वही जान पाता है जिसने क्रियात्मक पथ से चलकर इस अपौरुषेय (Non-Person) स्थिति को पाया हो, जिसका पुरुष (अहं) परमात्मा में विलीन हो चुका हो। वस्तुतः वेद अपौरुषेय है; किन्तु बोलनेवाले सौ-डेढ़ सौ महापुरुष ही थे। उन्हीं की वाणी का संकलन 'वेद' कहलाता है। किन्तु जब शास्त्र लिखने में आ जाता है तो सामाजिक व्यवस्था के नियम भी उसके साथ लिख दिये जाते हैं। महापुरुष के नाम पर जनता उनका भी पालन करने लगती है, यद्यपि धर्म से उनका दूर का भी सम्बन्ध नहीं रहता। आधुनिक युग में मन्त्रियों के आगे- पीछे घूमकर साधारण नेता भी अधिकारियों से अपना काम करा लेते हैं, जबकि मन्त्री ऐसे नेताओं को जानते भी नहीं। इसी प्रकार सामाजिक व्यवस्थाकार महापुरुष की ओट में जीने-खाने की व्यवस्था भी ग्रन्थों में लिपिबद्ध कर देते हैं। उनका सामाजिक उपयोग तत्सामयिक ही होता है। वेदों के सम्बन्ध में भी यही है। वेद के दो भाग हैं- कर्मकाण्ड और ज्ञानकाण्ड। कर्मकाण्ड समाजशास्त्र है, जैसे- वास्तुशास्त्र, आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद इत्यादि। ज्ञानकाण्ड उपनिषद् हैं, उनका भी मूल योगेश्वर श्रीकृष्ण की प्रथम वाणी 'गीता' है। सारांशत 'गीता' अपौरुषेय परमात्मा से समुद्भूत उपनिषद्-सुधा का सार-सर्वस्व है। इसी प्रकार प्रत्येक महापुरुष, जो परमतत्त्व को प्राप्त कर लेता है, स्वयं में धर्मग्रन्थ है। उसकी वाणी का संकलन विश्व में कहीं भी हो, शास्त्र कहलाता है; किन्तु कतिपय धर्मावलम्बियों का यह कथन है कि- "जितना कुरान में लिखा है उतना ही सच है। अब कुरान नहीं उतरेगा।", "ईसा मसीह पर विश्वास किये बिना स्वर्ग नहीं मिल सकता। वह ईश्वर का इकलौता बेटा था।", "अब ऐसा महापुरुष नहीं हो सकता।" - उनकी रूढ़िवादिता है। यदि उसी तत्त्व को साक्षात् कर लिया जाय तो वही बात फिर होगी। गीता सार्वभौम है। धर्म के नाम पर प्रचलित विश्व के समस्त धर्मग्रन्थों में गीता का स्थान अद्वितीय है। यह स्वयं में धर्मशास्त्र ही नहीं, बल्कि अन्य धर्मग्रन्थों में निहित सत्य का मानदण्ड भी है। गीता वह कसौटी है, जिस पर प्रत्येक धर्मग्रन्थ में अनुस्यूत सत्य अनावृत्त हो उठता है, परस्पर विरोधी