यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
स्वामी अड़गड़ानन्द द्वारा
स्रोत: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें(घ) श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता धर्मग्रन्थ है। यह प्रत्येक देश, प्रत्येक जाति तथा प्रत्येक स्तर के प्रत्येक स्त्री- पुरुष के लिये, सबके लिये है। केवल दूसरों से सुनकर या किसी से प्रभावित होकर मनुष्य को ऐसा निर्णय नहीं लेना चाहिये, जिसका प्रभाव सीधे उसके अपने अस्तित्व पर पड़ता हो। पूर्वाग्रह की भावना से मुक्त होकर सत्यान्वेषियों के लिये यह आर्षग्रन्थ आलोक-स्तम्भ है। हिन्दुओं का आग्रह है कि वेद ही प्रमाण है। वेद का अर्थ है ज्ञान, परमात्मा की जानकारी। परमात्मा न संस्कृत में है न संहिताओं में। पुस्तक तो उसका संकेतमात्र है। वह वस्तुतः हृदय में जागृत होता है। विश्वामित्र चिन्तन कर रहे थे। उनकी भक्ति देखकर ब्रह्मा आये, बोले, “आज से तुम ऋषि हो।” विश्वामित्र को सन्तोष नहीं हुआ, चिन्तन में लगे रहे। कुछ काल पश्चात् देवताओं सहित ब्रह्मा पुनः आये और बोले- “आज से तुम राजर्षि हो”; किन्तु विश्वामित्र का समाधान न हुआ। वे अनवरत चिन्तन में लगे रहे। ब्रह्मा दैवी सम्पदाओं के साथ पुनः आये और बताया कि आज से तुम महर्षि हुए। विश्वामित्र ने कहा, “नहीं, मुझे जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि कहें।” ब्रह्मा ने कहा, “अभी तुम जितेन्द्रिय नहीं हो।” विश्वामित्र पुनः तपस्या में लग गये। उनके मस्तिष्क से तपस्या की आभा निकलने लगी, तब देवताओं ने ब्रह्मा से निवेदन किया। ब्रह्मा उसी प्रकार विश्वामित्र से बोले, “अब तुम ब्रह्मर्षि हो।” विश्वामित्र ने कहा, “यदि मैं ब्रह्मर्षि हूँ तो वेद हमारा वरण करे।” वेद विश्वामित्र के हृदय में उतर आया। जो तत्त्व विदित नहीं था, विदित हो गया। यही वेद है, न कि पोथी। जहाँ विश्वामित्र रहते थे, वहाँ वेद रहता था। यही श्रीकृष्ण भी कहते हैं कि “संसार अविनाशी पीपल का वृक्ष है। ऊपर परमात्मा जिसका मूल और नीचे प्रकृतिपर्यन्त शाखाएँ हैं। जो इस प्रकृति का अन्त करके परमात्मा को विदित कर लेता है, वह वेदवित् है। अर्जुन! मैं भी वेदवित् हूँ।” अतः प्रकृति के प्रसार और अन्त के साथ परमात्मा की अनुभूति का नाम ‘वेद’ है। यह अनुभूति ईश्वरप्रदत्त है, इसलिये वेद को अपौरुषेय कहा जाता है। महापुरुष अपौरुषेय होते हैं। उनके माध्यम से परमात्मा ही बोलता है। वे परमात्मा के सन्देश-प्रसारक (ट्रांसमीटर) हो जाते हैं। केवल शब्द-ज्ञान के आधार पर उनकी वाणी में निहित यथार्थ को परखा नहीं